हाईकोर्ट का मुख्य कानूनी निष्कर्ष
- शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का संवैधानिक अधिकार: अदालत ने टिप्पणी की कि विभिन्न धर्मों का पालन करने वाले लोगों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व (Peaceful Coexistence) की संवैधानिक गारंटी को केवल बेबुनियाद या काल्पनिक आशंकाओं के आधार पर सीमित या रोका नहीं जा सकता।
- कलेक्टर का आदेश सही: हाईकोर्ट ने माना कि जिला प्रशासन ने सभी पक्षों और स्थानीय लोगों से पूछताछ करने के बाद कानूनी दायरे में रहकर अनुमति दी है, इसलिए इसमें हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता।
मदुरै: मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै खंडपीठ ने मंदिर के समीप चर्च के पुनर्निर्माण का विरोध करने वाली याचिका को खारिज करते हुए एक महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था दी है।
न्यायमूर्ति एम. धंदापानी और न्यायमूर्ति एन. दिलीप कुमार की खंडपीठ ने हिंदू मुन्नानी के पदाधिकारी जी. मारीमुथु द्वारा शिवगंगा के मुथुमरियम्मन मंदिर के पास चर्च भवन के पुनर्निर्माण की अनुमति के खिलाफ दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून और व्यवस्था (Law and Order) बिगड़ने की मात्र निराधार आशंका के आधार पर किसी धार्मिक स्थल के निर्माण या पुनर्निर्माण को नहीं रोका जा सकता। अदालत ने भारत के संविधान में निहित विभिन्न धार्मिक आस्थाओं के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व (Peaceful Coexistence) के अधिकार को रेखांकित करते हुए जिला कलेक्टर द्वारा दी गई अनुमति को पूरी तरह वैध ठहराया [जी. मारीमुथु बनाम जिला कलेक्टर, शिवगंगा एवं अन्य]।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
1. शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की संवैधानिक गारंटी सर्वोपरि सांप्रदायिक सौहार्द और धार्मिक स्वतंत्रता पर टिप्पणी करते हुए खंडपीठ ने कहा: “विभिन्न आस्थाओं और धर्मों को मानने वाले लोगों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की संवैधानिक गारंटी को किसी निराधार और काल्पनिक आशंका (Unsubstantiated Apprehension) के आधार पर सीमित या बाधित नहीं किया जा सकता।”
2. कानून-व्यवस्था का काल्पनिक डर निर्माण रोकने का आधार नहीं अदालत ने माना कि यदि स्थानीय आबादी के बीच कोई वास्तविक विवाद या तनाव नहीं है और दोनों समुदाय दशकों से सौहार्दपूर्ण ढंग से रह रहे हैं, तो किसी तीसरे पक्ष द्वारा कानून-व्यवस्था का हवाला देकर केवल आशंका व्यक्त करना निर्माण रोकने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।
मामले की पृष्ठभूमि और विवाद
- मंदिर के पास चर्च का पुनर्निर्माण: शिवगंगा जिले में मुथुमरियम्मन मंदिर से लगभग 45 मीटर की दूरी पर स्थित एक चर्च के पुनर्निर्माण की अनुमति शिवगंगा के जिला कलेक्टर ने 13 मई 2021 को दी थी।
- याचिकाकर्ता की आपत्तियां: हिंदू मुन्नानी पदाधिकारी जी. मारीमुथु ने कलेक्टर के आदेश को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि मंदिर के इतने करीब (45 मीटर) चर्च बनाने की अनुमति देने से क्षेत्र में कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो सकती है। याचिकाकर्ता का आरोप था कि कलेक्टर को अनुमति देने से पहले स्थानीय निवासियों की राय सुननी चाहिए थी।
राज्य सरकार और चर्च प्रबंधन का पक्ष
- 25 वर्षों से अस्तित्व और सौहार्द: चर्च प्रबंधन के वकील ने पीठ को अवगत कराया कि यह प्रार्थना कक्ष पिछले 25 वर्षों से उसी स्थान पर मौजूद है और स्थानीय निवासी पूरी शांति व सद्भाव के साथ रह रहे हैं। पुराना ढांचा जर्जर और कमजोर होने के कारण ही पुनर्निर्माण कार्य शुरू किया गया था।
- आरडीओ (RDO) की फील्ड रिपोर्ट: राज्य सरकार के वकील ने स्पष्ट किया कि जिला कलेक्टर ने यह निर्णय राजस्व मंडल अधिकारी (RDO) द्वारा प्रस्तुत फील्ड निरीक्षण रिपोर्ट के आधार पर लिया था। आरडीओ ने स्थानीय निवासियों से सीधे पूछताछ की थी, जिन्होंने चर्च के पूर्व-अस्तित्व की पुष्टि करते हुए निर्माण पर कोई आपत्ति न होने की बात कही थी।
- याचिकाकर्ता का स्थानीय निवासी न होना: सरकारी वकील ने यह भी रेखांकित किया कि याचिका दायर करने वाला व्यक्ति संबंधित इलाके का स्थानीय निवासी भी नहीं है।
हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय
अदालत ने पाया कि जिला कलेक्टर का 13 मई 2021 का आदेश स्थानीय निवासियों की प्रतिक्रिया और प्रशासनिक जांच पर आधारित था। स्थानीय लोगों की कोई आपत्ति न होने और चर्च के 25 साल पुराने होने के कारण, अदालत ने कलेक्टर के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।
Church Construction: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (मदुरै पीठ) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति एम. धंदापानी और न्यायमूर्ति एन. दिलीप कुमार |
| याचिकाकर्ता | जी. मारिमुथु (G Marimuthu – हिंदू मुन्नानी पदाधिकारी) |
| विवादित स्थल | शिवगंगा जिले में मुथुमारिअम्मन मंदिर से 45 मीटर दूर स्थित चर्च |
| हाईकोर्ट का निर्णय | याचिका खारिज; कलेक्टर द्वारा निर्माण की दी गई मंजूरी बहाल। |

