Thursday, October 15, 2026
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Arresting In Divorce Case: वैवाहिक विवादों में ‘यांत्रिक तरीके से अरेस्ट’ नहीं; पीड़ित पिता-पुत्र को ₹9 लाख का मुआवजा मिला, पूरा केस यहां समझें

मामले की पृष्ठभूमि और 10 साल पुराना विवाद

  • अवैध LOC और गिरफ्तारी: ब्रिटेन में सलाहकार के रूप में कार्यरत 31 वर्षीय नवीन कुमार को मार्च 2014 में अपनी पत्नी द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर हवाई अड्डे पर उतरते ही लुकआउट सर्कुलर (LOC) के तहत गिरफ्तार कर लिया गया था।
  • अग्रिम जमानत की अनदेखी: नवीन कुमार को 10 जून 2014 को ही सक्षम अदालत से अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) मिल चुकी थी। इसके बावजूद पुलिस निरीक्षक ने बिना वारंट उन्हें गिरफ्तार किया और उनके 68 वर्षीय पिता जावरा शेट्टी को अवैध हिरासत में रखकर प्रताड़ित किया (जबकि पिता का नाम आरोप पत्र में आरोपी के रूप में भी नहीं था)।
  • पुलिस की लापरवाही पर कार्रवाई: अदालत ने माना कि पुलिस अधिकारी ने कानून की शक्तियों का दुरुपयोग किया और अग्रिम जमानत आदेश की अवहेलना की। इसके चलते हाईकोर्ट ने बेंगलुरु पुलिस आयुक्त को तीन सप्ताह के भीतर दोनों पीड़ितों को कुल ₹9 लाख का मुआवजा देने का निर्देश दिया।

बेंगलुरु: कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में व्यवस्था दी है कि वैवाहिक विवादों और दहेज प्रताड़ना (धारा 498A IPC / धारा 85 BNS) से जुड़े मामलों में किसी भी व्यक्ति को “यांत्रिक और नियमित तरीके” (Mechanical or Routine Manner) से गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज की एकल पीठ ने वर्ष 2014 के एक अवैध गिरफ्तारी मामले में सुनवाई करते हुए पुलिस महानिदेशक (DGP) को पुलिस अधिकारियों के लिए संवेदीकरण व प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने के निर्देश दिए। साथ ही अदालत ने बेंगलुरु पुलिस कमिश्नर को पीड़ित नवीन कुमार को ₹5 लाख और उनके 68 वर्षीय पिता पी. जवारा शेट्टी को ₹4 लाख का मुआवजा (कुल ₹9 लाख) तीन सप्ताह के भीतर भुगतान करने का आदेश दिया। अदालत ने अवैध गिरफ्तारी और हिरासत से बचने के लिए पुलिस को गिरफ्तारी से पहले 14 दिनों के भीतर अनिवार्य प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) करने का निर्देश दिया है।

उच्च न्यायालय की प्रमुख कानूनी टिप्पणियां

अदालत ने गिरफ्तारी के संवैधानिक व कानूनी सुरक्षा उपायों पर जोर देते हुए 4 अगस्त के अपने आदेश में कहा: “न तो प्राथमिकी (FIR) का दर्ज होना और न ही प्रथम दृष्टया मामले का अस्तित्व अपने आप में गिरफ्तारी को न्यायसंगत ठहराता है। जांच अधिकारी को कारण दर्ज करते हुए और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) मामले में तय शर्तों का कड़ाई से पालन करते हुए गिरफ्तारी की आवश्यकता को अलग से संतुष्ट करना होगा। अधिकारी को पहले खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि गिरफ्तारी क्यों जरूरी है और इससे क्या उद्देश्य पूरा होगा।”

आपराधिक प्रक्रिया के दुरुपयोग पर पीठ ने रेखांकित किया: “वैवाहिक विवादों के मामलों में जांच अधिकारियों को अत्यधिक सावधानी और सतर्कता से जांच करनी चाहिए। आपराधिक प्रक्रिया को किसी भी पक्ष पर मौद्रिक या संपत्ति की मांग पूरी करने या जबरन समझौता कराने के दबाव के हथियार (Coercive Instrument) के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

10 साल पुराना अवैध गिरफ्तारी मामला

  • लुकआउट सर्कुलर (LOC) पर गिरफ्तारी: याचिकाकर्ता नवीन कुमार ब्रिटेन (UK) में कंसल्टेंट के रूप में कार्यरत थे। मार्च 2014 में उनकी पत्नी द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर उनके खिलाफ लुकआउट सर्कुलर जारी किया गया था। भारत आगमन पर हवाई अड्डे पर उन्हें हिरासत में ले लिया गया और उनका पासपोर्ट जब्त कर लिया गया।
  • अग्रिम जमानत की अनदेखी: नवीन कुमार को सक्षम अदालत से 10 जून 2014 को पहले ही अग्रिम जमानत मिल चुकी थी। इसके बावजूद पुलिस इंस्पेक्टर ने बिना गैर-जमानती वारंट के उन्हें गिरफ्तार किया।
  • बुजुर्ग पिता की अवैध हिरासत व मारपीट: आरोप पत्र में नाम न होने के बावजूद उनके 68 वर्षीय पिता को भी थाने में अवैध रूप से हिरासत में रखा गया और उनके साथ मारपीट की गई।

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अदालत का निष्कर्ष: पुलिस शक्तियों का घोर दुरुपयोग

  1. LOC और जब्ती अवैध: अदालत ने पाया कि LOC जारी करना, नवीन कुमार की गिरफ्तारी और पासपोर्ट की जब्ती CrPC, पासपोर्ट अधिनियम और कार्यकारी निर्देशों के पूरी तरह विपरीत और अवैध थी।
  2. जमानत आदेश का अनादर: मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने पर अदालत ने पाया कि अग्रिम जमानत प्रभावी थी। आदेश दिखाने के बावजूद इंस्पेक्टर ने CrPC की धारा 438(3) के तहत जमानत पर रिहा करने के दायित्व का पालन नहीं किया।
  3. अर्नेश कुमार दिशानिर्देशों का उल्लंघन: अदालत ने स्पष्ट किया कि 7 वर्ष तक की सजा वाले किसी भी अपराध में गिरफ्तारी के अनिवार्य सुरक्षा उपायों का उल्लंघन पुलिस अधिकारियों की ओर से कानून का घोर दुरुपयोग है।

उच्च न्यायालय द्वारा जारी प्रमुख दिशा-निर्देश

  • 14 दिनों में प्रारंभिक जांच: वैवाहिक विवादों से संबंधित शिकायतों में पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी से पहले 14 दिनों के भीतर प्रारंभिक जांच पूरी करेंगे।
  • अग्रिम जमानत का सत्यापन: गिरफ्तारी से पहले जांच अधिकारी यह अनिवार्य रूप से सत्यापित करेंगे कि संबंधित व्यक्ति को सक्षम अदालत से अग्रिम राहत प्राप्त है या नहीं।
  • पुलिस प्रशिक्षण: राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया गया है कि वे पुलिसकर्मियों के लिए गिरफ्तारी और हिरासत के सुरक्षा उपायों (विशेषकर वैवाहिक मामलों में) पर नियमित संवेदीकरण और प्रशिक्षण कार्यशालाएं आयोजित करें।
  • मुआवजा भुगतान: राज्य/बेंगलुरु पुलिस आयुक्त को आदेश दिया गया कि वे अवैध हिरासत और अधिकारों के हनन के एवज में पिता-पुत्र को 3 सप्ताह के भीतर ₹9 लाख का मुआवजा प्रदान करें।
  • अर्नेश कुमार फैसले का सख्ती से पालन: कोर्ट ने दोहराया कि केवल FIR दर्ज होना या प्रथम दृष्टया मामला बनना ही गिरफ्तारी का आधार नहीं है। अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) के तहत 7 साल से कम सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी के कारणों को लिखित रूप से दर्ज करना अनिवार्य है।
  • जमानत स्थिति की जांच अनिवार्य: किसी भी आरोपी को गिरफ्तार करने से पहले जांच अधिकारी (IO) की यह जिम्मेदारी है कि वह जांचे कि आरोपी को किसी कोर्ट से अग्रिम जमानत मिली है या नहीं।
  • दबाव बनाने का हथियार न बने पुलिस प्रक्रिया: कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक मामलों में पुलिस जांच में अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए। आपराधिक प्रक्रिया का उपयोग वित्तीय/संपत्ति की मांगों को पूरा कराने या जबरन समझौते के हथियार के रूप में नहीं होना चाहिए।
  • पुलिस अधिकारियों का संवेदीकरण: हाईकोर्ट ने राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया कि वे वैवाहिक विवादों में गिरफ्तारी और हिरासत के कानूनी नियमों का पालन कराने के लिए पुलिस अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करें।

कर्नाटक हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा: “वैवाहिक विवाद से उत्पन्न किसी भी अपराध में, जिसमें धारा 498-A (BNS 85) या 7 साल तक की सजा वाले मामले शामिल हैं, किसी भी व्यक्ति को नियमित या यांत्रिक तरीके से गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। जांच अधिकारी को पहले खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि गिरफ्तारी की आवश्यकता क्यों है और इससे क्या उद्देश्य पूरा होगा।”

Arresting In Divorce Case: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज (Justice Suraj Govindaraj)
संबंधित धाराएंIPC धारा 498-A (अब BNS धारा 85), CrPC धारा 438, पासपोर्ट अधिनियम 1967
मुआवजा आदेशबेटा (नवीन कुमार): ₹5 लाख
अदालत का अंतिम निर्णयअवैध गिरफ्तारी पर मुआवजा मंजूर; DGP को पुलिस संवेदीकरण (Sensitisation) का निर्देश।

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