Thursday, October 15, 2026
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Frozen Semen Sample: सरोगेसी मामले में IVF डॉक्टर अनुचित व्यापार व्यवहार का दोषी; 10 साल से रखा सीमेन सैंपल लौटाने का आदेश, पढ़ें रोचक केस

मुख्य बिंदु (Key Indicators)

  • अनुचित और भ्रामक व्यवहार: आयोग ने माना कि डॉक्टर ने केवल चिकित्सीय सलाह और इलाज तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि हर चरण पर अनुचित तरीकों से अत्यधिक पैसे ऐंठने की कोशिश की।
  • अवैध लीगल चार्ज: शिकायतकर्ता से ‘लीगल चार्ज’ (Legal Charge) के नाम पर ₹50,000 वसूले गए, जिसे वसूलने का डॉक्टर के पास कोई अधिकार नहीं था और न ही इस राशि का कोई हिसाब दिया गया।
  • 10 साल से सैंपल रोके रखना: जुलाई 2015 में बैकअप के तौर पर लिया गया फ्रोजन सीमेन सैंपल 10 साल से बिना किसी लिखित सहमति या निर्देश के क्लिनिक में रखा हुआ था, जिसे आयोग ने ‘देखभाल के मानक में गंभीर चूक’ (Lapse in Standard of Care) माना।
  • मेडिकल रिकॉर्ड छिपाना: सरोगेसी एग्रीमेंट, सहमति पत्र (Consent Forms), सोनोग्राफी और एम्ब्रियोलॉजी रिकॉर्ड की कॉपियां मरीज को कभी नहीं सौंपी गईं।
  • कुछ गंभीर आरोप खारिज: आयोग ने शिकायतकर्ता के उन आरोपों को खारिज कर दिया जिनमें जानबूझकर गर्भपात कराने और शुक्राणुओं के व्यापार (Sale of Gametes) का दावा किया गया था। आयोग ने कहा कि उच्च स्पर्म काउंट (Sperm Count) होने से बच्चे के जन्म की 100% गारंटी का कोई चिकित्सीय प्रमाण नहीं है।

मुंबई: महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (MSCDRC) ने सरोगेसी के जरिए संतान प्राप्ति के इच्छुक एक अविवाहित पुरुष से अत्यधिक और अनुचित शुल्क वसूलने तथा बिना सहमति के 10 वर्षों से अधिक समय तक उसका फ्रोजन सीमेन सैंपल (Frozen Semen Sample) अपने पास रखने के मामले में मुंबई के एक आईवीएफ (IVF) डॉक्टर को सेवा में कमी (Deficiency in Service) और अनुचित व्यापार व्यवहार का दोषी ठहराया है।

उपभोक्ता आयोग ने डॉक्टर को पीड़ित शिकायतकर्ता को ₹10 लाख से अधिक का मुआवजा देने और 8 सप्ताह के भीतर उसका फ्रोजन सीमेन सैंपल लौटाने या स्थानांतरित करने का आदेश दिया है।

उपभोक्ता आयोग की तीखी टिप्पणियां

आयोग ने डॉक्टर द्वारा पैसे ऐंठने की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा: “डॉक्टर ने खुद को केवल पेशेवर फीस के बदले चिकित्सीय सलाह और उपचार देने तक सीमित नहीं रखा। यह स्पष्ट है कि डॉक्टर ने अपने पेशे की सीमाओं को लांघा है और हर स्तर पर पैसे ऐंठने की अपनी उत्सुकता में वह चिकित्सा पद्धति से बहुत आगे निकल गया।”

आयोग ने पीड़ित की स्थिति पर सहानुभूति जताते हुए कहा: “सीमित साधनों वाले एक व्यक्ति ने अपनी गाढ़ी कमाई इस प्रक्रिया में लगा दी, और वह एक दशक तक बिना किसी बच्चे और बिना पैसों के अधर में लटका रहा।”

मामले की पृष्ठभूमि और अवैध वसूली

  • 2015 का मामला: 49 वर्षीय अविवाहित पुरुष ने डोनर एग, अपने स्पर्म और सरोगेट मदर के जरिए IVF-ICSI प्रक्रिया से संतान पाने के लिए 2015 में डॉक्टर से संपर्क किया था।
  • लाखों रुपये का भुगतान: शिकायतकर्ता ने 2015-16 के दौरान कुल ₹5.50 लाख का भुगतान किया।
  • अनाधिकृत कानूनी शुल्क: आयोग ने पाया कि डॉक्टर ने ‘कानूनी शुल्क’ (Legal Charge) के नाम पर ₹50,000 वसूले, जिसे वसूलने का डॉक्टर को कोई वैधानिक अधिकार नहीं था और न ही इस राशि का कोई हिसाब-किताब दिया गया।
  • रिकॉर्ड न सौंपना: डॉक्टर ने मरीज को सरोगेसी अनुबंध, सहमति पत्र (Consent Forms), सोनोग्राफी और एम्ब्रियोलॉजी से जुड़े आवश्यक मेडिकल रिकॉर्ड कभी उपलब्ध नहीं कराए।

सीमेन सैंपल को 10 साल तक बिना सूचना रखना ‘गंभीर लापरवाही’

  • आयोग ने रेखांकित किया कि जुलाई 2015 में बैकअप के तौर पर लिया गया शिकायतकर्ता का फ्रोजन सीमेन सैंपल पिछले 10 वर्षों से अधिक समय से क्लिनिक में बिना किसी लिखित सूचना या निर्देश के पड़ा रहा।
  • आयोग ने इसे मानक देखभाल में गंभीर चूक (Lapse in Standard of Care) माना।
  • 6 जुलाई 2016 की बैठक के बाद डॉक्टर ने दोबारा कोई संपर्क नहीं किया, जिससे यह सामान्य नैदानिक असफलता एक लंबी मुकदमेबाजी (Protracted Litigation) में बदल गई।

कुछ आरोपों को आयोग ने किया खारिज

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसका स्पर्म काउंट दुनिया में सर्वश्रेष्ठ स्तर का था, इसलिए आईवीएफ असफल नहीं हो सकता था। उसने आरोप लगाया कि डॉक्टर ने और पैसे ऐंठने के लिए जानबूझकर दोनों प्रयास (सितंबर 2015 और मई 2016) विफल कराए और उसके सीमेन का अवैध व्यापार किया।

आयोग ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा:

  • उच्च स्पर्म काउंट होने मात्र से जीवित बच्चे के जन्म की शत-प्रतिशत गारंटी नहीं होती।
  • सीमेन बेचने या जानबूझकर गर्भपात कराने के संबंध में कोई विशेषज्ञ राय या ठोस चिकित्सीय साक्ष्य पेश नहीं किए गए।

अंतिम आदेश

महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता आयोग ने डॉक्टर को निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. मुआवजा: 30 दिनों के भीतर शिकायतकर्ता को ₹10 लाख का भुगतान करें। तय समय पर भुगतान न करने पर 12% वार्षिक ब्याज देय होगा।
  2. सैंपल की वापसी: 8 सप्ताह के भीतर शिकायतकर्ता का फ्रोजन सीमेन सैंपल उसे वापस सौंपा जाए या उसकी पसंद के क्लिनिक में ट्रांसफर किया जाए।

उपभोक्ता आयोग की टिप्पणी

आयोग ने मुआवजे का निर्धारण करते हुए कड़ा रुख अपनाया और कहा: “शिकायतकर्ता ने एक साधारण साधन संपन्न व्यक्ति होते हुए भी अपनी गाढ़ी कमाई डॉक्टर को सौंपी और एक दशक बाद भी वह बिना बच्चे और बिना पैसों के रह गया। डॉक्टर ने अपनी सीमाओं को लांघकर चिकित्सा पेशे के नाम पर हर स्तर पर पैसे ऐंठने का काम किया, जिससे एक चिकित्सीय निराशा (Clinical Disappointment) लंबे मुकदमे में बदल गई।” आयोग ने आदेश दिया कि ₹10 लाख की मुआवजा राशि 30 दिनों के भीतर दी जाए, ऐसा न करने पर 12% वार्षिक दर से ब्याज देना होगा।

एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)

विवरणजानकारी
संबंधित निकायमहाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग
शिकायतकर्ता49 वर्षीय अविवाहित पुरुष
मामला/प्रक्रियाIVF-ICSI के जरिए सरोगेसी से संतान प्राप्ति का प्रयास (2015-16)
मुख्य आरोपअत्यधिक फीस वसूलना, लीगल चार्ज के नाम पर पैसे लेना, मेडिकल रिकॉर्ड न देना
उपभोक्ता आयोग का आदेश₹10 लाख मुआवजा और 8 सप्ताह में फ्रोजन सीमेन सैंपल लौटाने का निर्देश।
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