Saturday, August 22, 2026
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Pollution Control: बिना नियमों के नहीं वसूल सकते ग्रीन टैक्स…प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की मनमानी पर सभी पढिए नया सुप्रीम निर्देश

Pollution Control: देश में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली कंपनियों पर जुर्माना लगाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम कानूनी स्पष्टीकरण जारी किया है।

पर्यावरण मुआवजा शुल्क का मामला

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने यह निर्देश तब जारी किया, जब केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रखते हुए एक नया कानून (New Law) तैयार किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (State Pollution Control Boards – SPCBs) तब तक किसी भी इकाई पर पर्यावरण मुआवजा शुल्क (Environmental Compensation Charge) नहीं थोप सकते, जब तक कि इसके लिए बकायदा अधीनस्थ विधान (Subordinate Legislation / Rules & Regulations) न बना लिए जाएं।

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क्यों जरूरी था सुप्रीम कोर्ट का यह स्पष्टीकरण?

  • अदालत ने कहा कि यह क्लैरिफिकेशन देना इसलिए जरूरी हो गया था क्योंकि देश के कई हाई कोर्ट्स (High Courts) ने प्रदूषण बोर्डों द्वारा वसूले जा रहे ग्रीन जुर्माने पर सिर्फ इसलिए रोक (Stay) लगा दी थी, क्योंकि इसके लिए कोई ठोस सरकारी नियम (Subordinate Legislation) मौजूद नहीं थे।
  • केंद्र सरकार का पक्ष (ASG Archana Pathak Dave): पर्यावरण मंत्रालय की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे ने कोर्ट को बताया कि सरकार के शीर्ष स्तर पर इस विषय को लेकर विचार-विमर्श चल रहा है और सरकार जल्द ही एक नया व्यापक कानून बनाने पर विचार कर रही है।
  • दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) की चिंता: डीपीसीसी के वकील ने दलील दी कि नियमों के अभाव में पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले किसी भी दोषी को ‘स्कॉट-फ्री’ (बिना सजा के साफ बच निकलना) नहीं जाने दिया जाना चाहिए।

अदालत का पुराना फैसला और ‘प्राकृतिक न्याय’ (Natural Justice) का सिद्धांत

  • सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को आगे की सुनवाई के लिए 10 अगस्त 2026 के लिए लिस्ट किया है। कोर्ट ने अपने 4 अगस्त 2025 के पिछले ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया, जिसमें बोर्डों की शक्तियों और सीमाओं को तय किया गया था। बोर्ड के पास अधिकार तो है, लेकिन… : पिछले साल कोर्ट ने माना था कि वॉटर एक्ट (Water Act) की धारा 33A और एयर एक्ट (Air Act) की धारा 31A के तहत प्रदूषण बोर्डों के पास पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई के लिए जुर्माना लगाने या ‘बैंक गारंटी’ मांगने का पूरा अधिकार है।
  • मनमानी और पारदर्शिता पर रोक: कोर्ट ने साफ किया कि बोर्ड अपनी इस शक्ति का इस्तेमाल मनमाने ढंग (Arbitrary Manner) से नहीं कर सकते। पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए।
  • दिशानिर्देश (Guidelines) काफी नहीं, कानून चाहिए: वर्तमान में प्रदूषण बोर्ड दिसंबर 2022 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा जारी कुछ गाइडलाइंस के आधार पर जुर्माना वसूल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल गाइडलाइंस काफी नहीं हैं; इन्हें बाकायदा नियमों और विनियमों (Rules and Regulations) की शक्ल में अधिसूचित (Notify) किया जाना चाहिए, जिसमें यह साफ लिखा हो कि पर्यावरण के नुकसान का आकलन कैसे किया जाएगा और जुर्माने की रकम कैसे तय होगी।

इस फैसले का मुख्य सारांश (Key Takeaways at a Glance)

मुख्य पहलूसुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का स्टैंड और निर्देश
मूल आदेशजब तक सरकार नए नियम नोटिफाई नहीं करती, तब तक प्रदूषण बोर्ड सीधे तौर पर ग्रीन मुआवजा नहीं वसूल सकते।
वसूली का आधारजुर्माने की गणना (Calculation) का तरीका और सिद्धांत पूरी तरह पारदर्शी और नियमों के तहत होना चाहिए।
सरकार की तैयारीपर्यावरण मंत्रालय इसके लिए एक नया व्यापक कानून (New Legislation) लाने की तैयारी में है।
अगली तारीखमामले की अगली विस्तृत सुनवाई 10 अगस्त 2026 को होगी।

निष्कर्ष (Analysis Summary)

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पर्यावरण संरक्षण और प्रशासनिक जवाबदेही के बीच एक बेहतरीन संतुलन बनाता है। कोर्ट यह तो मानता है कि प्रदूषण फैलाने वालों को दंडित करना बेहद जरूरी है, लेकिन वह प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को बिना किसी तय कानूनी प्रक्रिया या ‘प्राकृतिक न्याय’ के सिद्धांतों के मनमाना जुर्माना वसूलने की खुली छूट नहीं दे सकता। इस आदेश के बाद अब केंद्र सरकार को जल्द से जल्द नए नियम या कानून नोटिफाई करने होंगे, ताकि पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले कानूनी कमियों का फायदा उठाकर बच न सकें।

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