Wednesday, July 15, 2026
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Tax Regime: क्या नए टैक्स रिजीम में जजों के भत्तों पर टैक्स लग सकता है?…वकीलों की हड़ताल के कारण सुनवाई 16 जुलाई तक टली, पूरा केस पढ़िए

Tax Regime: देश के सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों को मिलने वाले विभिन्न भत्तों पर नए टैक्स रिजीम के तहत टैक्स लगाया जा सकता है या नहीं, इस विधिक प्रश्न पर जिरह होगा।

दिल्ली टैक्स बार एसोसिएशन की ओर से याचिका दायर

दिल्ली हाईकोर्ट बेहद महत्वपूर्ण और तकनीकी विधिक प्रश्न पर विचार करने जा रहा है। दिल्ली टैक्स बार एसोसिएशन’ (DTBA) द्वारा दायर इस याचिका में केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें कहा गया है कि जजों को मिलने वाले टैक्स लाभ केवल पुरानी कर व्यवस्था (Old Tax Regime) में ही जारी रहेंगे। हाईकोर्ट के जस्टिस दिनेश मेहता और जस्टिस रजनीश कुमार गुप्ता की खंडपीठ के समक्ष मंगलवार को इस मामले पर आंशिक सुनवाई हुई। हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA) के अध्यक्ष एन. हरिहरन के हस्तक्षेप और वकीलों की चल रही राष्ट्रव्यापी हड़ताल के मद्देनजर, याचिकाकर्ता के वकील ने मामले को आज आगे न बढ़ाने का फैसला किया, जिसके बाद कोर्ट ने इसे 16 जुलाई 2026 के लिए सूचीबद्ध कर दिया।

याचिकाकर्ता का दावा

याचिका में कहा गया कि “आयकर अधिनियम के तहत मिलने वाली ‘छूट’ (Exemption) और जजों के भत्तों को मिलने वाले ‘वैधानिक बहिष्करण’ (Statutory Exclusion) में बड़ा अंतर है। जजों को मिलने वाले भत्ते कभी भी उनकी कर-योग्य सैलरी का हिस्सा बनते ही नहीं हैं, इसलिए नए टैक्स रिजीम (New Income Tax Regime) के बहाने उन पर टैक्स लगाना असंवैधानिक है।

विवाद क्या है?: पुराना बनाम नया टैक्स रिजीम और ‘डबल बेनिफिट’ का तर्क

यह पूरा विवाद केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के 12 सितंबर 2025 के एक कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) से शुरू हुआ।

सीबीडीटी का रुख: सीबीडीटी का तर्क है कि चूंकि नया टैक्स रिजीम पहले से ही कम टैक्स दरों और उच्च छूट (Rebates) की पेशकश करता है, इसलिए यदि जजों को इसमें भी भत्तों पर टैक्स छूट दी गई, तो यह उन्हें “दोहरा लाभ” (Double Benefit) देने जैसा होगा। इसलिए, भत्तों पर टैक्स लाभ केवल ओल्ड टैक्स रिजीम चुनने पर ही मिलेगा।

विवाद की शुरुआत: अगस्त 2025 में हाई कोर्ट के एक जज ने सीबीडीटी को पत्र लिखकर ध्यान दिलाया था कि ऑनलाइन टैक्स रिटर्न (ITR), फॉर्म 16 और टीडीएस (TDS) सॉफ्टवेयर के नए रिजीम वाले यूटिलिटी में जजों के इन वैधानिक भत्तों को कर-मुक्त दिखाने का कोई विकल्प (Option) ही नहीं दिया गया है।

मुख्य कानूनी बिंदु: कानून और संविधान क्या कहता है?

दिल्ली टैक्स बार एसोसिएशन (DTBA) ने इस ज्ञापन को पूरी तरह गैर-कानूनी बताते हुए निम्नलिखित मजबूत दलीलें कोर्ट के सामने रखी हैं।

‘हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जजों का अधिनियम’

यह याचिका हाई कोर्ट जजों के अधिनियम, 1954 की धारा 22D और सुप्रीम कोर्ट जजों के अधिनियम, 1958 की धारा 23D पर आधारित है। ये धाराएं स्पष्ट रूप से कहती हैं कि जजों को मिलने वाले किराया-मुक्त आधिकारिक आवास (Rent-free accommodation), कन्वेयंस सुविधाएं (Conveyance facilities/गाड़ी), सम्पच्युअरी भत्ता (Sumptuary Allowance/सत्कार भत्ता), लीव ट्रैवल कंसीशन (LTC) इन सभी को ‘सैलरी’ हेड के तहत कुल आय की गणना करते समय शामिल नहीं किया जाएगा।

‘छूट’ बनाम ‘बहिष्करण’ (Exemption vs Exclusion)

DTBA की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सचित जौली ने तर्क दिया कि सीबीडीटी ने एक ‘वैधानिक बहिष्करण’ (Statutory Exclusion) को गलती से ‘आयकर छूट’ (Exemption) मान लिया है। आयकर छूट तब लागू होती है जब कोई राशि पहले कर-योग्य आय में शामिल हो। लेकिन जजों के ये भत्ते कानूनन कभी सैलरी इनकम का हिस्सा बनते ही नहीं हैं।

संवैधानिक अनुच्छेदों का उल्लंघन

याचिका में कहा गया है कि सीबीडीटी का यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 125 और अनुच्छेद 221 का खुला उल्लंघन है। ये अनुच्छेद स्पष्ट रूप से प्रावधान करते हैं कि जजों की नियुक्ति के बाद उनके भत्तों और अधिकारों में उनके नुकसान के लिए कोई लाभकारी बदलाव (Vary to their disadvantage) नहीं किया जा सकता।

कोर्ट रूम ड्रामा: जजों की सैलरी पर संकट बनाम बार की हड़ताल

सुनवाई के दौरान अदालत कक्ष में उस वक्त बेहद दिलचस्प मोड़ आया जब DHCBA के अध्यक्ष एन. हरिहरन कोर्ट रूम में पहुंचे।

हड़ताल का हवाला: जिला अदालतों के क्षेत्राधिकार बढ़ाए जाने के विरोध में हाई कोर्ट के वकीलों की आज हड़ताल थी। हरिहरन ने वरिष्ठ वकील सचित जौली से हाथ जोड़कर भावुक अपील की कि वे आज सामूहिक हित में इस मामले पर बहस न करें। उन्होंने कहा, “कृपया इस मुद्दे को आज छोड़ दें, क्योंकि इससे बार के भीतर मतभेद पैदा होंगे।”

अंतरिम राहत का प्रस्ताव: इससे पहले, जौली ने जजों के लिए एक अंतरिम राहत का प्रस्ताव दिया था कि 31 जुलाई की रिटर्न फाइलिंग डेडलाइन को देखते हुए जजों को इस राशि को ‘गैर-आय रसीद’ (Receipts not in the nature of income) के रूप में दिखाकर रिटर्न दाखिल करने की अनुमति दी जाए और विभाग इस पर कोई दंडात्मक कार्रवाई न करे। जौली ने कहा, “मैं यह मामला प्रो-बोनो (मुफ्त/जनहित में) लड़ रहा हूँ, क्योंकि जजों की सैलरी पर सीधा खतरा है।”

16 जुलाई 2026 तक टली सुनवाई: बार की एकजुटता का सम्मान करते हुए सचित जौली ने आज बहस न करने का फैसला किया। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए बिना कोई अंतरिम आदेश पारित किए, इसे 16 जुलाई 2026 को विस्तृत सुनवाई के लिए टाल दिया है।

केस शीट: दिल्ली हाई कोर्ट जज टैक्स अलाउंस विवाद समीक्षा (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और मुख्य बिंदु
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस दिनेश मेहता और जस्टिस रजनीश कुमार गुप्ता
याचिकाकर्तादिल्ली टैक्स बार एसोसिएशन (DTBA)
प्रतिवादीभारत संघ और केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT)
संबंधित कानूनआयकर अधिनियम (नया टैक्स रिजीम) एवं जज अधिनियम, 1954/1958
अगली सुनवाई की तिथि16 जुलाई 2026 (31 जुलाई की आईटीआर डेडलाइन से पहले महत्वपूर्ण)
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