अहम बिंदु (Key Indicators)
- विवाद की पृष्ठभूमि: अभियोजन के अनुसार 17-18 मई 1998 की रात आरोपियों ने पीड़िता और उसकी भांजी को पंचायत में चलने के बहाने बुलाया और बगीचे में ले गए। आरोप था कि भांजी भागने में सफल रही, जबकि 5 पुरुषों ने पीड़िता से एक के बाद एक दुष्कर्म किया।
- न्यायालय मित्र (Amicus Curiae): 2004 से अपील लंबित थी और आरोपियों की ओर से कोई वकील नहीं होने पर कोर्ट ने सितंबर 2024 में एडवोकेट सूर्या नीलांबरी को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया था।
- डॉक्टर की गवाही न होना: सुनवाई के दौरान सामने आया कि पीड़िता की जांच करने वाले डॉक्टर को अभियोजन पक्ष द्वारा अदालत में परीक्षित (Examine) ही नहीं कराया गया था।
- घटनास्थल और समय में भिन्नता: गवाहों के बयानों में पंचायत के समय को लेकर गंभीर विरोधाभास था (किसी ने शाम, किसी ने रात के खाने के बाद तो किसी ने आधी रात का समय बताया)। कोर्ट ने आधी रात 12 बजे पंचायत बुलाए जाने की कहानी पर भी संदेह जताया।
- आरोप तय करने में विसंगति: आरोपियों पर शुरुआत में धारा 376/34 IPC के तहत आरोप बनाए गए थे, लेकिन बाद में उन्हें धारा 376(2)(g) के तहत दोषी ठहराया गया, जो कानूनी प्रक्रिया की बड़ी चूक थी।
पटना: पटना हाईकोर्ट ने सामूहिक दुष्कर्म (Gang Rape) के 1998 के एक मामले में चार आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा 2004 में सुनाई गई 10-10 साल के कठोर कारावास की सजा को रद्द करते हुए कहा कि यदि पांच आरोपियों ने पीड़िता के साथ एक के बाद एक दुष्कर्म किया होता, तो उसके शरीर पर चोट के कुछ निशान अवश्य पाए जाते।
न्यायमूर्ति जी. अनुपमा चक्रवर्ती की एकल पीठ ने पाया कि चिकित्सीय साक्ष्य (Medical Evidence) पीड़िता के मौखिक बयानों की पुष्टि नहीं करते हैं और अभियोजन पक्ष की गवाही में बुनियादी विरोधाभास मौजूद हैं।
उच्च न्यायालय की प्रमुख कानूनी टिप्पणियां
चिकित्सीय साक्ष्यों और निष्पक्ष सुनवाई के मूलभूत सिद्धांत पर अदालत ने रेखांकित किया: “यदि पांच आरोपियों ने वास्तव में दुष्कर्म का अपराध किया होता, तो पीड़िता के शरीर पर चोट के कुछ निशान जरूर पाए जाते। इसके अलावा, अभियोजन पक्ष ने पीड़िता की जांच करने वाले डॉक्टर का अदालत में परीक्षण ही नहीं कराया। आपराधिक कानून का मूल सिद्धांत यह है कि अभियोजन पक्ष को आरोपियों के अपराध को उचित संदेह से परे (Beyond Reasonable Doubt) साबित करना होता है, और जब तक ऐसा दोष स्थापित नहीं हो जाता, तब तक आरोपी को निर्दोष माना जाता है।”
मामले की पृष्ठभूमि
- 1998 की कथित घटना: अभियोजन के अनुसार, पीड़िता और उसकी भतीजी 17-18 मई 1998 की दरमियानी रात घर पर थीं। आरोप लगाया गया कि आरोपी उन्हें पंचायत में चलने के बहाने बुलाकर बगीचे की ओर ले गए, जहां भतीजी भागने में सफल रही जबकि पांचों आरोपियों ने पीड़िता के साथ बारी-बारी से दुष्कर्म किया। बाद में थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई।
- 2004 में ट्रायल कोर्ट से सजा: ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को आईपीसी की धारा 376(2)(g) (गैंगरेप) के तहत दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष के कठोर कारावास और ₹1,000 जुर्माने की सजा सुनाई थी।
- अपील के दौरान आरोपी की मौत: 2004 से लंबित इस अपील के दौरान एक अपीलकर्ता की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उसके खिलाफ कार्यवाही समाप्त हो गई। शेष चार आरोपियों के लिए हाईकोर्ट ने एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) नियुक्त कर सुनवाई पूरी की।
हाईकोर्ट द्वारा दोषसिद्धि रद्द करने के मुख्य आधार
- मेडिकल साक्ष्य और डॉक्टर की अनुपस्थिति: पीड़िता के शरीर पर संघर्ष या चोट का कोई निशान नहीं था। महत्वपूर्ण रूप से, जिस डॉक्टर ने मेडिकल परीक्षण किया था, अभियोजन ने उन्हें गवाह के रूप में पेश ही नहीं किया।
- घटनास्थल व समय को लेकर गंभीर विरोधाभास: गवाहों ने पंचायत के समय को लेकर परस्पर विरोधी बयान दिए—किसी ने शाम को, किसी ने भोजन के बाद, तो किसी ने आधी रात को पंचायत होना बताया। अदालत ने इस कहानी पर भी संदेह जताया कि आधी रात 12:00 से 12:30 बजे महिलाओं को पंचायत में बुलाया गया था।
- आरोप तय करने में विधिक विसंगति: अदालत ने नोट किया कि शुरुआत में आरोप आईपीसी की धारा 376 सहपठित धारा 34 के तहत तय किया गया था, लेकिन सजा धारा 376(2)(g) के तहत सुनाई गई, जिसमें आरोप के मूल तत्व और लागू धारा में अंतर्विरोध था।
पटना हाईकोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति जी. अनुपमा चक्रवर्ती ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा: “यदि पांचों आरोपियों ने दुष्कर्म का अपराध किया होता, तो पीड़िता के शरीर पर चोट के कुछ निशान अवश्य होने चाहिए थे। इसके अलावा, अभियोजन पक्ष ने जांच करने वाले डॉक्टर का परीक्षण क्यों नहीं कराया, यह वही जानते हैं। आपराधिक कानून का कार्डिनल सिद्धांत (मूल नियम) यह है कि अभियोजन को संदेह से परे अपराध साबित करना होता है, जब तक यह साबित न हो, आरोपी को निर्दोष माना जाता है।”
अंतिम फैसला
पटना उच्च न्यायालय ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ अपराध को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। अदालत ने 2004 के दोषसिद्धि व सजा के फैसले को रद्द (Set Aside) करते हुए जीवित बचे चारों आरोपियों को सभी आरोपों से पूरी तरह बरी (Acquit) कर दिया।
Committed Rape: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति जी. अनुपमा चक्रवर्ती (Justice G. Anupama Chakravarthy) |
| मामले की पृष्ठभूमि | 1998 की घटना; 2004 में ट्रायल कोर्ट ने 10 साल की सजा सुनाई थी |
| संबंधित कानून | IPC की धारा 376(2)(g) (गैंगरेप) |
| अदालत का निर्णय | 4 जीवित आरोपियों की दोषसिद्धि रद्द, पूर्ण बरी (1 आरोपी की अपील के दौरान मौत) |

