Tuesday, October 27, 2026
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Muslim Civil Rights: मुस्लिम उत्तराधिकार और पर्सनल लॉ में लैंगिक भेदभाव की चुनौती…संवैधानिक प्रश्नों के टकराव का दिया संकेत; केंद्र देगी जवाब

मुख्य संवैधानिक प्रश्न और विवाद

  1. समानता का अधिकार बनाम धार्मिक स्वतंत्रता:
    • याचिकाकर्ताओं (अधिवक्ता प्रशांत भूषण एवं अन्य) की दलील है कि 1937 का कानून मुस्लिम महिलाओं के साथ संपत्ति के बंटवारे में भेदभाव करता है (जहाँ महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले आधा हिस्सा मिलता है)।
    • याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि उत्तराधिकार एक नागरिक अधिकार (Civil Right) है, न कि कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा (Essential Religious Practice)।
  2. अनुच्छेद 25(2)(b) और न्यायपालिका की सीमाएं:
    • अदालत के समक्ष मुख्य प्रश्न यह है कि क्या व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) में सुधार की जिम्मेदारी संसद की है या फिर संविधान के अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत अदालतें अपनी रिट अधिकारिता के जरिए सामाजिक सुधार लागू कर सकती हैं?
    • अनुच्छेद 25(2)(b) सरकार को सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है।
  3. कानूनी शून्यता (Legal Vacuum) का जोखिम:
    • पीठ ने चिंता व्यक्त की कि यदि 1937 के अधिनियम को रद्द कर दिया जाता है, तो मुस्लिम उत्तराधिकार के लिए कोई व्यापक वैधानिक ढांचा उपलब्ध नहीं रहेगा। याचिकाकर्ताओं ने सुझाव दिया कि विकल्प के तौर पर ‘भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम’ (Indian Succession Act) लागू किया जा सकता है।

शबरीमला संदर्भ का क्या असर होगा?

2018 के शबरीमला मंदिर प्रवेश फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में व्यापक संवैधानिक मुद्दों को 9-न्यायाधीशों की बड़ी पीठ को सौंप दिया था। इस पीठ ने मई 2026 में 16 दिनों की लंबी सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

9-न्यायाधीशों की पीठ मुख्य रूप से यह तय कर रही है कि:

  • अनुच्छेदों 14 (समानता), 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और 26 (धार्मिक संप्रदाय के अधिकार) के बीच क्या संतुलन है?
  • अदालतें धार्मिक मान्यताओं और व्यक्तिगत कानूनों की संवैधानिक जांच किस हद तक कर सकती हैं?

CJI सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि शबरीमला मामले में 9-न्यायाधीशों का फैसला व्यक्तिगत कानूनों और धार्मिक स्वतंत्रता के संबंध में न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र का दायरा तय करेगा, जिसका सीधा असर मुस्लिम उत्तराधिकार कानून को चुनौती देने वाली इन याचिकाओं पर भी पड़ेगा।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत महिलाओं के साथ उत्तराधिकार और संपत्ति के अधिकारों में भेदभाव को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए संकेत दिया है कि इन मामलों का निस्तारण सबरीमाला पुनर्विचार मामले से जुड़ी 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ (9-Judge Constitution Bench) के आने वाले फैसले पर निर्भर हो सकता है।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937’ के उत्तराधिकार प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान यह अहम अवलोकन किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि दोनों कार्यवाहियों में धर्म, पर्सनल लॉ, धार्मिक प्रथाओं और संवैधानिक अधिकारों के बीच न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे से जुड़े मूलभूत संवैधानिक प्रश्न एक-दूसरे से सीधे जुड़े (Overlap) हैं।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा चिह्नित मुख्य संवैधानिक प्रश्न

1. न्यायिक हस्तक्षेप बनाम विधायी अधिकार क्षेत्र (अनुच्छेद 25(2)(b)) खंडपीठ ने इस मामले के मूल संवैधानिक प्रश्न को रेखांकित करते हुए कहा: “अदालत के समक्ष केंद्रीय प्रश्न यह है कि क्या पर्सनल लॉ और उत्तराधिकार में सुधार का मुद्दा केवल संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है, अथवा न्यायपालिका अनुच्छेद 32 के तहत अपनी रिट अधिकारिता के जरिए इसमें सुधार कर सकती है—विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद 25(2)(b) में परिकल्पित सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए कानून बनाने की विधायी शक्तियों के संदर्भ में।”

2. सबरीमाला 9-जजों की बेंच के फैसले का प्रभाव पीठ ने स्पष्ट किया कि 9-जजों की संविधान पीठ द्वारा धार्मिक स्वतंत्रता (Religious Freedom) और मूलभूत संवैधानिक अधिकारों (Fundamental Rights) के अंतर्संबंधों पर दिया जाने वाला निर्णय मुस्लिम उत्तराधिकार और वसीयत से जुड़े नियमों की विधिक वैधता तय करने में अत्यंत निर्णायक और मार्गदर्शक साबित होगा।

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याचिकाओं में उठाए गए लैंगिक समानता के मुख्य मुद्दे

  • शरीयत कानून, 1937 के प्रावधानों को चुनौती: याचिकाओं में ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937’ की उन धाराओं को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है जो बिना वसीयत छोड़ी गई संपत्ति (Intestate Inheritance) और वसीयती उत्तराधिकार (Testamentary Succession) से संबंधित हैं।
  • महिलाओं के साथ हिस्सेदारी में भेदभाव: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत बेटों/पुरुषों की तुलना में बेटियों और महिलाओं को संपत्ति में आधा या बेहद कम हिस्सा (Smaller Share of Inheritance) दिया जाता है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है।

सबरीमाला 9-न्यायाधीशों की संविधान पीठ का संदर्भ (पृष्ठभूमि)

  • 2018 का मूल फैसला: 2018 में 5-जजों की पीठ ने सबरीमाला स्थित श्री अयप्पा मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी।
  • 2019 में 9-जजों को रेफरेंस: 2019 में पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई के दौरान तत्कालीन चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ ने व्यापक संवैधानिक प्रश्नों को 9 जजों की वृहद पीठ को सौंप दिया था।
  • मुख्य विचारणीय बिंदु:
    1. अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 25-26 (धार्मिक स्वतंत्रता एवं संप्रदायों के अधिकार) के बीच संतुलन।
    2. पर्सनल लॉ और प्रथागत रिवाजों की अदालतों द्वारा संवैधानिक समीक्षा का दायरा।
    3. क्या धार्मिक आस्था से जुड़े मामलों में रिट याचिकाएं पोषणीय हैं?
  • फैसला सुरक्षित: 9-जजों की संविधान पीठ ने 16 दिनों की विस्तृत सुनवाई के बाद मई में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

सुनवाई की वर्तमान स्थिति

  • केंद्र सरकार का रुख: केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को अवगत कराया कि सरकार मुस्लिम उत्तराधिकार नियमों की संवैधानिक वैधता पर अपना विस्तृत जवाब एक सप्ताह के भीतर दाखिल करेगी।
  • अदालत ने मामले को आगे के विचारार्थ सूचीबद्ध रखा है।

विधिक प्रतिनिधित्व

  • केंद्र सरकार की ओर से: सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता।
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना।

Muslim Civil Rights: मामले का विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठासीन पीठCJI सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना
चुनौती दिया गया कानूनमुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937
मुख्य मुद्दाक्या शरीयत के तहत महिलाओं को पुरुषों की तुलना में आधा/कम हिस्सा देना समानता के अधिकार (Article 14) का उल्लंघन है?
कोर्ट का रुखशबरीमला 9-न्यायाधीशों की पीठ के फैसले के बाद विचार किए जाने की संभावना।
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