Thursday, August 27, 2026
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Divorce Decree: आश्रित विधवा सास से अलग रहने का पत्नी का अनुचित दबाव और बेबुनियाद आरोप ‘मानसिक क्रूरता; तलाक के आदेश को पढ़ लीजिए

मुख्य बिंदु (Key Indicators)

  • पितृसत्तात्मक सोच और आधुनिक समाज: हाईकोर्ट ने कहा कि समाज पिछले एक दशक में काफी विकसित हुआ है। यह सोच कि पत्नी का एकमात्र काम पति और उसके परिवार की सेवा करना है, अब प्रासंगिक नहीं है। हालांकि, इस तरह के आधुनिक दृष्टिकोण को भी चरम (Extreme) पर नहीं ले जाया जा सकता।
  • निर्भर विधवा मां का संदर्भ: कोर्ट ने कहा कि अलग रहने की मांग को मामले की परिस्थितियों के आधार पर देखा जाना चाहिए। यहां पति की विधवा मां पूरी तरह उस पर निर्भर है। ऐसे में बिना किसी ठोस कारण के केवल अलग रहने की हठ करना पति के प्रति क्रूरता है।
  • सास पर लगाए गए गंभीर आरोप झूठे निकले: पत्नी ने दावा किया था कि वह अपने बच्चे को सास के बुरे व्यवहार और कथित उत्पीड़न से बचाने के लिए अलग होना चाहती थी। कोर्ट ने पाया कि इन गंभीर आरोपों का समर्थन करने के लिए पत्नी ने कोई सबूत, पुलिस शिकायत या गवाह पेश नहीं किया।
  • पति के कार्यस्थल पर हंगामा: पति ने आरोप लगाया कि पत्नी उसके मना करने के बावजूद बार-बार उसके बिजनेस प्लेस पर आती थी, ग्राहकों के सामने गाली-गलौज और तोड़फोड़ करती थी, जिससे उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।
  • साक्ष्य में विरोधाभास: जिरह (Cross-examination) के दौरान पत्नी के कई दावे झूठे साबित हुए। उसने पहले मना किया कि पति ने उसका इलाज कराया था, लेकिन बाद में स्वीकार किया कि पति ने कई अस्पतालों में उसका इलाज कराया था। कोर्ट ने माना कि बेबुनियाद आरोप लगाना पत्नी का एक पैटर्न बन चुका था।

कोलकाता: कलकत्ता उच्च न्यायालय ने पति के पक्ष में फैमिली कोर्ट द्वारा पारित तलाक के फैसले (Divorce Decree) को बरकरार रखा है। अदालत ने माना कि आश्रित विधवा मां से अलग रहने के लिए पति पर लगातार दबाव बनाना और उसके परिवार पर गंभीर लेकिन निराधार आरोप लगाना कानून की नजर में ‘मानसिक क्रूरता’ (Mental Cruelty) के दायरे में आता है।

न्यायमूर्ति सब्यसाची भट्टाचार्य और न्यायमूर्ति सुप्रतिम भट्टाचार्य की खंडपीठ ने पत्नी की अपील खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल अलग घर की चाह रखना स्वतः क्रूरता नहीं है, लेकिन पति की परिस्थितियों और आश्रित बुजुर्ग मां के संदर्भ को नजरअंदाज कर अलग रहने की जिद करना क्रूरता माना जाएगा।

आधुनिक समाज और वैवाहिक अधिकारों पर हाईकोर्ट की टिप्पणी

पीठ ने बदलते सामाजिक परिवेश और पितृसत्तात्मक सोच पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा: “पिछले एक दशक में समाज काफी विकसित हुआ है और उस पितृसत्तात्मक व रूढ़िवादी मानसिकता से आगे निकल चुका है कि पति और उसके परिवार की सेवा करना ही पत्नी का एकमात्र कर्तव्य है। आज के दौर के एकल परिवारों के संदर्भ में एक पत्नी अपने पति के साथ अनन्य दांपत्य जीवन (Exclusive Conjugal Life) की मांग कर सकती है। हालांकि, इस उदार दृष्टिकोण को ऐसे चरम स्तर तक नहीं ले जाया जा सकता जहां परिवार की वास्तविक पृष्ठभूमि और आश्रितों की अनदेखी हो जाए।”

मानसिक क्रूरता के परीक्षण पर अदालत ने कहा: “ऐसी परिस्थितियों की कोई निश्चित सूची नहीं हो सकती जहां मानसिक क्रूरता मानी जाए। अदालत को पक्षों की सामाजिक स्थिति, पारिवारिक पृष्ठभूमि और अन्य परिस्थितियों की कसौटी पर उनके पूरे वैवाहिक जीवन का मूल्यांकन करना होता है।”

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मामले की पृष्ठभूमि और दोनों पक्षों की दलीलें

  • विवाह और अलगाव: दंपत्ति का विवाह जून 2009 में विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act) के तहत हुआ था और अप्रैल 2013 में उनका एक बच्चा हुआ। अप्रैल 2014 में विवाद के बाद वे अलग रहने लगे और दिसंबर 2014 से पूरी तरह अलग रह रहे हैं।
  • पत्नी के आरोप: पत्नी ने दावा किया कि उसने केवल अपने बच्चे को सास के कथित दुर्व्यवहार से बचाने के लिए अलग घर की मांग की थी। उसने आरोप लगाया कि सास द्वारा बच्चे के साथ अनुचित व्यवहार किया जाता था। साथ ही उसने कार्यस्थल पर पति द्वारा गाली-गलौज करने का आरोप लगाकर आपराधिक शिकायत भी दर्ज कराई थी।
  • पति का पक्ष: पति ने दलील दी कि उसकी विधवा मां पूरी तरह से उस पर आश्रित है। पत्नी लगातार मां से संबंध तोड़ने का दबाव बनाती थी, झूठे पुलिस केस दर्ज कराने की धमकियां देकर दबाव डालती थी और उसके व्यापारिक प्रतिष्ठान (Business Place) पर जाकर ग्राहकों के सामने हंगामा करती थी, जिससे उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को भारी नुकसान पहुंचा।

अदालत द्वारा पत्नी के दावों को खारिज करने के मुख्य आधार

  1. निराधार और असंबंधित आरोप: अदालत ने पाया कि सास द्वारा बच्चे के कथित उत्पीड़न का आरोप पूरी तरह से असत्यापित था। पत्नी ने इस संबंध में कभी किसी बाल कल्याण समिति (CWC) या पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं कराई थी।
  2. गवाह के रूप में विश्वसनीयता समाप्त: जिरह (Cross-examination) के दौरान पत्नी के कई विरोधाभास सामने आए। उसने पहले दावा किया कि पति ने उसके इलाज की व्यवस्था नहीं की, लेकिन जिरह में स्वीकार किया कि पति ने कई अस्पतालों में उसका इलाज कराया था।
  3. आश्रित मां के प्रति दायित्व: अदालत ने रेखांकित किया कि पति अपनी वृद्ध और आश्रित विधवा मां के साथ रहता है। ऐसे में बिना किसी ठोस कारण के केवल अलग रहने की जिद करना और परिवार पर झूठे आरोप लगाना पति के प्रति गंभीर मानसिक क्रूरता है।

कलकत्ता हाईकोर्ट की टिप्पणी

न्यायमूर्ति सब्यसाची भट्टाचार्य और न्यायमूर्ति सुप्रतिम भट्टाचार्य की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा: “मानसिक क्रूरता की परिस्थितियों की कोई अंतिम सूची नहीं हो सकती; अदालत को दोनों पक्षों की सामाजिक स्थिति और परिस्थितियों के आधार पर उनके पूरे वैवाहिक जीवन का मूल्यांकन करना होता है। केवल अलग रहने की मांग का अपना स्थान है, लेकिन इसे परिवार की पृष्ठभूमि से अलग नहीं देखा जा सकता। जब पति अपनी निर्भर विधवा मां के साथ रहता है, तो ऐसी स्थिति में बिना किसी जायज कारण के अलग रहने की जिद करना मानसिक क्रूरता है।”

अंतिम निष्कर्ष

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि पत्नी द्वारा लगातार लगाए गए गंभीर व बेबुनियाद आरोप और आश्रित मां को छोड़ने का अनुचित दबाव मानसिक क्रूरता का ठोस आधार बनाते हैं। तदनुसार, उच्च न्यायालय ने फैमिली कोर्ट द्वारा पति को दी गई तलाक की डिक्री को पूरी तरह वैध ठहराते हुए बरकरार रखा।

Divorce Decree: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकलकत्ता उच्च न्यायालय (Calcutta High Court)
पीठ (Bench)न्यायमूर्ति सब्यसाची भट्टाचार्य और न्यायमूर्ति सुप्रतिम भट्टाचार्य
विवाह वर्षजून 2009 (स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत)
मुख्य विवादविधवा सास से अलग रहने की जिद, झूठे पुलिस केस और कार्यस्थल पर हंगामा
अदालत का निर्णयपारिवारिक अदालत द्वारा दी गई तलाक की डिग्री को सही ठहराया।
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