Thursday, November 5, 2026
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Tenant’s Case: किरायेदार मकान मालिक के स्वामित्व से इनकार नहीं कर सकता…यह रही दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी

Tenant’s Case: दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा, कोई भी किरायेदार, किरायेदारी अवधि के दौरान मकान मालिक के स्वामित्व (टाइटल) को नकार नहीं सकता, भले ही जालसाजी (forgery) के आरोप लगाए गए हों।

यह किसी ‘विवाद योग्य मुद्दे’ (triable issue) का आधार नहीं बनता

न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति शैल जैन की खंडपीठ ने कहा, “एक बार जब किरायेदार को मकान में प्रवेश दे दिया जाता है, तो वह किरायेदारी के जारी रहने तक मकान मालिक के स्वामित्व से इनकार नहीं कर सकता। यहां तक कि जालसाजी के आरोप लगाए जाने की स्थिति में भी, यदि कोई ठोस साक्ष्य या अन्य कानूनी वारिसों की चुनौती नहीं है, तो यह किसी ‘विवाद योग्य मुद्दे’ (triable issue) का आधार नहीं बनता।” अदालत ने कहा कि यह सिद्धांत कानूनी प्रावधानों और न्यायसंगत विचारों दोनों पर आधारित है, ताकि किरायेदार किरायेदारी का दुरुपयोग कर कब्जा न बढ़ा सकें और वैध बेदखली प्रक्रिया में बाधा न डालें।

मामला क्या था

खंडपीठ एक अपील पर सुनवाई कर रही थी, जो एक किरायेदार द्वारा दायर की गई थी, जिसने मकान मालिक के विरुद्ध कॉमर्शियल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। किरायेदार को मकान मालिक की मां ने एक दुकान में व्यावसायिक उपयोग के लिए रखा था। मां के निधन के बाद, मकान मालिक ने वसीयत (Will) के आधार पर दुकान का स्वामित्व दावा किया। किरायेदार ने तर्क दिया कि उसने जून 2011 तक किराया अदा किया था, लेकिन उसके बाद मकान मालिक की मां ने किराया लेने से इनकार कर दिया। उसने दावा किया कि उसने अगस्त 2013 तक का ₹20,000 का बकाया चेक द्वारा दिया, जो बिना नकदीकरण के लौटा दिया गया। दूसरी ओर, मकान मालिक ने कहा कि 2011 से किराया नहीं दिया गया, और किरायेदार अब अनधिकृत कब्जाधारी है।

निचली अदालत का आदेश

कॉमर्शियल कोर्ट के जिला जज ने सीपीसी की ऑर्डर 12 रूल 6 के तहत मकान मालिक के पक्ष में निर्णय देते हुए, किरायेदार को दुकान का खाली और शांतिपूर्ण कब्जा सौंपने का निर्देश दिया था।

हाईकोर्ट की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए कहा कि किरायेदार का यह तर्क कि मकान मालिक की वसीयत विवादित या जाली है, स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने कहा, “वसीयत को जाली बताने का आरोप पूरी तरह असमर्थित और बिना सबूत का है। न तो किसी कानूनी वारिस ने और न ही किसी अन्य हितधारक ने वसीयत को किसी सक्षम अदालत में चुनौती दी है। इसलिए, इस दस्तावेज़ को प्रभावी साक्ष्य के रूप में मानना उचित था।” अदालत ने आगे कहा कि केवल जालसाजी का आरोप, जब उसके साथ कोई ठोस विवरण या किसी अन्य प्रतिद्वंद्वी स्वामित्व का दावा न हो, ‘विवाद योग्य मुद्दा’ नहीं बनाता।

स्वामित्व और कब्जे पर कानून की व्याख्या

खंडपीठ ने कहा कि संपत्ति अंतरण अधिनियम (Transfer of Property Act) की धारा 106, जो बिना लिखित अनुबंध के किरायेदारी अवधि को नियंत्रित करती है, को इस सिद्धांत के अनुरूप पढ़ा जाना चाहिए कि मकान मालिक को किरायेदारी समाप्त होने पर कब्जा वापस पाने का अधिकार है। “एक बार जब नोटिस अवधि पूरी हो जाती है, तो मकान मालिक को कब्जा वापस लेने का अधिकार होता है, और किरायेदार उसकी अनुमति के बिना कब्जा नहीं बढ़ा सकता।” अदालत ने यह भी कहा, “धारा 106 टीपीए की योजना स्पष्ट करती है कि, जब तक कोई विशेष समझौता न हो, मकान मालिक का किरायेदारी समाप्त करने का अधिकार केवल नोटिस की औपचारिकता तक सीमित है। एक बार नोटिस जारी हो जाए या मुकदमे के ज़रिए ‘सेवा’ माना जाए, तो किरायेदारी समाप्त हो जाती है और किरायेदार की स्थिति अनधिकृत कब्जाधारी की हो जाती है।”

यह रहा नतीजा

अदालत ने कॉमर्शियल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि किरायेदार की अपील निर्मूल (बेमेरिट) है, खासकर जब किरायेदारी का तथ्य खुद स्वीकार किया गया है। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि किरायेदार तीन महीने के भीतर विवादित दुकान का खाली और शांतिपूर्ण कब्जा मकान मालिक को सौंपे।

IN THE HIGH COURT OF DELHI AT NEW DELHI
RFA(COMM) 503/2025 & CMAPPL. 52643/2025
NASEEM AHMED …..Appellant versus DEEPAK SINGH …..Respondents

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