Terror Financing: कर्नाटक हाईकोर्ट ने देश की सुरक्षा और विदेशी फंडिंग से जुड़े एक बेहद गंभीर मामले में बड़ा फैसला सुनाया है।
राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकी वित्तपोषण से जुड़े आरोपों की गहन जांच जरूरी: अदालत
हाईकोर्ट के जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने [मीका मार्क व अन्य बनाम कर्नाटक राज्य] मामले में आरोपियों की याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकी वित्तपोषण (Terror Financing) से जुड़े इन आरोपों की पूरी और गहन जांच होना बेहद जरूरी है। अदालत ने अमेरिका स्थित ईसाई मिशनरी संगठन ‘द टिमोथी इनिशिएटिव’ (TTI) से कथित रूप से जुड़े छह लोगों के खिलाफ सख्त गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत दर्ज मामले को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया है। इन आरोपियों पर अवैध रूप से विदेशी फंड भारत लाने और उसका इस्तेमाल वामपंथी उग्रवाद (Left-Wing Extremism – नक्सलवाद) को बढ़ावा देने के लिए करने का गंभीर आरोप है।
मामला क्या है?: बेंगलुरु एयरपोर्ट पर पकड़े गए 24 विदेशी डेबिट कार्ड
यह पूरा मामला प्रवर्तन निदेशालय (ED) की एक वित्तीय जांच के बाद सामने आया, जिसकी कड़ियां देश के नक्सल प्रभावित इलाकों से जुड़ी हैं।
एयरपोर्ट पर गिरफ्तारी: इस मामले की शुरुआत तब हुई जब मुख्य आरोपियों में से एक, मीका मार्क को बेंगलुरु के केम्पेगौड़ा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर रोका गया। उसके पास से 24 अंतरराष्ट्रीय डेबिट कार्ड बरामद हुए थे।
92.55 करोड़ रुपये की संदिग्ध निकासी: ईडी ने जब फेमा (FEMA) के तहत जांच शुरू की, तो एक बड़े नेटवर्क का खुलासा हुआ। इस नेटवर्क के जरिए अमेरिकी बैंक द्वारा जारी किए गए डेबिट कार्ड्स का उपयोग करके भारत भर में विदेशी फंड निकाला जा रहा था। जांच में सामने आया कि नवंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच इन कार्डों से लगभग ₹92.55 करोड़ निकाले गए थे। इसके अलावा छत्तीसगढ़ और असम जैसे राज्यों में भी लगभग ₹40 करोड़ की निकासी के सुराग मिले।
पहचान छिपाने के लिए फर्जी नाम: ईडी का आरोप है कि नो योर कस्टमर (KYC) नियमों और विधिक जांच से बचने के लिए ये सभी कार्ड “संतोष कुमार” नामक फर्जी नाम पर जारी कराए गए थे, ताकि वास्तविक उपयोगकर्ताओं की पहचान छिपी रहे। यह पैसा छत्तीसगढ़ जैसे वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में निकाला गया था, जिसके बाद ईडी ने यह जानकारी कर्नाटक पुलिस के साथ साझा की।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी: फंडिंग उग्रवाद की ऑक्सीजन है
आरोपियों ने कोर्ट में दलील दी थी कि ईडी ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर पुलिस से यूएएपीए के तहत एफआईआर दर्ज करने को कहा और आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) की धाराएं बिना किसी पुख्ता आधार के जोड़ी गई हैं। जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने इन दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा पर बेहद गंभीर और मार्मिक टिप्पणियां कीं। कहा, यह मामला ऐसा नहीं है जहां अपराध को शुरुआत में ही दबाने के लिए कोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्तियों (Inherent Jurisdiction) का इस्तेमाल करे। यह मामला सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है। राष्ट्रीय सुरक्षा वह अदृश्य वास्तुकला (Invisible Architecture) है जिस पर किसी देश की संप्रभुता, स्थिरता और संवैधानिक व्यवस्था टिकी होती है। वर्तमान समय में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे गंभीर खतरों में से एक उग्रवाद की गुप्त फंडिंग है। फंडिंग (पैसा) वह ऑक्सीजन है जो उग्रवादी आंदोलनों को जीवित रहने और पनपने में मदद करती है।
सूचना साझा करने का ईडी का अधिकार वैध
कोर्ट ने साफ किया कि प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) की धारा 66(2) स्पष्ट रूप से ईडी को यह अधिकार देती है कि यदि जांच के दौरान किसी अन्य कानून (जैसे UAPA) के उल्लंघन का पता चलता है, तो वह संबंधित जांच एजेंसी या पुलिस के साथ वह डेटा साझा कर सकती है।
शुरुआती स्तर पर विधिक हस्तक्षेप सही नहीं
अदालत ने दोहराया कि एफआईआर रद्द करने की याचिका पर विचार करते समय कोर्ट का काम आरोपियों की बेगुनाही या दोष तय करना नहीं है, बल्कि केवल यह देखना है कि क्या जांच शुरू करने के लिए शुरुआती तौर पर (Prima Facie) पर्याप्त सामग्री मौजूद है। चूंकि फंड का प्रवाह सीधे तौर पर नक्सल प्रभावित इलाकों से जुड़ा दिख रहा है, इसलिए इसकी पूरी जांच होनी ही चाहिए।
इन धाराओं के तहत दर्ज है केस
कर्नाटक पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं (आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, जालसाजी और सबूत नष्ट करना) के साथ-साथ UAPA की धारा 13, 17 और 18 के तहत मामला दर्ज किया है। ये धाराएं गैरकानूनी गतिविधियों, आतंकवादी कृत्यों के लिए धन जुटाने और साजिश रचने से संबंधित हैं।
केस मैट्रिक्स: कर्नाटक हाई कोर्ट का आदेश (Case Summary)
| विधिक और प्रशासनिक श्रेणियां | कर्नाटक उच्च न्यायालय की विधिक व्यवस्था (2026) |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय, बेंगलुरु |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस एम. नागप्रसन्ना (एकल पीठ) |
| मुख्य याचिकाकर्ता | मीका मार्क (Micah Mark) और 5 अन्य |
| संबद्ध संगठन | द टिमोथी इनिशिएटिव (TTI) – अमेरिकी मिशनरी समूह |
| जांच एजेंसियां | प्रवर्तन निदेशालय (ED) एवं कर्नाटक पुलिस |
| राज्य/ईडी के वकील | राज्य लोक अभियोजक बी.एन. जगदीशा और एसपीपी मधु एन. राव |
| अदालत का अंतिम निर्णय | एफआईआर रद्द करने की याचिकाएं खारिज। UAPA के तहत पुलिस जांच जारी रहेगी। |

