Wednesday, October 28, 2026
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Legal Education: यह विशेषज्ञ निकायों का युग है; कानूनी शिक्षा के लिए भी एक एक्सपर्ट पैनल होना चाहिए; 5-वर्षीय लॉ कोर्स की समीक्षा-सुधारों पर विचार

सुनवाई के दौरान कोर्ट की टिप्पणी

  • CJI सूर्यकांत का वक्तव्य:“यह एक बेहद महत्वपूर्ण मामला है। भारत सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यह विशेषज्ञों (Expert Bodies) का दौर है। कानूनी शिक्षा के ढांचे पर विचार करने के लिए एक विशेषज्ञ संस्था होनी चाहिए।”
  • जवाब दाखिल न होने पर नाराजगी: याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने कोर्ट को बताया कि केंद्र सरकार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और लॉ कमीशन ऑफ इंडिया में से किसी ने भी इस मामले में अभी तक अपना जवाब दाखिल नहीं किया है। कोर्ट ने मामले को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है।

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने भारत में कानूनी शिक्षा (Legal Education) के पूरे ढांचे, पाठ्यक्रमों और 5-वर्षीय इंटीग्रेटेड लॉ कोर्सेज (BA.LL.B. / BBA.LL.B.) की अवधि की व्यापक समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ निकाय गठित करने के सुझाव पर केंद्र सरकार को विचार करने को कहा है [अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ एवं अन्य]।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।

यह पढ़ें: NALSAR Student Vs BCI-VII: NLSIU छात्रों पर CJI को दोबारा सार्वजनिक आमंत्रण भेजने का दबाव किसने डाला?; NALSAR स्टूडेंट बार काउंसिल ने उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणी

विशेषज्ञ निकाय की आवश्यकता पर CJI का जोर कानूनी शिक्षा में सुधारों की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा: “यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। भारत सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। वर्तमान समय विशेषज्ञ निकायों (Expert Bodies) का युग है। कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में भी एक स्वतंत्र और प्रभावी विशेषज्ञ निकाय होना चाहिए।”

जनहित याचिका (PIL) में उठाए गए मुख्य मुद्दे

अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर जनहित याचिका में शिक्षाविदों, न्यायविदों, सेवानिवृत्त न्यायाधीशों, वरिष्ठ अधिवक्ताओं और कानून के प्रोफेसरों को शामिल करते हुए एक ‘कानूनी शिक्षा आयोग’ (Legal Education Commission) या उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग की गई है।

1. 5-वर्षीय इंटीग्रेटेड लॉ कोर्स के औचित्य पर सवाल

  • याचिका में 5-वर्षीय इंटीग्रेटेड कोर्सेज (BA.LL.B., BBA.LL.B.) की अवधि को अत्यधिक और कानून के वास्तविक पाठ्यक्रम के अनुपात में असंगत बताया गया है।
  • याचिका के अनुसार, 5-वर्षीय कोर्स में छात्रों पर इतिहास, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान जैसे गैर-कानूनी विषय थोपे जाते हैं, जो मुख्य लॉ की पढ़ाई के लिए अनिवार्य नहीं हैं।
  • याचिका में तर्क दिया गया कि केवल वकालत सीखने के लिए 4-वर्षीय एकल (Standalone) लॉ डिग्री पूरी तरह पर्याप्त और उपयुक्त होगी।

2. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और UGC मानकों से टकराव

  • याचिका में कहा गया कि NEP 2020 सभी शैक्षणिक और व्यावसायिक क्षेत्रों में 4-वर्षीय स्नातक कार्यक्रमों को बढ़ावा देती है, लेकिन बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने एलएलबी और एलएलएम के पाठ्यक्रमों और अवधि की समीक्षा के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।
  • विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) पहले ही 4-वर्षीय स्नातक डिग्री धारकों को सीधे राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (NET) में बैठने और पीएचडी (PhD) करने की अनुमति दे चुका है।

3. छात्रों पर भारी वित्तीय और समय का बोझ

  • याचिका में आरोप लगाया गया कि 5 साल का लंबा कोर्स आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि के छात्रों पर अत्यधिक वित्तीय बोझ डालता है।
  • याचिका के शब्दों में: “किसी भी पाठ्यक्रम का उद्देश्य करियर के लिए आवश्यक व सटीक ज्ञान देना है, न कि छात्रों पर अनावश्यक विषयों का अंबार लगाना। 5-वर्षीय प्रारूप छात्रों के समय और संसाधनों को व्यर्थ करता है।”
  • आर्थिक बोझ और 4-वर्षीय लॉ डिग्री का सुझाव: याचिका में कहा गया है कि 4 साल का standalone कानून पाठ्यक्रम छात्रों के लिए पर्याप्त होगा। 5 साल की अवधि छात्रों से पैसे वसूलने और उनका समय बर्बाद करने का जरिया बन गई है, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों को नुकसान होता है।

जवाब दाखिल न होने पर अगली सुनवाई

मंगलवार की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने पीठ को अवगत कराया कि मामले में केंद्र सरकार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और भारत के विधि आयोग (Law Commission of India) में से किसी ने भी अभी तक अपना औपचारिक जवाब दाखिल नहीं किया है।

पीठ ने केंद्र सरकार को विशेषज्ञ निकाय के गठन पर विचार करने का निर्देश दिया और मामले को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई।

विधिक प्रतिनिधित्व

  • याचिकाकर्ता की ओर से: अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय (व्यक्तिगत रूप से)।
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना।

Legal Education:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतसर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठासीन पीठCJI सूर्यकांत, जस्टिस जयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना
याचिकाकर्ताअधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय
मुख्य मांगलीगल एजुकेशन कमीशन का गठन; 5-वर्षीय LL.B. कोर्स की अवधि और पाठ्यक्रम की समीक्षा
सुप्रीम कोर्ट का रुखकेंद्र सरकार विशेषज्ञ पैनल (Expert Body) गठित करने पर विचार करे।

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