मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- शादी का अधिकार बनाम जेल से रिहाई: कोर्ट ने माना कि शादी करना और जीवनसाथी चुनना व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) का हिस्सा है और सजा काटने के बावजूद कैदी के मौलिक अधिकार पूरी तरह समाप्त नहीं होते। हालांकि, यह अधिकार असीमित नहीं है और कानूनी कारावास, सुरक्षा चिंताओं व जेल नियमों के अधीन है।
- 4 साल से अधिक समय तक फरार रहा था कैदी: राज्य सरकार ने पैरोल का कड़ा विरोध करते हुए बताया कि कैदी 2014 में जेल की बाहरी सीमा से भाग गया था और 1,736 दिनों (लगभग साढ़े चार साल) के बाद वापस पकड़ा गया था। इसके अलावा जेल के भीतर भी उसके नाम 9 अनुशासनिक सजाएं दर्ज हैं।
- 2024 के पैरोल नियमों का दायरा: आंध्र प्रदेश पैरोल नियम, 2024 के तहत कैदी के परिवार के किसी सदस्य की शादी के लिए पैरोल का प्रावधान है, लेकिन स्वयं कैदी की शादी के लिए पैरोल का कोई स्पष्ट स्वतंत्र अधिकार नहीं है।
- सजा के बाद 2 साल का प्रतिबंध: अगस्त 2025 में कैदी को जेल नियमों के उल्लंघन पर 3 महीने के लिए टेलीफोन व मुलाकाती बंद करने की सजा मिली थी। नियमों के मुताबिक सजा खत्म होने के 2 साल बाद ही कोई कैदी दोबारा पैरोल का पात्र होता है, जो अवधि अभी पूरी नहीं हुई थी।
- जेल में शादी या मंदिर ले जाने की मांग खारिज: याचिकाकर्ता ने विकल्प दिया था कि विवाह विशाखापट्टनम सेंट्रल जेल के अंदर या 6 घंटे के लिए पुलिस एस्कॉर्ट के साथ मंदिर में कराने की अनुमति दी जाए। कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि हाई-सिक्योरिटी जेल को ओपन-एयर कैंप नहीं बनाया जा सकता, खासकर ऐसे कैदी के लिए जो पहले जेल तोड़कर भाग चुका हो।
अमरावती: आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे एक कैदी को उसकी खुद की शादी के लिए पैरोल देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि विवाह का मौलिक अधिकार किसी दोषी को जेल से बाहर आने या उच्च सुरक्षा वाली सेंट्रल जेल को शादी का मंडप (Wedding Venue) बनाने का असीमित अधिकार नहीं देता।
न्यायमूर्ति सुनीता गंधम की एकल पीठ ने होने वाली दुल्हन की मां द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने दोषी के जेल से भागने के पिछले इतिहास, चार साल से अधिक की फरारी और जेल अनुशासन के बार-बार उल्लंघन को देखते हुए कोई भी राहत देने से इनकार कर दिया।
उच्च न्यायालय की प्रमुख कानूनी टिप्पणियां
अदालत ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जेल नियमों के संतुलन को स्पष्ट करते हुए 22 अगस्त के अपने आदेश में कहा: “विवाह करने का अधिकार पैरोल पर रिहा होने या सेंट्रल जेल को विवाह स्थल में बदलने का कोई बिना शर्त (Unconditional) अधिकार प्रदान नहीं करता। विवाह के अधिकार में स्वतः जेल से बाहर निकलने का अधिकार शामिल नहीं है।”
मौलिक अधिकारों की सीमा पर अदालत ने कहा: “जीवनसाथी चुनने और विवाह करने का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा का एक पहलू है। हालांकि, कैदी के इस अधिकार के प्रयोग को वैध कारावास, जेल अनुशासन, सुरक्षा चिंताओं और पैरोल नियमों के तहत कानूनी रूप से सीमित किया जा सकता है।”
मामले की पृष्ठभूमि और याचिकाकर्ता की मांगें
- शादी के लिए पैरोल की मांग: याचिकाकर्ता (दुल्हन की मां) ने अपनी बेटी और दोषी के विवाह के लिए 30 दिनों की पैरोल की मांग की थी। शादी 23 अगस्त को सुबह 11:28 बजे गूडूर के कोदंडरामस्वामी देवस्थानम में तय की गई थी।
- वैकल्पिक सुझाव: याचिकाकर्ता ने विकल्प दिया कि या तो कैदी को 6 घंटे के लिए पुलिस एस्कॉर्ट के तहत सिम्हाचलम मंदिर ले जाया जाए, या फिर विशाखापत्तनम सेंट्रल जेल परिसर के भीतर ही शादी संपन्न कराने की अनुमति दी जाए।
अदालत द्वारा पैरोल खारिज किए जाने के मुख्य आधार
राज्य सरकार के विरोध और जेल रिकॉर्ड के आधार पर अदालत ने याचिका को अस्वीकार करने के निम्नलिखित कारण बताए:
- 1,736 दिनों की फरारी का इतिहास: दोषी 2014 में नेल्लोर की पुरानी सेंट्रल जेल से फरार हो गया था और 1,736 दिन (लगभग 4.7 वर्ष) तक कानून से बचता रहा, जिसके बाद उसने आत्मसमर्पण किया।
- जेल अनुशासन का उल्लंघन व 9 सजाएं: राज्य ने अदालत को बताया कि दोषी को जेल में अनुशासनहीनता के लिए 9 बार विभागीय सजाएं मिल चुकी हैं। 26 अगस्त 2025 को भी उसका टेलीफोन और मुलाकात का अधिकार तीन महीने के लिए बंद किया गया था।
- दो साल का प्रतिबंध (Bar): नियमों के अनुसार, जेल में दंडित कैदी सजा अवधि पूरी होने के 2 साल बाद ही पैरोल का पात्र होता है, जो अवधि अभी पूरी नहीं हुई थी।
- नियमों में प्रावधान का अभाव: ‘आंध्र प्रदेश सस्पेंशन ऑफ सेंटेंस ऑन पैरोल रूल्स, 2024’ के नियम 1(c) में परिवार के किसी सदस्य के विवाह के लिए पैरोल का प्रावधान है, लेकिन कैदी के अपने विवाह को स्वतंत्र आधार के रूप में मान्यता नहीं दी गई है।
- जेल सुरक्षा का सवाल: अदालत ने कहा कि एक हाई-सिक्योरिटी सेंट्रल जेल को ‘ओपन-एयर कैंप’ नहीं माना जा सकता। शादी के लिए दुल्हन, रिश्तेदारों और पुरोहितों के प्रवेश से जेल की सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता।
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति सुनिता गंधम ने याचिका खारिज करते हुए अपने आदेश में कहा: “शादी करने के अधिकार से न तो पैरोल पर रिहाई का कोई बिना शर्त अधिकार मिलता है और न ही सेंट्रल जेल को शादी का स्थल बनाने की अनुमति दी जा सकती है। पैरोल कोई निहित अधिकार (Vested Right) नहीं, बल्कि एक विशेषाधिकार है जो निर्धारित शर्तों को पूरा करने पर ही दिया जाता है। शादी का अधिकार स्वतः ही शादी के लिए जेल छोड़ने के अधिकार में शामिल नहीं होता।
अंतिम व्यवस्था
आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि दोषी न तो 30 दिन की पैरोल का हकदार है और न ही पुलिस सुरक्षा में मंदिर जाने या जेल में विवाह करने का। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि जेल नियमों के तहत 2 वर्ष की प्रतिबंध अवधि पूरी होने के बाद, यदि परिस्थितियां बदलती हैं और जेल में उसका आचरण संतोषजनक रहता है, तो वह भविष्य में नए सिरे से पैरोल के लिए आवेदन कर सकता है।
Marry & Jail: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय (Andhra Pradesh High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति सुनिता गंधम (Justice Sunitha Gandham) |
| याचिकाकर्ता | भावी दुल्हन की मां |
| कैदी का रिकॉर्ड | 2014 में जेल से फरार (1,736 दिन तक फरार रहा) और 9 जेल की सजाएं |
| अदालत का निर्णय | पैरोल, पुलिस एस्कॉर्ट के साथ मंदिर जाने और जेल में शादी कराने तीनों की मांग खारिज। |

