Thursday, October 15, 2026
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Interim Maintenance: तस्वीरों में ‘बेसहारा’ न दिखने के आधार पर पत्नी का भरण-पोषण नहीं रोका जा सकता; फैमिली कोर्ट का आदेश किया रद्द, केस जानें

मुख्य बिंदु (Key Highlights)

  • तस्वीरें कोई कानूनी पैमाना नहीं: फैमिली कोर्ट ने पति द्वारा पेश की गई तस्वीरों को देखकर मान लिया था कि पत्नी बेसहारा नहीं दिखती, इसलिए वह अंतरिम भरण-पोषण की हकदार नहीं है। एमपी हाईकोर्ट ने इसे गंभीर क्षेत्राधिकार त्रुटि (Patent Jurisdictional Error) करार दिया।
  • आय के आकलन में फैमिली कोर्ट की गलती: पत्नी के हलफनामे में छपे हिंदी प्रारूप के भ्रम (शब्द ‘विपक्षी’ के उपयोग) के कारण पारिवारिक अदालत ने माना कि पत्नी खुद ₹1.5 लाख प्रति माह कमाती है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह ₹1.5 लाख की आय पत्नी की नहीं, बल्कि पति की आय बताई गई थी, जिसे फैमिली कोर्ट ने गलत पढ़ लिया।
  • सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का उल्लंघन: सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क फैसलों के अनुसार भरण-पोषण का फैसला करने से पहले दोनों पक्षों (विशेषकर पति) से संपत्ति और देनदारियों का ब्योरा (Disclosure Affidavit) लेना अनिवार्य है, जिसे फैमिली कोर्ट ने नजरअंदाज कर दिया था।
  • प्रक्रियात्मक न्याय सर्वोपरि: हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही मुख्य तलाक मामले के जल्द निपटारे का निर्देश दिया गया हो, लेकिन जल्दबाजी के चक्कर में अनिवार्य कानूनी प्रक्रियाओं (Due Process of Law) को दरकिनार नहीं किया जा सकता।

जबलपुर/ग्वालियर: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था देते हुए कहा है कि केवल पति द्वारा प्रस्तुत तस्वीरों में पत्नी के “बेसहारा” (Destitute) न दिखने के आधार पर अंतरिम भरण-पोषण से इनकार नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति अमित सेठ की एकल पीठ ने पत्नी की याचिका स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट के 15 मई के उस आदेश को रद्द (Set Aside) कर दिया, जिसके जरिए पत्नी के अंतरिम भरण-पोषण के दावे को खारिज कर दिया गया था। उच्च न्यायालय ने पति से अनिवार्य संपत्ति और देनदारी हलफनामा (Asset and Liability Disclosure Affidavit) लेकर मामले पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानूनन भरण-पोषण का निर्धारण करने के लिए यह कोई वैध कानूनी आधार नहीं है।

उच्च न्यायालय की प्रमुख कानूनी टिप्पणियां

फैमिली कोर्ट के क्षेत्राधिकार की त्रुटि पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने 20 अगस्त के अपने आदेश में कहा: “फैमिली कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वादकालीन भरण-पोषण (Maintenance Pendente Lite) के दावे को इस आधार पर खारिज करके गंभीर क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि (Patent Jurisdictional Error) की है कि पति द्वारा प्रस्तुत तस्वीरों से वह बेसहारा प्रतीत नहीं होती। भरण-पोषण के दावे का निर्णय करने के लिए यह कोई कानूनी विचारणीय बिंदु नहीं हो सकता।”

प्रक्रियागत नियमों की अनदेखी पर पीठ ने कहा: “हालांकि मुख्य तलाक के मुकदमे के शीघ्र निपटारे के निर्देश दिए गए थे, लेकिन शीघ्रता का मतलब यह नहीं हो सकता कि कानून की उचित प्रक्रिया को दरकिनार कर दिया जाए या अनिवार्य प्रक्रियागत आवश्यकताओं की अनदेखी की जाए।”

मामले की पृष्ठभूमि और विवाद

  • 2003 में विवाह और तलाक की अर्जी: दंपत्ति का विवाह जुलाई 2003 में हुआ था। लंबे समय तक अलग रहने के बाद पति ने हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) की धारा 13(1)(i-a) और 13(1)(i-b) के तहत क्रूरता व परित्याग के आधार पर तलाक की याचिका दायर की।
  • धारा 24 के तहत गुजारा भत्ते की मांग: तलाक की कार्यवाही के दौरान पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत ₹1 लाख प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण और ₹20,000 मुकदमे के खर्च की मांग करते हुए हलफनामा दाखिल किया।
  • पति की दलील व तस्वीरें: पति ने यह दावा करते हुए भरण-पोषण का विरोध किया कि पत्नी एक संस्था की सचिव के रूप में काम कर रही है और अन्य स्रोतों से ₹1.5 लाख प्रति माह कमा रही है। उसने पत्नी की कुछ तस्वीरें पेश कर तर्क दिया कि वह आत्मनिर्भर है।
  • फैमिली कोर्ट का फैसला: फैमिली कोर्ट ने तस्वीरों और कथित आय के आधार पर पत्नी का भरण-पोषण खारिज कर दिया और केवल ₹6,000 मुकदमे के खर्च के रूप में दिए।

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हाईकोर्ट द्वारा फैमिली कोर्ट के आदेश में पाई गई खामियां

  1. तस्वीरों की विधिक अप्रासंगिकता: अदालत ने माना कि किसी महिला की तस्वीरों से उसके रहन-सहन का आकलन कर उसे ‘बेसहारा न दिखने’ के आधार पर गुजारा भत्ते से वंचित करना कानूनन गलत है।
  2. आय के आंकड़े की गलत व्याख्या: अदालत ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने पत्नी के हिंदी हलफनामे के प्रारूप (जिसमें ‘विपक्षी’ शब्द का अस्पष्ट उपयोग था) को गलत समझा। हलफनामे में दर्ज ₹1.5 लाख की मासिक आय दरअसल पति की अन्य स्रोतों से होने वाली आय का उल्लेख थी, न कि पत्नी की खुद की आय।
  3. पति के अनिवार्य हलफनामे का अभाव: सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले (रजनेश बनाम नेहा) के अनिवार्य दिशा-निर्देशों के बावजूद, फैमिली कोर्ट ने पति से संपत्ति और देनदारी का प्रकटीकरण हलफनामा मंगाए बिना ही भरण-पोषण की अर्जी खारिज कर दी थी।

अंतिम निर्देश

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने पत्नी की याचिका स्वीकार करते हुए मामले को वापस फैमिली कोर्ट भेज दिया और निर्देश दिया:

  • प्रतिवादी-पति से अनिवार्य संपत्ति व देनदारी प्रकटीकरण हलफनामा लिया जाए।
  • पत्नी के धारा 24 HMA के तहत अंतरिम भरण-पोषण के आवेदन पर स्थापित कानूनी प्रक्रिया और दोनों पक्षों के वास्तविक वित्तीय साक्ष्यों के आधार पर नए सिरे से निर्णय लिया जाए।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की टिप्पणी

न्यायमूर्ति अमित सेठ ने अपना आदेश सुनाते हुए कहा: “फैमिली कोर्ट ने याचिकाकर्ता के अंतरिम भरण-पोषण के दावे को केवल इस आधार पर खारिज करके गंभीर अधिकार क्षेत्र संबंधी गलती की है कि प्रतिवादी द्वारा पेश तस्वीरों में वह बेसहारा नहीं दिखती। भरण-पोषण के दावे का फैसला करने के लिए यह कोई कानूनी विचार नहीं हो सकता है।”

Interim Maintenance: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतमध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (Madhya Pradesh High Court)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति अमित सेठ (Justice Amit Seth)
संबंधित कानूनहिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24 (अंतरिम भरण-पोषण) और धारा 13 (तलाक)
विवाद का कारणतस्वीरों व आय के गलत आकलन के आधार पर पत्नी का गुजारा भत्ता खारिज होना
अदालत का निर्णयफैमिली कोर्ट का आदेश रद्द; पति का संपत्ति हलफनामा लेकर नए सिरे से सुनवाई का आदेश।
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