Gross Mischief: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जनहित याचिका का दुरुपयोग करने वालों को एक कड़ा और कड़ा संदेश दिया है।
निजी प्रॉपर्टी विवाद को जनहित का चोगा पहनाया
हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की डिवीजन बेंच ने इस कथित जनहित याचिका को खारिज करते हुए कहा कि “अदालतों को ब्लैकमेलिंग या निजी दुश्मनी निकालने का अखाड़ा नहीं बनने दिया जा सकता। कोर्ट ने एक व्यक्ति पर 5 लाख रुपये का भारी-भरकम जुर्माना (Costs) ठोकते हुए कहा कि उसने अदालत से ‘घोर बेईमानी’ की और अपने निजी प्रॉपर्टी विवाद को जनहित का चोगा पहनाकर पेश किया।
सफेद झूठ और भारी शरारत: इलाहाबाद हाई कोर्ट
अदालत ने याचिकाकर्ता की चालाकी को पकड़ते हुए 29 मई को दिए अपने फैसले में बेहद तल्ख टिप्पणी की। कहा, इस याचिका को दाखिल करना PIL क्षेत्राधिकार का घोर दुरुपयोग और मजाक है। याचिकाकर्ता ने हलफनामे (Affidavit) में लिखा कि ‘मेरी पूरी जानकारी में इस जमीन को लेकर किसी भी कोर्ट में कोई केस पेंडिंग नहीं है।’ यह बयान न सिर्फ पूरी तरह झूठा है, बल्कि अदालत के साथ की गई एक ‘घोर शरारत’ (Gross Mischief) है। याचिकाकर्ता ने खुद के खिलाफ चल रहे सिविल केस को छुपाया।
क्या था पूरा मामला? (जनहित के नाम पर निजी बदला)
यह मामला मुरादाबाद का है। याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में PIL दाखिल कर दावा किया था कि मुरादाबाद नगर निगम की जमीन पर कुछ ‘भू-माफियाओं’ (प्राइवेट रिस्पॉन्डेंट्स) ने अवैध कब्जा कर लिया है। इन लोगों ने आम जनता के आने-जाने वाले रास्ते (Public Pathway) को रोकने के लिए वहां एक बड़ी दीवार और गेट खड़ा कर दिया है। हाई कोर्ट ने शुरुआत में इस याचिका को सही मानते हुए मुरादाबाद नगर निगम को एक्शन लेने को कहा। मुरादाबाद के नगर आयुक्त (City Commissioner) ने आनन-फानन में कोर्ट के डर से वहां से वह गेट हटवा भी दिया।
जब खुला झूठ का पुलिंदा: खुद आरोपी था, बन गया जनहित रक्षक
जब मामले की गहराई से सुनवाई हुई, तो विरोधी पक्ष ने अदालत के सामने असली दस्तावेज रख दिए, जिसे देखकर जज भी हैरान रह गए।
पहले से चल रहा था सिविल केस: मुरादाबाद की एक निचली अदालत में उसी जमीन को लेकर याचिकाकर्ता के खिलाफ पहले से ही एक सिविल सूट (दीवानी मुकदमा) चल रहा था। स्थानीय कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर उस जमीन में दखल न देने के लिए स्टे ऑर्डर (Injunction) भी जारी कर रखा था। याचिकाकर्ता पिछले एक साल से उस केस की सुनवाई में शामिल हो रहा था, लेकिन PIL दाखिल करते वक्त उसने यह बात छुपा ली।
वह रास्ता ‘पब्लिक’ था ही नहीं: कोर्ट ने पाया कि वह रास्ता कोई आम सड़क (Thoroughfare) नहीं थी, बल्कि एक ‘डेड-एंड’ (बंद गली) थी, जो सिर्फ उन्हीं प्राइवेट लोगों की प्रॉपर्टी तक जाती थी। इसलिए गेट लगने से आम जनता को कोई परेशानी नहीं थी।
गवाह भी खुद, दुश्मन भी खुद: दस्तावेजों से साबित हुआ कि याचिकाकर्ता उन जमीनों के पुराने समझौतों में खुद गवाह (Witness) रह चुका था। यानी उसका उस जमीन से सीधा निजी और व्यावसायिक हित (Personal Interest) जुड़ा था। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता ने निचली अदालत के स्टे ऑर्डर से बचने और विरोधी पक्ष को परेशान करने के लिए हाई कोर्ट का इस्तेमाल किया और धोखे से गेट को उखड़वा दिया।
विश्लेषण: 5 लाख के जुर्माने का ‘कैलकुलेशन’ और संदेश
हाई कोर्ट ने न सिर्फ जुर्माना लगाया, बल्कि उस 5 लाख रुपये के इस्तेमाल का पूरा हिसाब भी तय कर दिया, जो डिजिटल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है।
| जुर्माने की रकम (Rs 5 Lakh) | कहां इस्तेमाल होगी? |
| ₹2,00,000 (2 लाख रुपये) | पीड़ित पक्ष (जिसका गेट उखाड़ा गया) को मुआवजे के तौर पर दिए जाएंगे। |
| ₹1,00,000 (1 लाख रुपये) | प्रशासन को दिए जाएंगे ताकि वह उस गेट को तुरंत वापस उसी जगह पर इंस्टॉल (reinstall) कर सके। |
| ₹2,00,000 (20 लाख रुपये) | जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA), मुरादाबाद के खाते में जमा होंगे। |
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो अपने आपसी या जमीनी विवाद को ‘जनहित’ का नाम देकर सीधे हाई कोर्ट पहुंच जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए बेंच ने साफ कर दिया कि “जो व्यक्ति साफ दिल और साफ हाथों (Clean Hands) से अदालत नहीं आता, कानून उसके खिलाफ इसी तरह का कड़ा और आर्थिक दंड वाला एक्शन लेता रहेगा।”

