Virtual Activity: पारिवारिक और वैवाहिक विवादों में डिजिटल चैट्स और ईमोजी का इस्तेमाल अब कानूनी लड़ाइयों का अहम हिस्सा बनता जा रहा है।
किस ईमोजी से जुड़े एक सवाल को हटाने की मांग की थी
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट के जस्टिस राहुल भारती की एकल पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट द्वारा तय किए गए इस सवाल से पत्नी के कानूनी अधिकारों को कोई नुकसान (Prejudice) नहीं पहुंचता है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने एक बेहद अनोखे मामले में एक महिला (पेशे से डॉक्टर) की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने तलाक के मुकदमे में किस ईमोजी से जुड़े एक सवाल (Issue) को हटाने की मांग की थी।
क्या है पूरा मामला? (ईमोजी बनाम क्रूरता)
तलाक की अर्जी: यह मामला साल 2018 में शादी के बंधन में बंधे एक डॉक्टर जोड़े से जुड़ा है। पति (जो खुद भी एक डॉक्टर है) ने जनवरी 2025 में जम्मू की एक फैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक (Divorce) की याचिका दायर की थी। पति ने अपनी पत्नी पर मानसिक क्रूरता (Cruelty) का आरोप लगाया था।
फैमिली कोर्ट के सवाल (Issues): सितंबर 2025 में फैमिली कोर्ट ने केस के ट्रायल के लिए चार मुख्य सवाल तय किए। इनमें से ‘सवाल नंबर 2’ यह था: क्या पति ने अपनी डॉक्टर पत्नी को दूसरे पुरुष (जो कि एक अन्य डॉक्टर है) को ‘किस ईमोजी’ (Kiss Emojis) भेजते हुए रंगे हाथों पकड़ा था?
हाई कोर्ट में चुनौती: पत्नी ने इस सवाल को अपनी छवि के खिलाफ बताते हुए हाई कोर्ट का रुख किया और मांग की कि कोर्ट के रिकॉर्ड और ट्रायल से इस ‘ईमोजी वाले सवाल’ को पूरी तरह हटा (Delete) दिया जाए।
हाई कोर्ट ने क्यों खारिज की पत्नी की दलील? (कोर्ट के 3 मुख्य तर्क)
सबूत देने का जिम्मा पति का है: जस्टिस राहुल भारती ने पत्नी की याचिका को खारिज करते हुए बेहद व्यावहारिक और कानूनी स्पष्टता दिखाई। कोर्ट ने कहा कि चूंकि आरोप पति ने लगाए हैं, इसलिए अदालत में इन आरोपों (वैवाहिक क्रूरता) को सच साबित करने की पूरी जिम्मेदारी (Burden of Proof) भी पति की ही है।
आरोप साबित न होने पर पत्नी की जीत होगी: हाई कोर्ट ने साफ किया कि अगर पति ट्रायल के दौरान यह साबित करने के लिए ठोस डिजिटल सबूत या गवाह नहीं ला पाता है कि पत्नी ने वाकई ऐसा किया था, तो उसकी तलाक की याचिका खुद-ब-खुद खारिज हो जाएगी। ऐसे में पत्नी का यह स्टैंड सही साबित हो जाएगा कि उसने कोई क्रूरता नहीं की थी।
अलग से सवाल बनाने की जरूरत नहीं थी, लेकिन…: हाई कोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट को ‘किस ईमोजी’ के लिए अलग से सवाल नहीं बनाना चाहिए था, क्योंकि यह पति द्वारा लगाए गए ‘क्रूरता’ के मुख्य आरोप का ही एक हिस्सा था। कोर्ट ने टिप्पणी की, अगर निचली अदालतें हर एक छोटे-छोटे आरोप या मैसेज पर अलग से कानूनी सवाल (Issue) बनाने लगेंगी, तो यह सूची कभी खत्म ही नहीं होगी। हालांकि, इस सवाल के लिखे रहने से पत्नी के केस पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा।”
कोर्ट रूम में तय हुए अन्य गंभीर सवाल
फैमिली कोर्ट ने इस वीवीआईपी कपल के बीच विवाद की गहराई को देखते हुए तीन और बड़े सवाल भी तय किए हैं, जिन पर अब मुकदमा चलेगा कि
क्या पत्नी ने अपने पति को जान से मरवाने की धमकी दी थी? क्या ससुराल वालों ने पत्नी को वैवाहिक घर (Matrimonial Home) में प्रवेश देने से इनकार कर दिया था? क्या पति की याचिका कानूनन सुनवाई के योग्य है? (पत्नी ने दावा किया था कि याचिका में तलाक का कोई वैध आधार ही नहीं है, जिसे हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया)।
हाई कोर्ट से पत्नी को एक छोटी राहत
भले ही हाई कोर्ट ने सवाल हटाने से मना कर दिया, लेकिन निचली अदालत को यह छूट दी है कि वह पत्नी के इस दावे पर विचार करे कि पति ने उसकी कुछ गलतियों को ‘माफ’ (Condoned) कर दिया था। अगर पत्नी यह साबित कर देती है कि पति ने पुरानी बातों को भुलाकर रिश्ता आगे बढ़ाया था, तो वह अपने बचाव में इस पॉइंट का इस्तेमाल कर सकती है।
विश्लेषण: क्या डिजिटल ईमोजी ‘क्रूरता’ का कानूनी आधार हैं?
यह मामला भारत में तेजी से बदल रहे ‘साइबर और फैमिली लॉ’ के अंतर्संबंधों को रेखांकित करता है।
| कानूनी पहलू | डिजिटल साक्ष्य का महत्व | अदालत का दृष्टिकोण (2026) |
| ईमोजी की व्याख्या | व्हाट्सएप या अन्य सोशल मीडिया पर भेजे गए ईमोजी (जैसे हार्ट या किस) को केवल मजाक माना जाए या चरित्र पर सवाल? | कोर्ट इन्हें सीधे खारिज नहीं कर सकती। इन्हें केस की परिस्थितियों और दो लोगों के बीच के संबंधों के संदर्भ (Context) में जांचा जाएगा। |
| क्रूरता का दायरा | शारीरिक प्रताड़ना के अलावा मानसिक तनाव भी क्रूरता है। | किसी गैर-पुरुष के साथ इस तरह की डिजिटल चैट्स या ईमोजी का आदान-प्रदान, यदि पार्टनर को मानसिक आघात पहुंचाता है, तो वह क्रूरता के तहत सुनवाई योग्य है। |
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट का यह फैसला साफ करता है कि डिजिटल युग में आपकी वर्चुअल एक्टिविटी (Virtual Activity) आपके वास्तविक जीवन और कानूनी अधिकारों को सीधे प्रभावित कर सकती है। अदालतें अब केवल कागजी सबूतों पर नहीं, बल्कि ईमोजी और चैट्स के जरिए उत्पन्न हुई परिस्थितियों के आधार पर भी मुकदमों की दिशा तय कर रही हैं। अब जम्मू की फैमिली कोर्ट में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पति इन ‘डिजिटल किस ईमोजी’ के स्क्रीनशॉट्स को कानूनी तौर पर प्रमाणित सबूत के रूप में पेश कर पाता है या नहीं।

