Tuesday, October 27, 2026
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Judge’s Demand: हाईकोर्ट जज के खिलाफ शिकायत करने पर बदले की भावना से उत्पीड़न और सतर्कता जांच शुरू; समझें सिक्किम के जिला जज की याचिका

याचिका में की गई मुख्य मांगें

  • नोटिस रद्द करने की मांग: हाईकोर्ट द्वारा जारी 10 जुलाई के आरोप पत्र और 12 अगस्त के कारण बताओ नोटिस को रद्द किया जाए।
  • शमशेर सिंह मामले का हवाला: Samsher Singh v. State of Punjab में संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ बिना ठोस आधार के ‘रोविंग इंक्वायरी’ (Roving Inquiry) रोकने की गुहार लगाई गई है।
  • अनुशासनात्मक जांच: गायब हुई ACR की जांच कराने, किसी भी तरह की कठोर कार्रवाई पर रोक लगाने और विजिलेंस निरीक्षक के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने का आदेश देने का अनुरोध किया गया है।

नई दिल्ली: सिक्किम न्यायिक सेवा के एक वरिष्ठ और कार्यरत जिला न्यायाधीश ने सिक्किम हाईकोर्ट प्रशासन के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुए भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सीधे उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।

मंगन (Mangan) के जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रज्वल खातीवाड़ा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सिक्किम हाईकोर्ट द्वारा 12 अगस्त को जारी कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) और 22 आरोपों वाले आरोप पत्र (Statement of Allegations) को रद्द करने की मांग की है। जिला जज का आरोप है कि हाईकोर्ट के एक तत्कालीन सिटिंग जज (जो बाद में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बने और अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं) के खिलाफ दुर्व्यवहार की शिकायत दर्ज कराने के बाद उनके खिलाफ बदले की नीयत (Vindictive & Retaliatory Action) से फर्जी विजिलेंस जांच और उत्पीड़न का अभियान शुरू किया गया है [प्रज्वल खातीवाड़ा बनाम सिक्किम उच्च न्यायालय एवं अन्य]।

याचिका में पक्षकार (Respondents)

याचिकाकर्ता ने मामले में निम्नलिखित को प्रतिवादी बनाया है:

  1. सिक्किम उच्च न्यायालय (प्रशासन)
  2. रजिस्ट्रार (विजिलेंस), सिक्किम हाईकोर्ट
  3. शरद सुब्बा, विजिलेंस इंस्पेक्टर
  4. सिक्किम राज्य सरकार

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विवाद का घटनाक्रम: शिकायत से लेकर विजिलेंस जांच तक (2005-2026)

  • न्यायिक करियर: प्रज्वल खातीवाड़ा 2005 में सिक्किम न्यायिक सेवा परीक्षा में शीर्ष स्थान (Topper) हासिल कर सेवा में शामिल हुए थे। वे फरवरी 2023 से दिसंबर 2025 तक सिक्किम हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल (Registrar General) के शीर्ष प्रशासनिक पद पर भी तैनात रहे।
  • हाईकोर्ट जज के खिलाफ औपचारिक शिकायत: याचिका के अनुसार, 12 दिसंबर 2025 को उन्होंने हाईकोर्ट के एक तत्कालीन सिटिंग जज के खिलाफ दुर्व्यवहार, अपमान और अनुचित आचरण का आरोप लगाते हुए एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। इसकी प्रतियां भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम (चार वरिष्ठतम जजों) को भेजी गई थीं।
  • शिकायत के बाद प्रशासनिक बदले की कार्रवाई: शिकायत दर्ज होने के कुछ ही दिनों बाद (15 दिसंबर 2025 को) संबंधित जज को सिक्किम हाईकोर्ट का कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश (Acting Chief Justice) नियुक्त कर दिया गया। याचिकाकर्ता का आरोप है कि इसके तुरंत बाद उनके खिलाफ सुनियोजित उत्पीड़न शुरू हुआ:
    • उन्हें रजिस्ट्रार जनरल के पद से हटाकर मंगन में जिला जज के रूप में अचानक स्थानांतरित कर दिया गया।
    • उनकी सुरक्षा (Security Cover) वापस ले ली गई।
    • उनके अधीनस्थ कर्मचारियों से उनके निजी जीवन और मामलों को लेकर अनधिकृत पूछताछ की गई।
    • उनके खिलाफ बेनामी (Anonymous) शिकायतों के आधार पर विजिलेंस जांच शुरू कर दी गई।

वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) का ‘गायब’ होना और 25 आरोप

  • ACR गायब करने की साजिश: याचिका में आरोप लगाया गया है कि अप्रैल से दिसंबर 2025 के लिए उनके द्वारा विधिवत जमा की गई ‘वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट’ (ACR) को जानबूझकर गायब कर दिया गया और बाद में इसे जमा न करने का झूठा आरोप लगाते हुए उन पर अतिरिक्त आरोप थोप दिए गए।
  • 22 आरोपों का विवरण पत्र: 10 जुलाई को उन्हें 22 आरोपों वाला ‘स्टेटमेंट ऑफ एलीगेशंस’ थमाया गया।
  • 12 अगस्त का शो-कॉज नोटिस: उनके जवाब को असंतोषजनक बताते हुए 12 अगस्त को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जिसमें 3 नए आरोप और जोड़े गए (कुल 25 आरोप)। इनमें से एक आरोप विजिलेंस इंस्पेक्टर शरद सुब्बा के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने से भी संबंधित था।

याचिका में उठाए गए प्रमुख संवैधानिक व विधिक प्रश्न

याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 14, 16, 19(1)(a), 21, 235 (अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण) और 311 का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के ऐतिहासिक फैसले (शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य) पर भरोसा जताया है:

  • न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ बेबुनियाद जांच पर रोक: शमशेर सिंह मामले के अनुसार, अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ मनमानी या बदले की नीयत से व्यापक और खुली जांच (Roving Inquiries) शुरू करना न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों के विपरीत है।
  • प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन: याचिका में कहा गया कि जिन दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर आरोप गढ़े गए हैं, उन्हें याचिकाकर्ता को उपलब्ध ही नहीं कराया गया।

सुप्रीम कोर्ट से मांगी गई प्रमुख राहतें

  1. सिक्किम हाईकोर्ट द्वारा 12 अगस्त को जारी कारण बताओ नोटिस और 10 जुलाई के आरोप पत्र (22 आरोपों) को असंवैधानिक घोषित कर निरस्त (Quash) किया जाए।
  2. याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी भी प्रकार की दंडात्मक या दमनकारी कार्रवाई (Coercive Action) पर तत्काल अंतरिम रोक लगाई जाए।
  3. जांच में इस्तेमाल की जा रही सभी सामग्रियों और साक्ष्यों की पूर्ण प्रति याचिकाकर्ता को प्रदान की जाए।
  4. गायब की गई एसीआर (ACR) के मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।
  5. व्यक्तिगत पूर्वाग्रह से प्रेरित होकर जांच करने वाले विजिलेंस इंस्पेक्टर शरद सुब्बा के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही का निर्देश दिया जाए।

Judge’s Demand: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतसर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
याचिकाकर्ताप्रज्वल खातीवाड़ा (जिला एवं सत्र न्यायाधीश, मंगन, सिक्किम)
प्रतिवादी (Respondents)सिक्किम उच्च न्यायालय, रजिस्ट्रार (विजिलेंस), विजिलेंस निरीक्षक और सिक्किम राज्य
मुख्य चुनौती12 अगस्त का कारण बताओ नोटिस और 10 जुलाई के 22 आरोपों वाले मेमोरेंडम को रद्द करने की मांग
संविधान के प्रावधानअनुच्छेद 14, 16, 19(1)(a), 21, 235 और 311 का हवाला
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