निचली अदालत की गलती और हाईकोर्ट की नाराजगी
- अग्रिम जमानत याचिका का गलत निपटारा: मधुबनी के सत्र न्यायाधीश के समक्ष जब आरोपी ने अग्रिम जमानत याचिका दायर की, तो जज ने उसे मंजूर या नानामंजूर करने के बजाय यह निर्देश दे दिया कि वह 4 सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करे और नियमित जमानत (Regular Bail) की मांग करे।
- रद्द किए जा चुके (Per Incuriam) फैसले का सहारा लेना: सत्र न्यायाधीश ने अपने आदेश में पटना हाईकोर्ट के 2024 के नौशाद अंसारी बनाम बिहार राज्य मामले के फैसले का हवाला दिया था।
- हाईकोर्ट की आपत्ति: न्यायमूर्ति जितेन्द्र कुमार ने स्पष्ट किया कि नौशाद अंसारी मामले के निर्णय को हाईकोर्ट की डिविजन बेंच ने मो. राजा बनाम बिहार राज्य मामले में काफी समय पहले ही पर इनक्युरियम (Per Incuriam – असावधानीवश दिया गया गलत फैसला) घोषित कर दिया था।
- कानूनी अपडेट्स से अनभिज्ञता: हाईकोर्ट ने कहा कि सभी न्यायिक अधिकारियों को सर्कुलर और लॉ जर्नल्स के माध्यम से इस बात की जानकारी दी जा चुकी थी कि अग्रिम जमानत याचिका को केवल स्वीकार या अस्वीकार ही किया जा सकता है, उसे इस तरह से बीच में नहीं अटकाया जा सकता।
पटना उच्च न्यायालय की कड़ी टिप्पणी
“अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश का आदेश स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वह इस न्यायालय द्वारा विकसित जमानत न्यायशास्त्र (Bail Jurisprudence) से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं। वे बिल्कुल अवैध आदेश पारित कर रहे हैं, जिससे याचिकाकर्ताओं को दर-दर भटकना पड़ रहा है। भविष्य में ऐसे गैर-कानूनी आदेशों को रोकने के लिए अधिकारी को बिहार न्यायिक अकादमी में न्यायिक प्रशिक्षण की आवश्यकता है।” — पटना हाईकोर्ट
पटना: पटना हाईकोर्ट ने अधीनस्थ न्यायपालिका में जमानत विधिशास्त्र (Bail Jurisprudence) के नवीनतम कानूनी सिद्धांतों की अनदेखी, उच्च न्यायालय के बाध्यकारी फैसलों के प्रति अनभिज्ञता और अग्रिम जमानत याचिकाओं के अवैध निस्तारण पर एक अत्यंत कड़ा रुख अपनाया है।
न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार की एकल पीठ ने भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 और दहेज प्रतिषेध अधिनियम के तहत दर्ज मामले में एक आरोपी द्वारा दायर अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए 10 सितंबर के अपने आदेश में यह सख्त टिप्पणियां कीं। अदालत ने मधुबनी के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश-पंचम (ADJ-V) द्वारा पारित एक अग्रिम जमानत आदेश को “पूरी तरह अवैध” (Absolutely Illegal) करार देते हुए न्यायिक अधिकारी को कारण बताओ नोटिस (Show-Cause Notice) जारी किया है। उच्च न्यायालय ने उनसे स्पष्टीकरण मांगा है कि कानूनी अज्ञानता और वादियों को अनावश्यक परेशानी में डालने के कारण उन्हें न्यायिक प्रशिक्षण के लिए बिहार न्यायिक अकादमी (Bihar Judicial Academy) क्यों न भेज दिया जाए।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं टिप्पणियां
1. अग्रिम जमानत या तो स्वीकार होगी या खारिज, बीच का रास्ता निकालना अवैध सत्र न्यायाधीश की कार्यशैली पर गंभीर आपत्ति जताते हुए न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार ने कहा: “यह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि विद्वान अपर सत्र न्यायाधीश-पंचम, मधुबनी ने अग्रिम जमानत याचिका को न तो खारिज किया और न ही उसे स्वीकार किया। इसके विपरीत, उन्होंने याचिकाकर्ता को आदेश प्राप्त होने के चार सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में पेश होने और नियमित जमानत मांगने का निर्देश दे दिया। सत्र अदालत अग्रिम जमानत याचिका को महज इस तरह बिना फैसला किए निपटा (Dispose of) नहीं सकती। यह दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि न्यायिक अधिकारी इस न्यायालय द्वारा विकसित अग्रिम जमानत से जुड़े विधिक सिद्धांतों से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं और उन्हें न्यायिक प्रशिक्षण (Judicial Training) की सख्त आवश्यकता है।”
2. खारिज हो चुके फैसले (‘नौशाद अंसारी’) पर भरोसा करना कानून की घोर अज्ञानता
- मधुबनी के एडीजे ने अपने 16 अप्रैल 2026 के आदेश में अर्नेश कुमार, सत्येंद्र कुमार अंतिल और मोहम्मद असफाक आलम के साथ पटना हाईकोर्ट के 2024 के नौशाद अंसारी बनाम बिहार राज्य मामले के फैसले पर भरोसा किया था।
- उच्च न्यायालय ने तीखी टिप्पणी करते हुए रेखांकित किया कि नौशाद अंसारी का फैसला बहुत पहले ही हाईकोर्ट की खंडपीठ (Division Bench) द्वारा मोहम्मद राजा बनाम बिहार राज्य एवं अन्य मामले में ‘पर इनक्युरियम’ (Per Incuriam – असावधानीवश दिया गया गलत विधिक सिद्धांत) घोषित किया जा चुका है:“इस न्यायालय द्वारा स्पष्ट रूप से व्यवस्था दी जा चुकी है कि अग्रिम जमानत की सुनवाई करते समय सत्र न्यायालय का यह वैधानिक दायित्व है कि वह आवेदन को गुण-दोष के आधार पर या तो स्वीकार करे या खारिज करे। खंडपीठ का यह फैसला सभी न्यायिक अधिकारियों के बीच प्रसारित किया गया था और प्रमुख लॉ जनरलों में भी रिपोर्ट हुआ था। इसके बावजूद उस निरस्त नजीर के आधार पर आदेश पारित करना दर्शाता है कि अधिकारी जमानत न्यायशास्त्र के विकास से अनभिज्ञ हैं और ऐसे अवैध आदेश पारित कर रहे हैं जिससे वादियों को अनावश्यक कठिनाई उठानी पड़ रही है।”
3. बिहार न्यायिक अकादमी भेजने का कारण बताओ नोटिस
- हाईकोर्ट ने कहा कि भविष्य में ऐसे अवैध आदेशों की पुनरावृत्ति रोकने और वादियों को एक अदालत से दूसरी अदालत के चक्कर काटने से बचाने के लिए अधिकारी को प्रथम दृष्टया प्रशिक्षण की आवश्यकता है:“संबंधित न्यायिक अधिकारी को कारण बताओ नोटिस जारी किया जाए कि क्यों न उन्हें न्यायिक प्रशिक्षण के लिए बिहार न्यायिक अकादमी भेजा जाए।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (दहेज व BNS विवाद)
- मूल मामला: याचिकाकर्ता के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) और दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 के विभिन्न प्रावधानों के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
- सत्र अदालत का रुख (16 अप्रैल 2026): गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए आरोपी ने मधुबनी सत्र न्यायालय में अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी। एडीजे-पंचम ने याचिका के गुण-दोष पर आदेश देने के बजाय नौशाद अंसारी नजीर का हवाला देकर याचिका का निस्तारण कर दिया और आरोपी को ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण कर नियमित जमानत के लिए आवेदन करने का निर्देश दिया।
- पटना हाईकोर्ट में याचिका: सत्र अदालत द्वारा अग्रिम राहत पर फैसला न किए जाने से व्यथित होकर याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, जहां सुनवाई के दौरान सत्र अदालत की कानूनी त्रुटि उजागर हुई।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: आरोपी-याचिकाकर्ता बनाम बिहार राज्य [आपराधिक विविध (अग्रिम जमानत) – पटना उच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 482 (अग्रिम जमानत / पूर्ववर्ती धारा 438 CrPC); भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS); दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961; भारत का संविधान – अनुच्छेद 227 एवं अनुच्छेद 235 (अधीनस्थ न्यायपालिका पर उच्च न्यायालय का अधीक्षण एवं प्रशासनिक नियंत्रण)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत एवं नजीरें:
- मोहम्मद राजा बनाम बिहार राज्य (पटना हाईकोर्ट खंडपीठ) — ‘नौशाद अंसारी का फैसला पर इनक्युरियम है; अदालतें अग्रिम जमानत अर्जी को स्वीकार या खारिज किए बिना केवल सरेंडर का निर्देश देकर उसका निस्तारण नहीं कर सकतीं।’
- गुरबख्श सिंह सिब्बिया बनाम पंजाब राज्य (सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ) — ‘अग्रिम जमानत व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) की रक्षा का एक असाधारण उपाय है, जिसका गुण-दोष के आधार पर समयबद्ध निस्तारण अनिवार्य है।’
- पीठ: न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार (पटना उच्च न्यायालय)
- अगली सुनवाई: 24 सितंबर 2026 (न्यायिक अधिकारी के स्पष्टीकरण पर विचार हेतु)
Bail Jurisprudence:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति जितेन्द्र कुमार (Justice Jitendra Kumar) |
| संबंधित न्यायिक अधिकारी | अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-V, मधुबनी (ASJ-V, Madhubani) |
| मुख्य मुद्दा | अग्रिम जमानत याचिका को स्वीकार/अस्वीकार करने के बजाय नियमित जमानत के लिए ट्रायल कोर्ट जाने का निर्देश देना |
| कोर्ट का निर्देश | जज को शो-कॉज नोटिस; सुनवाई की अगली तारीख 24 सितंबर 2026 |

