मामला सारांश (At a Glance)
| पहलू | विवरण |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति सुमीत गोयल (Justice Sumeet Goel) |
| संबंधित न्यायालय | पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ |
| मुख्य कानूनी बिंदु | दूसरी अग्रिम जमानत याचिका के लिए ‘परिस्थितियों में तात्विक बदलाव’ सिद्ध करना अनिवार्य |
| मुख्य नजीर | भीष्म सिंह बनाम हरियाणा राज्य (2024) |
| अदालत का निर्णय | परिस्थितियों में ठोस बदलाव न मिलने और अभियुक्तों के फरार रहने के कारण याचिका खारिज |
Second Anticipatory Bail: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट (Punjab and Haryana High Court) ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए कहा है कि यद्यपि कानून में दूसरी या उत्तरवर्ती (Successive) अग्रिम जमानत याचिका पोषणीय (Maintainable) है, लेकिन यह केवल तभी सफल हो सकती है जब याचिकाकर्ता परिस्थितियों में किसी “महत्वपूर्ण या तात्विक बदलाव” (Substantial Change in Circumstances) को साबित करे।
न्यायमूर्ति सुमीत गोयल (Justice Sumeet Goel) की पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल सतही बदलाव या बाद में तैयार किया गया कोई दस्तावेज अग्रिम जमानत देने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। अदालत ने यह टिप्पणी बलवा और गैर-कानूनी जमाव (Rioting and Unlawful Assembly) के एक मामले में अभियुक्तों द्वारा दायर दूसरी अग्रिम जमानत याचिका को खारिज करते हुए की।
अदालत द्वारा स्थापित मुख्य कानूनी सिद्धांत
- पोषणीयता बनाम सफलता (Maintainability vs. Success)
- कानून में दूसरी अग्रिम जमानत याचिका दायर करना पूरी तरह से पोषणीय है। इसे केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि पहली याचिका वापस ले ली गई थी, दबाई नहीं गई थी, या गुण-दोष (Merits) के आधार पर खारिज कर दी गई थी।
- हालांकि, याचिका के सफल होने के लिए परिस्थितियों में वास्तविक और बड़ा बदलाव (Material/Substantial Change) होना अनिवार्य है।
- जांच का सही मानदंड (The Correct Test)
- अदालत ने माना कि सही परीक्षण यह नहीं है कि रिकॉर्ड पर केवल कोई नई चीज़ या दस्तावेज़ आया है, बल्कि यह है कि “क्या बाद का घटनाक्रम उस आधार को बदलता है जिस पर पहली याचिका खारिज की गई थी।”
- कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग
- यदि कोई अभियुक्त पहली याचिका खारिज होने के बाद महीनों तक कानून की प्रक्रिया से बचता (Absconding/Eluding) रहता है और अचानक बिना किसी ठोस आधार के दोबारा जमानत अर्जी दाखिल करता है, तो इसे अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।
मामले की पृष्ठभूमि और तथ्य
- नया दस्तावेज़ (DDR) पर्याप्त आधार नहीं: पहली जमानत याचिका खारिज (01 मई 2026) होने के बाद याचिकाकर्ताओं के पक्ष में एक क्रॉस-वर्जन ‘डेली डायरी रिपोर्ट’ (DDR) दर्ज की गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह एक नया घटनाक्रम है।
- अदालत का रुख: हाई कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि केवल इसलिए कि एक नया दस्तावेज़ अस्तित्व में आ गया है, यह नहीं माना जा सकता कि परिस्थितियों में तात्विक बदलाव हुआ है। याचिकाकर्ता को चोट लगने की बात पहली याचिका के समय भी अदालत के ध्यान में थी।
- 3 महीने से अधिक की देरी: पहली याचिका खारिज होने और दूसरी याचिका दाखिल करने के बीच याचिकाकर्ता 3 महीने से अधिक समय तक जांच से भागते रहे। अदालत ने इस आचरण को न्याय प्रक्रिया को बाधित करने वाला और अनुचित माना।
‘भीष्म सिंह बनाम हरियाणा राज्य (2024)’ नजीर का हवाला
न्यायमूर्ति सुमीत गोयल ने अपने फैसले में भीष्म सिंह बनाम हरियाणा राज्य (2024) मामले में तय किए गए सिद्धांतों को दोहराया।
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा का सम्मान महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी को भी न्याय की प्रक्रिया को विफल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
- बिना किसी ठोस कारण के बार-बार जमानत याचिकाएं दायर करना अदालत की सहानुभूति या राहत का हकदार नहीं बनाता।

