सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम निर्देश और मुख्य मांगें
- अंतरिम रोक: जब तक सुप्रीम कोर्ट इस मामले की पूरी समीक्षा नहीं कर लेता, तब तक RTE, NCTE या UGC के तहत आने वाले किसी भी स्कूल या कॉलेज में इस योजना के माध्यम से किसी भी शिक्षक को नियुक्त या अवशोषित न किया जाए।
- व्यापक समीक्षा (Comprehensive Review) की मांग: याचिका में मांग की गई है कि 2011 और 2017 के प्रांतीयकरण अधिनियम के तहत अब तक नियमित किए गए सभी शिक्षकों की जांच की जाए कि उनके पास अनिवार्य न्यूनतम शैक्षणिक योग्यताएं हैं या नहीं।
- भविष्य की भर्तियों पर निर्देश: मांग की गई है कि भविष्य में सरकारी शिक्षण पदों पर सभी नियुक्तियां केवल खुली, प्रतिस्पर्धी और पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से ही की जाएं।
याचिकाकर्ताओं के मुख्य तर्क और संवैधानिक चुनौतियां
- अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन: याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार ने तर्क दिया कि प्रांतीयकरण का ढांचा बिना किसी पारदर्शी, प्रतिस्पर्धी और योग्यता-आधारित (Merit-based) चयन प्रक्रिया के लोगों को सरकारी सेवा में प्रवेश की अनुमति देता है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता) का सीधा उल्लंघन है।
- न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता (NCTE/UGC/RTE Rules) की अनदेखी: याचिका में 2017 के अधिनियम के उन प्रावधानों को चुनौती दी गई है जो केंद्रीय कानूनों (RTE Act, NCTE Act, 1993 और UGC Act, 1956) के तहत निर्धारित न्यूनतम पात्रता मानदंड पूरा न करने वाले शिक्षकों को भी सरकारी सेवा में शामिल करने की अनुमति देते हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह संविधान के अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार) और अनुच्छेद 254 का उल्लंघन है।
- ट्यूटर्स (Tutors) का प्रांतीयकरण: याचिका में मांग की गई है कि जिन ट्यूटर्स या शिक्षकों के पास कानूनन तय न्यूनतम योग्यताएं नहीं हैं, उन्हें सरकारी या प्रांतीयकृत स्कूलों में पढ़ाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने असम के स्कूलों और उच्च शिक्षण संस्थानों में वेंचर शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों और कर्मचारियों के प्रांतीयकरण (Provincialisation/सरकारीकरण) के तहत नई नियुक्तियों या समायोजन पर अंतरिम रोक लगा दी है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की अगली सुनवाई तक प्रांतीयकरण योजना के तहत शिक्षकों के किसी भी नए संविलियन पर अंतरिम रोक लगाने का आदेश पारित किया। शीर्ष अदालत ने इस वैधानिक ढांचे की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, असम सरकार और राज्य के प्राथमिक, माध्यमिक व उच्च शिक्षा निदेशालयों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है [राजेश चौहान एवं अन्य बनाम असम राज्य एवं अन्य]।
जनहित याचिका (PIL) में उठाए गए प्रमुख संवैधानिक व विधिक प्रश्न
1. अनुच्छेद 14 और 16 का घोर उल्लंघन याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार ने दलील दी कि:
- यह योजना खुली, निष्पक्ष, पारदर्शी और योग्यता-आधारित (Merit-based) प्रतिस्पर्धी भर्ती प्रक्रिया का पालन किए बिना सीधे सरकारी सेवा में प्रवेश का पिछला दरवाजा खोलती है।
- यह तंत्र संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर) का खुला उल्लंघन है, जिससे लाखों योग्य उम्मीदवार खुली प्रतियोगिता के अवसर से वंचित हो जाते हैं।
2. केंद्रीय कानूनों और न्यूनतम योग्यताओं की अनदेखी (अनुच्छेद 21A व 254) याचिका में ‘असम शिक्षा (शिक्षकों की सेवाओं का प्रांतीयकरण और शैक्षणिक संस्थानों का पुनर्गठन) अधिनियम, 2017’ के प्रावधानों को चुनौती दी गई है:
- संसद के कानूनों से टकराव: यह योजना संसद द्वारा बनाए गए प्रमुख कानूनों—’निशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act)’, ‘राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद अधिनियम, 1993 (NCTE Act)’ और ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 (UGC Act)’—के तहत निर्धारित न्यूनतम पात्रता मानकों को दरकिनार करती है।
- गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और अनुच्छेद 21A: अपात्र या न्यूनतम योग्यता पूरी न करने वाले व्यक्तियों को स्कूलों/कॉलेजों में पढ़ाने की अनुमति देना बच्चों के गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21A) का उल्लंघन है और यह संविधान के अनुच्छेद 254 (केंद्रीय और राज्य कानूनों के बीच विसंगति) के विपरीत है।
- ट्यूटर्स के संविलियन पर सवाल: याचिका में ऐसे ट्यूटर्स के प्रांतीयकरण पर भी सवाल उठाया गया है जिनके पास आवश्यक न्यूनतम वैधानिक योग्यताएं नहीं हैं।
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प्रांतीयकरण योजना (Provincialisation Scheme) क्या है?
- वित्तीय व सेवा दायित्व का अधिग्रहण: ‘वेंचर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस’ के तहत निजी तौर पर स्थापित स्कूलों और कॉलेजों के शिक्षकों और कर्मचारियों के वेतन, ग्रेच्युटी, पेंशन और अवकाश नकदीकरण (Leave Encashment) का पूरा वित्तीय दायित्व राज्य सरकार अपने ऊपर लेती है और उन्हें नियमित राज्य कर्मचारियों के समान लाभ प्रदान करती है।
- विवाद की वजह: निजी प्रबंधन द्वारा बिना किसी राज्य-स्तरीय प्रतियोगी परीक्षा या न्यूनतम अनिवार्य योग्यता (जैसे TET/NET/NCTE मानक) के नियुक्त किए गए कर्मचारियों को सीधे नियमित सरकारी वेतनमान में शामिल कर लिया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश और दिशा-निर्देश
- प्रांतीयकरण के तहत नियुक्तियों पर रोक: शीर्ष अदालत ने अंतरिम आदेश पारित करते हुए निर्देश दिया कि मामले पर अगली सुनवाई तक असम सरकार और शिक्षा विभाग प्रांतीयकरण ढांचे के तहत स्कूलों और कॉलेजों में किसी भी नए शिक्षक की नियुक्ति या संविलियन (Absorption) नहीं करेंगे।
- नोटिस जारी: पीठ ने केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय, असम के शिक्षा आयुक्त/सचिव तथा प्राथमिक, माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा निदेशकों को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
याचिकाकर्ताओं द्वारा मांगी गई अंतिम राहतें
- 2011 और 2017 के तहत हुए संविलियनों की व्यापक समीक्षा: असम सरकार को 2011 और 2017 के अधिनियमों के तहत प्रांतीयकृत किए गए सभी शिक्षकों के अभिलेखों की गहन जांच करने का निर्देश दिया जाए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे संसद के कानूनों (NCTE/UGC) के तहत निर्धारित न्यूनतम शैक्षणिक व व्यावसायिक योग्यताएं पूरी करते हैं या नहीं।
- अयोग्य शिक्षकों के कक्षा में पढ़ाने पर रोक: निर्धारित न्यूनतम योग्यता न रखने वाले किसी भी व्यक्ति को सरकारी या सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में अध्यापन कार्य करने से रोका जाए।
- भविष्य की सभी नियुक्तियों में खुली व पारदर्शी भर्ती: निर्देश दिया जाए कि भविष्य में सरकारी शिक्षण पदों पर सभी नियुक्तियां केवल एक निष्पक्ष, पारदर्शी, योग्यता-आधारित और प्रतिस्पर्धी भर्ती परीक्षा के माध्यम से ही की जाएं।
विधिक प्रतिनिधित्व
- याचिकाकर्ताओं (राजेश चौहान एवं अन्य) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार।
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना।
Education In Assam: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठासीन पीठ | CJI सूर्यकांत, जस्टिस जयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना |
| याचिकाकर्ता | राजेश चौहान और माधव मुकुंद पुजारी |
| विवादित कानून | असम शिक्षा (सेवाओं का प्रांतीयकरण और शैक्षणिक संस्थानों का पुनर्गठन) अधिनियम, 2017 |
| सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश | प्रांतीयकरण योजना के तहत शिक्षकों की भर्ती व अवशोषण पर अंतरिम रोक। |

