Thursday, October 15, 2026
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Dowry Case: प्रताड़ित बेटियों को ससुराल वापस भेजने वाले माता-पिता भी उत्पीड़न के दुष्प्रेरक; 27 साल पुराने केस में पति को बरी करते हुए टिप्पणी को पढ़ें

मुख्य बिंदु (Key Highlights)

  • माता-पिता की मानसिकता पर कड़ा प्रहार: कोर्ट ने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि भारत में यह एक दुर्भाग्यपूर्ण और प्रचलित प्रथा है कि बेटी को शादी के बाद बोझ माना जाता है और माता-पिता उसके भाग्य से अपना हाथ खींच लेते हैं। बेटी द्वारा हत्या की आशंका जताने के बावजूद उसे ससुराल वापस भेजना बेहद चिंताजनक है।
  • मृत्युपूर्व बयान (Dying Declaration) की भूमिका: पीड़िता ने अपनी मां को दिए बयान (और मृत्युपूर्व कथन) में स्पष्ट कहा था कि उसकी सास और ननद ने उसके हाथ-पैर बांधकर उसे आग लगाई थी।
  • पति को दहेज हत्या से बरी करने का कारण: साक्ष्यों और मृत्युपूर्व बयान से यह सामने आया कि जब महिला को आग लगाई गई, तो पति ने पानी से भरी बाल्टी डालकर आग बुझाने की कोशिश की थी और उसे इलाज के लिए अस्पताल ले गया था। आग लगाने में उसकी सीधी भूमिका साबित न होने के कारण उसे धारा 304-B (दहेज हत्या) से बरी किया गया, लेकिन धारा 498-A (क्रूरता) और दहेज प्रतिषेध अधिनियम के तहत उसकी सजा बरकरार रखी गई।
  • सरेंडर का निर्देश: अदालत ने तीनों दोषियों को तीन सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण (Surrender) करने का आदेश दिया है।

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दहेज प्रताड़ना और जान के खतरे की जानकारी होने के बावजूद अपनी बेटियों को बार-बार ससुराल वापस भेजने वाले माता-पिता के रवैये पर गहरी पीड़ा व्यक्त की है।

न्यायमूर्ति मनीष माथुर की एकल पीठ ने 1999 के एक 27 साल पुराने दहेज हत्या मामले में आंशिक रूप से अपील स्वीकार करते हुए यह टिप्पणियां कीं। अदालत ने पीड़िता की सास और ननद की दोषसिद्धि को बरकरार रखा, जबकि पति को दहेज हत्या (धारा 304B) के आरोप से बरी कर दिया क्योंकि उसने आग बुझाने की कोशिश की थी। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे माता-पिता वास्तव में दहेज के लिए प्रताड़ित की जाने वाली या मार दी जाने वाली दुल्हनों के ससुराल वालों के ‘दुष्प्रेरक’ (Abettor) बन जाते हैं।

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सामाजिक मानसिकता पर उच्च न्यायालय की तीखी टिप्पणी

अदालत ने भारतीय समाज में बेटियों के प्रति संकीर्ण दृष्टिकोण पर प्रहार करते हुए 25 अगस्त के अपने आदेश में कहा: “दुर्भाग्य से भारत में यह एक प्रचलित प्रथा है कि बेटी को माता-पिता पर बोझ माना जाता है, जो शादी होते ही उसके भाग्य से अपना पल्ला झाड़ लेते हैं और उसके बाद उसकी भलाई से पूरी तरह बेपरवाह हो जाते हैं। दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित या हत्या की शिकार होने वाली ऐसी दुल्हनों के माता-पिता का यह आचरण वास्तव में ऐसे ससुराल वालों को बढ़ावा देने (Abetting) जैसा है।”

न्यायाधीश ने अफसोस जताया कि पीड़िता द्वारा बार-बार प्रताड़ना और यहां तक कि हत्या की आशंका जताने के बावजूद उसके माता-पिता उसकी गुहार को नजरअंदाज कर उसे लगातार उसी प्रताड़ना वाले ससुराल में वापस भेजते रहे।

1999 का दहेज हत्या मामला और ट्रायल कोर्ट का फैसला

  • दहेज की मांग और जिंदा जलाना: पीड़िता का विवाह होने के दो वर्ष के भीतर ही यह घटना घटी। ससुराल वाले दहेज में भैंस, टेलीविजन और साइकिल की मांग को लेकर उसे प्रताड़ित कर रहे थे। वर्ष 1999 में पीड़िता को कथित तौर पर जिंदा जला दिया गया, जिसकी अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई।
  • निचली अदालत का फैसला: ट्रायल कोर्ट ने पति, सास और ननद तीनों को आईपीसी की धारा 498A (क्रूरता), धारा 304B (दहेज हत्या) और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत दोषी ठहराया था।

हाईकोर्ट का साक्ष्यों का विश्लेषण

उच्च न्यायालय ने पाया कि विवाह के दो वर्ष के भीतर अप्राकृतिक (जलने से) मृत्यु और दहेज प्रताड़ना के आधार पर धारा 304B के मूल तत्व मौजूद थे:

  • डाइंग डिक्लेरेशन में सास-ननद का नाम: पीड़िता ने अपनी मां को दिए मृत्यु पूर्व बयान (Dying Declaration) में स्पष्ट बताया था कि उसकी सास और ननद ने उसके हाथ-पैर बांधकर उसे आग लगाई थी। इसके आधार पर दोनों महिलाओं की दोषसिद्धि को पूरी तरह सही ठहराया गया।
  • पति की भूमिका और आग बुझाने का प्रयास: अदालत ने रिकॉर्ड पर पाया कि पति आग लगाने में शामिल नहीं था। इसके विपरीत, पीड़िता के बयान से साबित हुआ कि जब वह जल रही थी, तो पति ने बाल्टी से पानी डालकर आग बुझाने का प्रयास किया था और उसे तुरंत इलाज के लिए अस्पताल ले गया था।

अंतिम फैसला

  1. पति को धारा 304B से राहत: अदालत ने पति की धारा 304B (दहेज हत्या) के तहत दोषसिद्धि को रद्द कर दिया। हालांकि, दहेज प्रताड़ना के लिए धारा 498A IPC और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत उसकी सजा को बरकरार रखा।
  2. सास और ननद की सजा बरकरार: दोनों महिला आरोपियों की धारा 304B और 498A के तहत दोषसिद्धि और सजा को पूरी तरह बरकरार रखा गया।
  3. तीन सप्ताह में सरेंडर का आदेश: उच्च न्यायालय ने तीनों दोषियों को अपनी शेष सजा काटने के लिए तीन सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण (Surrender) करने का निर्देश दिया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी

न्यायमूर्ति मनीष माथुर ने अपने फैसले में कहा:“दुर्भाग्य से भारत में यह एक प्रचलित प्रथा है कि बेटी को उसके माता-पिता द्वारा बोझ माना जाता है, जो उसकी शादी होते ही उसके भाग्य से अपना पल्ला झाड़ लेते हैं और उसके बाद उसकी भलाई से बेखबर हो जाते हैं। ऐसी दुल्हनें जो दहेज की मांग के कारण प्रताड़ित की जाती हैं या मार दी जाती हैं, उनके माता-पिता का यह आचरण वास्तव में ऐसे ससुराल वालों को उकसाने वाला (Abettor) होता है।”

Dowry Case: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति मनीष माथुर (Justice Manish Mathur)
मामले की पृष्ठभूमि1999 में शादी के 2 साल के भीतर महिला को जलाकर मार देने का आरोप
दहेज की मांगभैंस, टेलीविजन और साइकिल
अदालत का निर्णयसास व ननद की धारा 304-B IPC में सजा बरकरार; पति धारा 304-B से बरी, धारा 498-A में दोषी।
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