Monday, August 10, 2026
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SC-WILL : पति की वसीयत में नाम नहीं, फिर भी पत्नी को जमीन का हक…यह रहा सुप्रीम फैसला

SC-WILL : सुप्रीम कोर्ट ने कहा, किसी वसीयत में पत्नी की स्थिति या उसे संपत्ति से वंचित करने का कारण न बताया जाना अकेले शक का आधार नहीं हो सकता।

सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर करें फैसला

एक अहम फैसले में कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही फैसला किया जाना चाहिए। यह फैसला पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के नवंबर 2009 के उस आदेश को बरकरार रखते हुए दिया गया, जिसमें मृतक की पत्नी को जमीन की असली मालिक बताया गया था।

यह मामला 1991 का है

मामला 1991 का है, जब एक व्यक्ति की मौत के बाद उसके भतीजे ने कोर्ट में दावा किया कि उसके चाचा ने मई 1991 में एक वसीयत लिखी थी, जिसमें जमीन उसे सौंपी गई थी। ट्रायल कोर्ट ने इस वसीयत को सही मानते हुए भतीजे को जमीन का मालिक घोषित कर दिया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और अपीलीय कोर्ट के फैसलों को पलटते हुए पत्नी को जमीन की असली वारिस माना। मामले की सुनवाई के दौरान दोनों पक्ष—मृतक की पत्नी और भतीजा—की मौत हो गई। इसके बाद उनके कानूनी उत्तराधिकारी सुप्रीम कोर्ट में पक्षकार बने।

वसीयत पर कोर्ट की सख्त नजर

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि जब कोई वसीयत पेश की जाती है, तो उसका लेखक जीवित नहीं होता। ऐसे में कोर्ट की जिम्मेदारी होती है कि यह सुनिश्चित करे कि वसीयत सही तरीके से बनाई गई थी। कोर्ट ने कहा कि वसीयत पेश करने वाले पर यह जिम्मेदारी होती है कि वह न केवल वसीयत के सही तरीके से बनाए जाने को साबित करे, बल्कि उसमें मौजूद किसी भी संदेह को भी दूर करे।

पत्नी का जिक्र न होना बना संदेह का कारण

कोर्ट ने कहा कि मृतक ने अपनी संपत्ति भतीजे को इसलिए दी क्योंकि वह उसकी देखभाल करता था। लेकिन वसीयत में पत्नी का कोई जिक्र नहीं है, जो उसकी प्राकृतिक वारिस थी। न ही यह बताया गया कि उसे संपत्ति से क्यों वंचित किया गया।

ट्रायल कोर्ट की गलती भी बताई

बेंच ने ट्रायल कोर्ट की उस टिप्पणी को भी गलत बताया, जिसमें कहा गया था कि पत्नी द्वारा अंतिम संस्कार न करना उनके रिश्तों में खटास का संकेत है। कोर्ट ने कहा कि हिंदू/सिख परिवारों में आमतौर पर अंतिम संस्कार पुरुष रिश्तेदार करते हैं। ऐसे में पत्नी द्वारा अंतिम संस्कार न करना उनके रिश्ते खराब होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

यह रहा निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि वसीयत में पत्नी का जिक्र न होना अकेले यह साबित नहीं करता कि उसे जानबूझकर संपत्ति से वंचित किया गया। सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए। इसी आधार पर कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया और भतीजे की याचिका खारिज कर दी।

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