Thursday, October 15, 2026
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Forcibly De-boarding Passenger: बस से यात्री को जबरन उतारना उपभोक्ता विवाद का मामला, मानवाधिकार उल्लंघन नहीं; कोर्ट की दो टूक, पढ़ें

मुख्य बिंदु (Key Indicators)

  • मामले की पृष्ठभूमि: घटना जनवरी 2016 की है, जहां शिकायतकर्ता एन. रमेश कुमार ने आरोप लगाया था कि बस चालक और कंडक्टर ने उनके साथ बदसलूकी की, टिकट नहीं दिया और उन्हें जबरन बस से नीचे उतार दिया।
  • मानवाधिकार आयोग का आदेश: SHRC ने सितंबर 2019 में बस क्रू के आचरण को मानवाधिकार उल्लंघन मानते हुए यात्री को ₹30,000 का मुआवजा देने का आदेश दिया था।
  • ट्रांसपोर्ट कर्मचारी की चुनौती: तमिलनाडु राज्य परिवहन निगम के कर्मचारी एस. चिदंबरम सेल्वन ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि यह सेवा में कमी का मामला है, जिसका निपटारा केवल उपभोक्ता फोरम (Consumer Forum) में हो सकता है, न कि मानवाधिकार आयोग में।
  • हाईकोर्ट का निष्कर्ष: अदालत ने माना कि यह विवाद पूरी तरह से बस यात्रा, टिकट जारी करने और सेवा में कमी से संबंधित है। इसलिए इस पर कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट के तहत ही कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

चेन्नई: मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि सरकारी बस से यात्री को जबरन नीचे उतारना या टिकट देने से इनकार करना सेवा में कमी (Deficiency in Service) से जुड़ा उपभोक्ता विवाद (Consumer Dispute) है, जिसे मानवाधिकार उल्लंघन नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति एम. धंडपाणि और न्यायमूर्ति एन. दिलीप कुमार की खंडपीठ ने ‘तमिलनाडु राज्य परिवहन निगम’ के कर्मचारी एस. चिदंबर सेल्वन द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने तमिलनाडु राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत पीड़ित यात्री को ₹30,000 का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था [चिदंबर सेल्वन बनाम टीएनएचआरसी]।

उच्च न्यायालय की मुख्य कानूनी टिप्पणियां

पीठ ने उपभोक्ता विवाद और मानवाधिकार उल्लंघन के अंतर को रेखांकित करते हुए कहा: “शिकायतकर्ता द्वारा की गई शिकायत मूल रूप से बस कर्मचारियों के आचरण और सेवा में कथित कमी से उत्पन्न एक उपभोक्ता शिकायत (Consumer Grievance) से संबंधित है। वर्तमान मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में इसे ऐसा मानवाधिकार उल्लंघन नहीं माना जा सकता था जिसके लिए राज्य मानवाधिकार आयोग द्वारा मुआवजा लगाया जाए।”

Forcibly De-boarding Passenger:मामले की पृष्ठभूमि और आयोग का आदेश

  • जनवरी 2016 की घटना: शिकायतकर्ता एन. रमेश कुमार ने आरोप लगाया था कि 16 जनवरी 2016 को रूट नंबर 2V पर चलने वाली सरकारी बस में यात्रा के दौरान चालक और कंडक्टर ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया, टिकट नहीं दिया और उन्हें जबरन बस से बाहर धकेल दिया।
  • मानवाधिकार आयोग का रुख (सितंबर 2019): यात्री ने मानवाधिकार हनन का आरोप लगाते हुए SHRC का रुख किया। आयोग ने परिवहन निगम के यात्रा रिकॉर्ड और रूट मैप को बाद में तैयार किया गया मानकर खारिज कर दिया और यात्री के मानवाधिकारों का हनन मानते हुए ₹30,000 का मुआवजा देने का आदेश दिया था।

हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की दलीलें और निष्कर्ष

  • उपभोक्ता मंच का क्षेत्राधिकार: याचिकाकर्ता (बस कर्मचारी) ने दलील दी कि पूरा विवाद बस यात्रा, टिकट जारी करने और सार्वजनिक परिवहन सेवा के आचरण से जुड़ा है। यदि यात्री को कोई शिकायत या क्षति थी, तो उसका कानूनी उपचार उपभोक्ता संरक्षण फोरम (Consumer Forum) के समक्ष उपलब्ध था, न कि मानवाधिकार आयोग के पास।
  • आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर: हाईकोर्ट ने पाया कि आयोग का निष्कर्ष पूरी तरह से बस यात्रा और सेवा से जुड़े रिकॉर्ड्स पर आधारित था, जो मानवाधिकार हनन के दायरे में नहीं आता।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

न्यायमूर्ति एम. धंदापानी और न्यायमूर्ति एन. दिलीप कुमार की पीठ ने आदेश सुनाते हुए कहा: “शिकायतकर्ता द्वारा की गई शिकायत मूल रूप से सेवा में कमी और बस क्रू के आचरण से उत्पन्न एक उपभोक्ता शिकायत (Consumer Grievance) से संबंधित है। इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में इसे मानवाधिकारों के उल्लंघन की शिकायत के रूप में नहीं देखा जा सकता था और न ही राज्य मानवाधिकार आयोग द्वारा मुआवजा लगाया जा सकता था।” हाईकोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए राज्य मानवाधिकार आयोग के मुआवजे के आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया।

अंतिम आदेश

मद्रास उच्च न्यायालय ने माना कि सेवा में कमी के हर मामले को मानवाधिकार उल्लंघन का रूप नहीं दिया जा सकता। तदनुसार, खंडपीठ ने याचिका स्वीकार करते हुए राज्य मानवाधिकार आयोग के सितंबर 2019 के मुआवजे संबंधी आदेश को पूरी तरह खारिज (Set Aside) कर दिया।

एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)

विवरणविवरण जानकारी
केस शीर्षकचिदंबरम सेल्वन बनाम टीएनएचआरसी (Chidambara Selvan v. TNHRC)
संबंधित अदालतमद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court)
पीठ (Bench)न्यायमूर्ति एम. धंदापानी और न्यायमूर्ति एन. दिलीप कुमार
संबंधित निकायतमिलनाडु राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC)
अदालत का निर्णयमानवाधिकार आयोग का ₹30,000 मुआवजे का आदेश रद्द; शिकायतकर्ता को कंज्यूमर फोरम जाने की सलाह।

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