Tuesday, September 8, 2026
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Guess Income: पति की आय के केवल अनुमान पर तय नहीं किया जा सकता गुजारा भत्ता; साक्ष्य जरूरी है, बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को जरूर पढ़ें

हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और निर्देश

  1. बिना साक्ष्य के अनुमान अमान्य: हाईकोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे पति की वास्तविक आय या पत्नी की वास्तविक जरूरतों का पता चले। न्यायाधीश ने कहा:“फैमिली कोर्ट के जज ने इस बात का बिना किसी सबूत के केवल अनुमान लगाया है कि पति की आय कितनी है और पत्नी की जरूरत क्या है।”
  2. वास्तविक आय के अनुपात में हो भत्ता: अदालत ने स्पष्ट किया कि स्थायी गुजारा भत्ता और भरण-पोषण (Maintenance) हमेशा पति की वास्तविक कमाई और पत्नी/बच्चों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुरूप (Commensurate) होना चाहिए।
  3. 6 महीने की समय-सीमा: हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को पति की कमाई और पत्नी की जरूरतों का पूरा ब्योरा तैयार कर 6 महीने के भीतर नए सिरे से फैसला करने का आदेश दिया। तब तक के लिए बच्चे के रखरखाव हेतु ₹10,000 प्रति माह के अंतरिम भुगतान को बरकरार रखा गया है।

मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने भरण-पोषण और स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony) तय करने के संबंध में एक महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत दोहराते हुए कहा है कि अदालतें पति की आय और पत्नी की वास्तविक जरूरतों का निर्धारण केवल कयासों या अनुमान (Guesswork) के आधार पर नहीं कर सकतीं।

न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति आशीष एस. चव्हाण की खंडपीठ ने मामले को नए सिरे से विचार करने के लिए पुणे फैमिली कोर्ट को वापस (Remand) भेजते हुए 6 महीने के भीतर उचित साक्ष्यों के आधार पर निर्णय लेने का निर्देश दिया। अदालत ने पुणे की फैमिली कोर्ट द्वारा पति की आय का मनमाना अनुमान लगाकर पत्नी को ₹10 लाख का स्थायी गुजारा भत्ता देने के आदेश को रद्द कर दिया है।

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उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां

1. बिना साक्ष्य के कयास लगाना न्यायिक रूप से अस्वीकार्य फैमिली कोर्ट के दृष्टिकोण को खारिज करते हुए खंडपीठ ने कहा: “विद्वान न्यायाधीश ने रिकॉर्ड पर बिना किसी साक्ष्य के केवल कयास (Guesswork) लगाया है कि पति की आय क्या है और पत्नी की जरूरतें क्या हैं। स्थायी गुजारा भत्ता और बेटी के भरण-पोषण की राशि का निर्धारण पति की वास्तविक कमाई के अनुरूप (Commensurate) होना चाहिए।”

2. कमाई और जरूरतों का विवरण अनिवार्य अदालत ने स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट को दोनों पक्षों की वित्तीय स्थिति, पति की वास्तविक आय और पत्नी की अनिवार्य आवश्यकताओं का ब्योरा दर्ज करके ही उचित गुजारा भत्ता तय करना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि और विवाद

  • तलाक और एकतरफा आदेश: पति ने क्रूरता के आधार पर तलाक के लिए पुणे फैमिली कोर्ट का रुख किया था। पत्नी ने मामले में अपना पक्ष नहीं रखा (No Defence)। फैमिली कोर्ट ने विवाह विच्छेद (Divorce) की डिक्री पारित करते हुए पति को ₹10 लाख का एकमुश्त स्थायी गुजारा भत्ता और बेटी के लिए ₹10,000 प्रति माह भरण-पोषण देने का आदेश दिया।
  • फैमिली कोर्ट का अनुमान: पति की आय के ठोस दस्तावेज न होने पर फैमिली कोर्ट ने यह मान लिया था कि चूंकि पति एक कुशल और योग्य पेशेवर है और पहले जर्मनी में काम कर चुका है, इसलिए उसकी मासिक शुद्ध आय कम से कम ₹1 लाख प्रति माह होगी।
  • हाईकोर्ट में चुनौती: पति ने वित्तीय आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए तर्क दिया कि बिना किसी दस्तावेजी सबूत के अदालत का उसकी आय का अनुमान लगाना मनमाना और गैर-कानूनी है।
  • पारिवारिक अदालत का फैसला: पति ने क्रूरता (Cruelty) के आधार पर तलाक की अर्जी दाखिल की थी। पत्नी ने मुकदमे का बचाव नहीं किया। फैमिली कोर्ट ने शादी को भंग करते हुए पति को ₹10 लाख स्थायी गुजारा भत्ता और बेटी के लिए ₹10,000 प्रति माह देने का आदेश दिया।

हाईकोर्ट का अंतिम निर्देश

  1. ₹10 लाख का आदेश रद्द: हाईकोर्ट ने ₹10 लाख के स्थायी गुजारा भत्ते के आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया।
  2. 6 महीने में नए सिरे से फैसला: पुणे फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया गया है कि वह दोनों पक्षों के साक्ष्यों की जांच कर 6 महीने के भीतर नए सिरे से गुजारा भत्ते और मेंटेनेंस की राशि का निर्धारण करे।
  3. बच्ची का मेंटेनेंस जारी रहेगा: अंतिम फैसला आने तक बच्ची के लिए तय ₹10,000 प्रति माह का भरण-पोषण पति को नियमित रूप से जारी रखना होगा।

विधिक प्रतिनिधित्व

  • पति की ओर से: अधिवक्ता अश्विन पिंपले।
  • पत्नी की ओर से: अधिवक्ता अमतुज़ेहरा चिमठानावाला।

Guess Income: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतबॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court)
खंडपीठन्यायमूर्ति भारती डांगरे एवं न्यायमूर्ति आशीष एस. चव्हाण
मूल अदालतफैमिली कोर्ट, पुणे
मुख्य निर्णयबिना साक्ष्य के अनुमानित आय के आधार पर गुजारा भत्ता तय करना गलत; मामला 6 महीने में नए सिरे से तय करने का निर्देश।
बच्ची का भरण-पोषणबच्चे के लिए ₹10,000/माह का भरण-पोषण भत्ता फिलहाल जारी रहेगा।
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