सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणी और बिजो इमैनुएल केस का हवाला
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू पर रोशनी डालते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का वर्ष 1986 का प्रसिद्ध बिजो इमैनुएल केस (Bijoe Emmanuel v. State of Kerala) का फैसला आज भी देश का कानून है। “हम यह उम्मीद करते हैं कि इस अदालत द्वारा बिजो इमैनुएल मामले में घोषित देश का कानून इस अधिनियम पर भी लागू रहेगा। बिजो इमैनुएल में दी गई कानून की व्यवस्था पर आज तक कोई सवाल नहीं उठाया गया है। यदि कोई अपनी अंतरात्मा की आवाज (Conscientious Objector) पर ‘वंदे मातरम’ के एक या सभी पदों (stanzas) को नहीं गाता है, तो उस पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलना चाहिए।”
याचिकाकर्ता (TM Krishna) के मुख्य तर्क
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर ने कानून की संवैधानिक वैधता पर निम्नलिखित सवाल उठाए:
- 6 पदों (Stanzas) को गाने की अनिवार्यता और धार्मिक स्वतंत्रता: गृह मंत्रालय के कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) में वंदे मातरम के सभी 6 पदों को गाने का निर्देश दिया गया है। याचिका के अनुसार, अंतिम 4 पदों (3 से 6) में देवी दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे हिंदू देवी-देवताओं का आह्वान है। इसे अनिवार्य बनाना संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) का उल्लंघन है।
- ‘राष्ट्रीय गीत’ की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं: अधिनियम में यह स्पष्ट ही नहीं किया गया है कि ‘राष्ट्रीय गीत’ (National Song) क्या है। एक आपराधिक कानून में अस्पष्टता (Vagueness) होना खतरनाक है और इसका दुरुपयोग हो सकता है।
- 80 सालों की परंपरा: संविधान सभा के समय से ही लगभग 80 वर्षों से आधिकारिक और सांस्कृतिक रूप से केवल वंदे मातरम के पहले दो पदों को ही राष्ट्रीय गीत माना और गाया जाता रहा है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने ‘राष्ट्रीय सम्मान का अपमान निवारण अधिनियम, 1971’ (Prevention of Insults to National Honour Act, 1971) में वर्ष 2026 में किए गए उस संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार से दो सप्ताह के भीतर जवाब तलब किया है, जिसके तहत राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को जानबूझकर गाने से रोकने या इसे गाने वाली सभा में व्यवधान डालने पर 3 वर्ष तक के कारावास का प्रावधान किया गया है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ कर्नाटक संगीत के सुप्रसिद्ध गायक टी.एम. कृष्णा द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने मौखिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण अवलोकन करते हुए कहा कि शीर्ष अदालत का ऐतिहासिक बिजो इमैनुएल फैसला आज भी पूरी तरह प्रभावी है, और यदि कोई व्यक्ति अंतरात्मा की आवाज या धार्मिक विश्वास के आधार पर वंदे मातरम के कुछ या सभी अंतरे नहीं गाता है, तो उसके खिलाफ कोई दंडात्मक या आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख विधिक अवलोकन एवं टिप्पणियां
1. ‘बिजो इमैनुएल सिद्धांत आज भी बाध्यकारी कानून’: न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची राष्ट्रीय प्रतीक सम्मान कानून के दंडात्मक प्रावधानों के दुरुपयोग की आशंका पर न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा: “हम अपेक्षा करते हैं कि इस न्यायालय द्वारा बिजो इमैनुएल मामले में घोषित देश का कानून ही इस वैधानिक अधिनियम के संचालन को नियंत्रित करेगा। बिजो इमैनुएल में दिए गए विधि के उस उद्घोष पर आज तक कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाया गया है। इसलिए, यदि कोई अंतरात्मा का आपत्तिकर्ता (Conscientious Objector) वंदे मातरम के एक या सभी अंतरों को नहीं गाता है, तो उसे आपराधिक अभियोजन (Criminal Prosecution) का सामना नहीं करना चाहिए।”
2. संविधान में ‘राष्ट्रीय गीत’ का उल्लेख और 80 वर्षों की परंपरा
- न्यायमूर्ति बागची ने आगे टिप्पणी करते हुए रेखांकित किया कि संविधान के अनुच्छेद 51A (मौलिक कर्तव्य) में भी केवल ‘राष्ट्रगान’ (National Anthem) का उल्लेख है, राष्ट्रीय गीत का नहीं।
- पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि परंपरा, रीति और निरंतर समझ (Customs and Usage) के अनुसार राष्ट्रीय गीत को हमेशा केवल वंदे मातरम के पहले दो अंतरों के रूप में ही समझा और गाया जाता रहा है।
याचिकाकर्ता टी.एम. कृष्णा की ओर से प्रस्तुत विधिक दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर ने 2026 के संशोधन और गृह मंत्रालय (MHA) के कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) पर कड़े विधिक सवाल उठाए:
- दंडात्मक कानून में अस्पष्टता का अभाव (Vagueness of Penal Statute):
- डॉ. मुरलीधर ने तर्क दिया कि 1971 के अधिनियम में यह कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है कि ‘राष्ट्रीय गीत’ (National Song) क्या है।
- उन्होंने कहा कि किसी गैर-राजपत्रित (Non-gazetted) कार्यालय ज्ञापन के आधार पर तीन साल की जेल की सजा जैसा कठोर दंडात्मक प्रावधान लागू नहीं किया जा सकता। एक आपराधिक कानून कभी भी अस्पष्टता के दायरे में नहीं हो सकता।
- धार्मिक निष्पक्षता और धर्मनिरपेक्षता पर आघात:
- याचिका में कहा गया कि वंदे मातरम के पहले दो अंतरे मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता की वंदना करते हैं, जबकि तीसरे से छठे अंतरों (Stanzas 3 to 6) में प्रत्यक्ष रूप से हिंदू देवियों—दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती—का स्तुति-गान है।
- सभी छह अंतरों को अनिवार्य रूप से गाने का आदेश नागरिकों को एक गैर-धर्मनिरपेक्ष और धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेने के लिए बाध्य करता है, जो संविधान के अनुच्छेद 25(1) (अंतःकरण और धर्म के आचरण की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 14, 15(1) और 21 का सीधा उल्लंघन है।
- 80 साल की सहमति को एकतरफा तोड़ना:
- वरिष्ठ वकील ने रेखांकित किया कि लगभग 80 वर्षों से देश में आम सहमति थी कि केवल पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे; बिना व्यापक जन-सहमति और विधायी स्पष्टता के अचानक सभी अंतरों को अनिवार्य बनाना दुर्भावनापूर्ण है।
अदालत कक्ष में गरमा-गरम बहस: सॉलिसिटर जनरल बनाम वरिष्ठ अधिवक्ता
- सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का पक्ष:
- केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से औपचारिक नोटिस जारी न करने का आग्रह किया और कहा कि इससे अनावश्यक सनसनी फैलेगी।
- एसजी ने दलील दी कि संसद द्वारा बनाया गया कानून संवैधानिक मार्ग को दर्शाता है, और याचिकाकर्ता देश का ‘नैतिक संरक्षक’ (Moral Guardian) बनने का प्रयास नहीं कर सकता।
- उन्होंने कहा: “संसद द्वारा बनाया गया कानून संवैधानिक रास्ता है, न कि वह जो कोई नक्सली (Naxalite) चाहता है।”
- वरिष्ठ अधिवक्ता की तीखी आपत्ति:
- डॉ. मुरलीधर ने सॉलिसिटर जनरल द्वारा ‘नक्सली’ शब्द के प्रयोग पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि सरकार के शीर्ष विधि अधिकारी (Law Officer) को अदालत में इस तरह की असंसदीय भाषा का प्रयोग शोभा नहीं देता।
- हालांकि, सॉलिसिटर जनरल ने अपनी टिप्पणी वापस लेने से इनकार कर दिया।
याचिका में मांगी गई मुख्य राहतें
- 2026 के संशोधन द्वारा प्रतिस्थापित धारा 3 को असंवैधानिक और शून्य घोषित करना।
- यह न्यायिक घोषणा करना कि ‘वंदे मातरम’ के केवल पहले दो अंतरे ही भारत का ‘राष्ट्रीय गीत’ हैं।
- गृह मंत्रालय द्वारा सभी 6 अंतरों को अनिवार्य रूप से गाने के जारी प्रशासनिक आदेशों पर रोक लगाना।
- मुख्य याचिका के अंतिम निस्तारण तक संशोधित कानून के दंडात्मक क्रियान्वयन से नागरिकों को अंतरिम सुरक्षा (Interim Protection) प्रदान करना।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: टी.एम. कृष्णा बनाम भारत संघ एवं अन्य [रिट याचिका (सिविल) – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून एवं संशोधन: राष्ट्रीय सम्मान का अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2026; राष्ट्रीय सम्मान का अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 3 (राष्ट्रगान या राष्ट्रीय गीत के गायन को रोकने पर दंड); गृह मंत्रालय (MHA) का संबंधित कार्यालय ज्ञापन
- संबद्ध संवैधानिक प्रावधान: भारत का संविधान – अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 15(1) (धर्म आधारित भेदभाव पर रोक), अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता / मौन रहने का अधिकार), अनुच्छेद 21 (दैहिक स्वतंत्रता) एवं अनुच्छेद 25(1) (अंतःकरण की स्वतंत्रता)
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीर:
- बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य (1986, सुप्रीम कोर्ट) — ‘यदि कोई नागरिक या छात्र धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाता है, लेकिन उसके सम्मान में शांत खड़ा रहता है, तो उसे राष्ट्रगान का अपमान नहीं माना जा सकता; संविधान किसी को भी अपने अंतःकरण के विरुद्ध कोई गान गाने के लिए बाध्य नहीं करता।’
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर
- केंद्र सरकार की ओर से: भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (सर्वोच्च न्यायालय)
- समयसीमा: केंद्र सरकार को अपना औपचारिक जवाब दाखिल करने के लिए 2 सप्ताह का समय दिया गया है।
Vande Matram-II: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ (Judges) | CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| याचिकाकर्ता | टी.एम. कृष्णा (वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर द्वारा प्रतिनिधित्व) |
| केंद्र सरकार का पक्ष | सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता |
| विवादित कानून | राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) अधिनियम, 2026 की धारा 3 |
| मुख्य ऐतिहासिक संदर्भ | बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य (1986) का ऐतिहासिक फैसला |

