दिल्ली हाईकोर्ट का मुख्य कानूनी निष्कर्ष
- सार्वजनिक हित (Public Interest) प्राथमिकता: अदालत ने माना कि CCI की जांच मुख्य रूप से प्रतिस्पर्धा-विरोधी प्रथाओं को रोकने और उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा करके सार्वजनिक हित हासिल करने के लिए होती है। ऐसे में किसी पर्याप्त हित रखने वाले पक्ष को शामिल करने से नियामक को सही निष्कर्ष तक पहुंचने में मदद मिलती है।
- अधिकारों का अंतिम निर्धारण नहीं (No Determination of Rights): हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी तीसरे पक्ष को कार्यवाही में शामिल करने (Impleadment) मात्र से किसी भी पक्ष के कानूनी अधिकारों या दायित्वों का अंतिम निर्धारण नहीं होता। यह केवल एक प्रक्रियात्मक कदम है ताकि आयोग को सभी जरूरी तथ्य और दृष्टिकोण मिल सकें।
- कोई पक्ष ‘Dominus Litis’ का दावा नहीं कर सकता: अदालत ने कहा कि CCI के समक्ष कार्यवाही का सामना कर रही कोई भी कंपनी ‘डोमिनस लिटिस’ (Dominus Litis) होने का दावा नहीं कर सकती, यानी वह यह जिद नहीं कर सकती कि केवल वही तय करेगी कि मामले में कौन शामिल हो सकता है।
- अलग-अलग चरणों में अर्जी: अदालत ने खारिज किया कि यह पूर्व आदेश की समीक्षा थी। पहली अर्जी DG जांच के दौरान (शुरुआती स्तर) खारिज हुई थी, जबकि दूसरी अर्जी जांच रिपोर्ट जमा होने के बाद (अंतिम स्तर) स्वीकार की गई, इसलिए परिस्थितियों में बदलाव था।
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रतिस्पर्धा कानून (Competition Law) के तहत भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) के समक्ष चलने वाली कार्यवाहियों के दायरे को लेकर एक महत्वपूर्ण विधिक निर्णय दिया है।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने सीमेंट निर्माताओं द्वारा कथित कार्टेलाइजेशन (मूल्य साठगांठ) के मामले में ‘बिल्डर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ (BAI) को कार्यवाही में पक्षकार बनाने के सीसीआई के आदेश के खिलाफ दायर ‘अल्ट्राटेक सीमेंट’ (UltraTech Cement) की अपील को खारिज कर दिया [अल्ट्राटेक सीमेंट बनाम सीसीआई एवं अन्य]। अदालत ने फैसला सुनाया है कि यदि किसी मामले में प्रतिस्पर्धा-रोधी गतिविधियों (Anti-Competitive Practices) की जांच चल रही है, तो पर्याप्त हित या रुचि रखने वाले किसी भी व्यक्ति, संगठन या उद्यम को आयोग की कार्यवाही में शामिल (Implead) होने की अनुमति दी जा सकती है, जिससे जनहित को बढ़ावा मिले और नियामक को सही निष्कर्ष पर पहुंचने में सहायता प्राप्त हो सके।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
1. जनहित को आगे बढ़ाने के लिए पक्षकार बनाना वैध प्रतिस्पर्धा आयोग के अधिकार क्षेत्र और जनहित पर टिप्पणी करते हुए खंडपीठ ने कहा: “यदि आयोग द्वारा प्रतिस्पर्धा-रोधी प्रथाओं में लिप्त होने के आरोपों के संबंध में कुछ संस्थाओं के खिलाफ जांच/पूछताछ की जा रही है, तो मामले में पर्याप्त रुचि (Sufficient Interest) रखने वाले किसी भी पक्षकार, संगठन या उद्यम को आयोग की कार्यवाही में शामिल किया जा सकता है। हमारी राय में यह कदम केवल जनहित को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से होगा।”
2. जांच का सामना कर रही कंपनी ‘Dominus Litis’ नहीं हो सकती अदालत ने स्पष्ट किया:
- सीसीआई के समक्ष जांच का सामना कर रही कोई भी कंपनी या पक्षकार खुद को ‘डोमिनस लिटिस’ (मुकदमे का एकमात्र नियंत्रक) होने का दावा नहीं कर सकता, और न ही यह जिद कर सकता है कि कार्यवाही में कौन भाग ले सकता है और कौन नहीं।
- सीसीआई द्वारा किसी पक्ष को कार्यवाही में शामिल करने से जांच के दायरे में मौजूद संस्था या पक्षकार बनने वाले पक्ष के अंतिम अधिकारों और दायित्वों का कोई वैधानिक निर्धारण नहीं होता। यह केवल एक प्रक्रियात्मक कदम है ताकि आयोग सभी दृष्टिकोणों और साक्ष्यों को समझकर एक सुविज्ञ निर्णय (Informed Decision) ले सके।
3. आवेदन के स्तर अलग-अलग होने पर आदेश की समीक्षा नहीं अदालत ने अल्ट्राटेक की उस दलील को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि चूंकि BAI का पूर्व आवेदन खारिज हो चुका था, इसलिए नया आवेदन स्वीकार करना अवैध समीक्षा (Review) है। कोर्ट ने नोट किया कि पहला आवेदन तब खारिज हुआ था जब महानिदेशक (DG) की जांच चल रही थी, जबकि दूसरा आवेदन जांच रिपोर्ट प्रस्तुत होने के बाद सीसीआई रेगुलेशन 25 के तहत दाखिल किया गया था, जो पूरी तरह भिन्न चरण था।
मामले की पृष्ठभूमि (सीमेंट कार्टेलाइजेशन विवाद)
- 2019 में स्वतः संज्ञान जांच: सीसीआई ने 2019 में ग्रे सीमेंट निर्माताओं द्वारा साठगांठ (Cartelisation) करने और सीमेंट की कीमतों में असामान्य वृद्धि करने के आरोपों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए जांच शुरू की थी। बिल्डर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BAI) उन प्रमुख निकायों में से एक था जिसने नियामक से शिकायत की थी।
- DG रिपोर्ट और BAI की भागीदारी: जुलाई 2022 में महानिदेशक (Director General) ने जांच पूरी कर अपनी रिपोर्ट सीसीआई को सौंपी। इसके बाद BAI ने कार्यवाही में शामिल होने की अनुमति मांगी।
- जुलाई 2023 का CCI आदेश: सीसीआई ने ‘सीसीआई (सामान्य) विनियम, 2009’ के विनियम 25 के तहत BAI के आवेदन को मंजूरी दे दी। आयोग ने पाया कि परिणाम में BAI का पर्याप्त हित है और उसे गैर-गोपनीय रिकॉर्ड का निरीक्षण करने व जांच रिपोर्ट पर अपनी राय प्रस्तुत करने की अनुमति दी।
- अल्ट्राटेक की चुनौती: अल्ट्राटेक सीमेंट ने सीसीआई के इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसे हाईकोर्ट ने पूरी तरह खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
अदालत ने प्रतिस्पर्धा आयोग के फैसले को पूरी तरह विधि सम्मत ठहराते हुए अल्ट्राटेक सीमेंट की अपील को खारिज कर दिया और BAI को सीमेंट कार्टेल मामले की कार्यवाही में अपनी बात रखने व गैर-गोपनीय रिकॉर्ड्स के आधार पर राय देने की अनुमति बरकरार रखी।
विधिक प्रतिनिधित्व
- अपीलकर्ता (UltraTech Cement) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी, अधिवक्ता निशा कौर ओबेरॉय, शांभवी सिन्हा, सार्थक पांडे, शिवांगी चावला, आफरीन अब्बासी, मेहर सिंह डांग, सुधांशु प्रकाश सिंह और उदय भाटिया (JSA एडवोकेट्स एंड सॉलिसिटर्स)।
- प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) की ओर से: अधिवक्ता आकांक्षा कौल।
- बिल्डर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BAI) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता पर्सिवल बिलिमोरिया, अधिवक्ता अनु मोंगा, राहुल गोयल, अदिति शर्मा, पलक निगम, रचिता सूद और आनंदी कटियार।
Competition Law:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (खंडपीठ / Division Bench) |
| पीठासीन न्यायाधीश | मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया |
| अपीलकर्ता | अल्ट्राटेक सीमेंट (UltraTech Cement) |
| प्रतिवादी | भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) और बिल्डर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BAI) |
| मुख्य विवाद | सीमेंट कीमतों में कार्टेलाइज़ेशन (Cartelisation) मामले में BAI को पक्षकार बनाने का CCI का आदेश |
| हाईकोर्ट का निर्णय | अल्ट्राटेक की अपील खारिज; CCI द्वारा BAI को कार्यवाही में शामिल करने का निर्णय बरकरार। |

