Sextortion Case: चंडीगढ़ की एक अदालत ने रोहतक के एक वकील को जज को ब्लैकमेल करने के आरोप में जमानत मिल गई।
केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | विवरण |
| आरोपी | रोहतक स्थित प्रैक्टिसिंग वकील (Advocate)। |
| मांगी गई रकम | ₹1.5 करोड़। |
| कानूनी धारा | भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 308(2)। |
| जमानत की शर्त | ₹50,000 के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की एक जमानत (Surety)। |
उगाही के आरोप में धन का लेन-देन होना चाहिए
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी अजय की अदालत ने रोहतक के प्रैक्टिसिंग वकील को जमानत देते हुए स्पष्ट किया कि जब तक संपत्ति या पैसे का लेन-देन नहीं होता, तब तक ‘उगाही’ (Extortion) का पूर्ण अपराध नहीं माना जा सकता। एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (Additional Sessions Judge) से ₹1.5 करोड़ की उगाही (Extortion) की कोशिश के आरोप में वकील को गिरफ्तार किया गया था। यह मामला वॉट्सऐप पर प्रसारित एक मॉर्फ्ड (छेड़छाड़ किए गए) आपत्तिजनक वीडियो से जुड़ा था।
मामला क्या था? (The Allegation)
- शिकायतकर्ता: एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (Additional Sessions Judge)।
- आरोप: जज ने शिकायत दी थी कि 18 फरवरी को उन्हें अज्ञात नंबरों से कॉल आए और वॉट्सऐप चेक करने को कहा गया। वहां उन्हें अपना एक मॉर्फ्ड और आपत्तिजनक वीडियो मिला।
- ब्लैकमेलिंग: आरोपी ने वीडियो वायरल न करने के बदले ₹1.5 करोड़ की मांग की थी।
- गिरफ्तारी: पुलिस ने 11 अप्रैल को रोहतक के वकील और उनके एक साथी को गिरफ्तार किया था। उनके पास से वे मोबाइल फोन बरामद हुए थे जिनसे कथित तौर पर कॉल किए गए थे।
कोर्ट का कानूनी तर्क: क्यों मिली जमानत?
- अदालत ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 308 (जो पुराने IPC में Extortion से संबंधित थी) की व्याख्या करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
- संपत्ति की सुपुर्दगी (Delivery of Property): कोर्ट ने कहा कि जबरन वसूली (Extortion) का अपराध तब बनता है जब डर के कारण पीड़ित व्यक्ति वास्तव में कोई संपत्ति या पैसा आरोपी को सौंप देता है।
- लेन-देन का अभाव: अभियोजन पक्ष (Prosecution) ने स्वीकार किया कि जज द्वारा आरोपी को कोई पैसा नहीं दिया गया था।
- केवल ‘कोशिश’: कोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर यह मामला ‘उगाही’ का नहीं, बल्कि अधिकतम ‘उगाही के प्रयास’ (Attempt to commit extortion) का हो सकता है।
- हिरासत की अवधि: चूंकि आरोपी 11 अप्रैल से जेल में था और डिजिटल सबूत पहले से ही पुलिस के पास हैं, इसलिए कोर्ट ने उन्हें और अधिक समय तक जेल में रखना उचित नहीं समझा।
जज की शिकायत के मुख्य बिंदु
- जज ने अपनी शिकायत में कुछ गंभीर आशंकाएं भी जताई थीं।
- मोबाइल चोरी: उन्होंने बताया कि उनका फोन खो गया था, जिसका डेटा मॉर्फ्ड वीडियो बनाने के लिए गलत इस्तेमाल किया गया होगा।
- संवेदनशील मामले: जज को संदेह था कि यह ब्लैकमेलिंग उनके द्वारा सुने जा रहे संवेदनशील अदालती मामलों (Sensitive Cases) से जुड़ी हो सकती है।
- गायब होने वाला वीडियो: वॉट्सऐप पर भेजा गया वह क्लिप देखने के कुछ देर बाद अपने आप गायब (Disappeared) हो गया था।
डिजिटल साक्ष्य और प्रक्रिया
अदालत का यह फैसला ‘उगाही’ (Extortion) और ‘उगाही के प्रयास’ (Attempt) के बीच के कानूनी अंतर को स्पष्ट करता है। हालांकि आरोपी को जमानत मिल गई है, लेकिन डिजिटल साक्ष्यों (जैसे कॉल रिकॉर्ड और आईपी एड्रेस) के आधार पर मुकदमा जारी रहेगा। यह मामला जजों की सुरक्षा और डिजिटल डेटा के दुरुपयोग को लेकर भी एक गंभीर चेतावनी है।

