मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- नौकरी और वकालत में अंतर: कोर्ट ने कहा कि नौकरीपेशा व्यक्ति की आय निश्चित, नियमित और दस्तावेज़ों से साबित होने वाली होती है। इसके विपरीत, स्वतंत्र वकालत करने वाले की आय अनियमित होती है, जो मिलने वाले मामलों (Briefs) और कार्यालय चलाने के खर्चों पर निर्भर करती है।
- कमाई की क्षमता बनाम वास्तविक आय: भरण-पोषण भत्ता तय करते समय ‘कमाई की क्षमता’ (Earning Capacity) नहीं, बल्कि ‘वास्तविक आय’ (Actual Income) का आकलन होना चाहिए। केवल वकील होने के नाते यह मान लेना कि पर्याप्त आय हो रही है, कानूनी रूप से गलत है।
- सुप्रीम कोर्ट के नजीर का हवाला: हाईकोर्ट ने माना कि पिछला आदेश सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले रजनेश बनाम नेहा (Rajnesh v. Neha, 2020) में तय दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं था।
- रिविजनल कोर्ट की सीमाओं का उल्लंघन: कोर्ट ने हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम दिलबहार सिंह मामले का हवाला देते हुए कहा कि रिविजनल कोर्ट (Revisional Court) पहली अपील अदालत की तरह काम नहीं कर सकती और न ही केवल अलग दृष्टिकोण संभव होने के कारण निचली अदालत के निष्कर्षों को खारिज कर सकती है।
- भुगतान का निर्देश: पति को चार सप्ताह के भीतर बकाया राशि, किए गए भुगतान और शेष राशि का विवरण (Asset-Liability Affidavit के साथ) दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। बकाया तय होने के बाद 8 सप्ताह के भीतर भुगतान करना होगा। (पति द्वारा पूर्व में जमा किए गए ₹32.10 लाख इस देनदारी में समायोजित किए जाएंगे।)
हैदराबाद: तेलंगाना उच्च न्यायालय ने एक वैवाहिक विवाद में महिला वकील को ₹20,000 प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण (Interim Maintenance) देने के फैमिली कोर्ट के 2013 के आदेश को बहाल कर दिया है। अदालत ने महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा कि केवल बार में नामांकित होना या वकालत की योग्यता रखना इस बात का प्रमाण नहीं है कि उसके पास अपना भरण-पोषण करने के लिए पर्याप्त आय मौजूद है।
न्यायमूर्ति वाकिटी रामकृष्ण रेड्डी की एकल पीठ ने महिला की पुनर्विचार याचिका (Review Petition) को स्वीकार करते हुए 15 अक्टूबर 2024 के उस आदेश को वापस ले लिया और रद्द कर दिया, जिसके जरिए उसका भरण-पोषण रोक दिया गया था।
उच्च न्यायालय की प्रमुख कानूनी टिप्पणियां
अदालत ने नौकरी (वेतनभोगी रोजगार) और स्वतंत्र कानूनी प्रैक्टिस के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा: “याचिकाकर्ता किसी नौकरी में नहीं है। वह बार की सदस्य हैं और स्वतंत्र पेशेवर प्रैक्टिस में हैं। नौकरी और स्वतंत्र प्रैक्टिस का अंतर केवल नाम का नहीं है। नौकरीपेशा व्यक्ति को एक निश्चित, नियमित वेतन मिलता है जिसे एक दस्तावेज से साबित किया जा सकता है। इसके विपरीत, एक स्वतंत्र वकील की आय अनिश्चित और अनियमित होती है; यह साल-दर-साल बदलती है, मिलने वाले मुकदमों (Briefs) पर निर्भर करती है और पेशेवर खर्चों के अधीन होती है।”
बार में पंजीकरण पर अदालत ने कहा: “बार में नामांकन केवल योग्यता और अदालत में पेश होने का अधिकार स्थापित करता है। यह आय के बारे में कुछ भी स्थापित नहीं करता, और अपना खर्च चलाने के लिए पर्याप्त आय के बारे में तो बिल्कुल नहीं।”
मामले की पृष्ठभूमि और पूर्व के आदेश
- 2010 से लंबित विवाद: यह वैवाहिक विवाद 2010 से प्रथम अतिरिक्त फैमिली कोर्ट, हैदराबाद के समक्ष लंबित है।
- 27 जून 2013 का अंतरिम आदेश: फैमिली कोर्ट ने पति को पत्नी के लिए ₹20,000 प्रति माह और उनकी दो बेटियों के लिए ₹15,000-₹15,000 प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण का भुगतान करने का निर्देश दिया था।
- अक्टूबर 2024 का हाईकोर्ट आदेश: पति की पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने बेटियों का भरण-पोषण बरकरार रखा था, लेकिन पत्नी के पेशेवर वकील होने के आधार पर उसका भरण-पोषण रद्द कर दिया था।
पुनर्विचार आदेश में हाईकोर्ट के मुख्य आधार
- वास्तविक आय बनाम अनुमान: अदालत ने पाया कि 2024 के आदेश में पत्नी की वास्तविक आय का मूल्यांकन किए बिना केवल उसके पेशे के आधार पर यह अनुमान लगा लिया गया था कि वह कमा रही है। भरण-पोषण का निर्धारण केवल कमाने की क्षमता (Earning Capacity) पर नहीं, बल्कि वास्तविक आय (Actual Income) पर आधारित होना चाहिए।
- ‘रजनेश बनाम नेहा’ दिशानिर्देशों की अनदेखी: अदालत ने रेखांकित किया कि पूर्व आदेश में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले रजनेश बनाम नेहा (2020) में तय किए गए संपत्ति-देनदारी प्रकटीकरण ढांचे का पालन नहीं किया गया था।
- पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार की सीमा: हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन बनाम दिलबहार सिंह का हवाला देते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि रिवीजनल कोर्ट पहली अपीलीय अदालत की तरह साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन (Reappreciate) नहीं कर सकती।
अंतिम निर्देश और बकाया भुगतान
- 2013 का आदेश बहाल: हाईकोर्ट ने 15 अक्टूबर 2024 के आदेश को निरस्त कर फैमिली कोर्ट के 27 जून 2013 के आदेश को मूल शर्तों में बहाल कर दिया।
- बकाया राशि का विवरण: पति को चार सप्ताह के भीतर बकाया भरण-पोषण, किए गए भुगतान और संपत्ति-देनदारी हलफनामे के साथ पूरा विवरण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है। पत्नी को दो सप्ताह में आपत्ति दर्ज करने का अधिकार होगा।
- भुगतान की समय-सीमा: बकाया राशि तय होने के बाद पति को 8 सप्ताह के भीतर भुगतान करना होगा और मामले के अंतिम निपटारे तक नियमित मासिक भुगतान जारी रखना होगा।
- पूर्व भुगतान का समायोजन: पति द्वारा पहले चुकाए गए ₹32.10 लाख (जिसमें नवंबर 2025 में चुकाए गए ₹12 लाख और ₹20.10 लाख शामिल हैं) को उसकी देनदारी में समायोजित (Credit) कर दिया गया है।
तेलंगाना हाईकोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति वाकीटी रामकृष्ण रेड्डी ने आदेश सुनाते हुए कहा: “याचिकाकर्ता किसी नौकरी में नहीं है। वह स्वतंत्र रूप से वकालत कर रही है। बार में नामांकन केवल एक योग्यता और पेश होने का अधिकार स्थापित करता है। यह आय के बारे में कुछ भी साबित नहीं करता, और उससे भी कम उस आय के बारे में जो आवेदक के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त हो।”
Advocate’s Income: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | तेलंगाना उच्च न्यायालय (Telangana High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति वाकीटी रामकृष्ण रेड्डी (Justice Vakiti Ramakrishna Reddy) |
| फैसले की तारीख | 24 जुलाई 2026 |
| मुख्य बिंदु | स्वतंत्र वकालत बनाम नौकरी में वेतन; धारा 24 के तहत वास्तविक आय का आकलन |
| अदालत का निर्णय | पत्नी के लिए ₹20,000 और दोनों बेटियों के लिए ₹15,000-₹15,000 का भरण-पोषण आदेश बहाल। |

