FOLLOW US FOR MORE LEGAL UPDATES ON WhatsApp
अदालत में हुई सुनवाई और मुख्य कानूनी बिंदु
1. “यदि वे पुलिस के कार्यक्रमों में आ सकते हैं, तो पर्यावरण के लिए क्यों नहीं?”:
अतिरिक्त सरकारी वकील ज्योति चव्हाण द्वारा यह बताए जाने पर कि फिल्मी हस्तियां जागरूकता विज्ञापनों में आने के लिए फीस मांग रही हैं, न्यायमूर्ति कुलकर्णी ने टिप्पणी की: “हम यह उम्मीद करते हैं कि सार्वजनिक हस्तियां मुंबई के प्रति अपनेपन का भाव दिखाएं और शहर के कल्याण में योगदान दें। यदि वे पुलिस विभाग द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में बिना फीस के आ सकते हैं, तो नागरिक जागरूकता पहलों के लिए क्यों नहीं आ सकते?”
2. झुग्गी बस्तियों (Slums) में विशेष जागरूकता अभियान:
पीठ ने मुंबई के 40-50% स्लम क्षेत्रों में पटाखों और ध्वनि प्रदूषण के नियमों का पालन कराने पर चिंता व्यक्त की।
- अदालत ने निर्देश दिया कि इन घनी आबादी वाले क्षेत्रों में जागरूकता फैलाने और रात में पटाखे फोड़ने पर रोक लगाने के लिए स्थानीय वार्ड कॉर्पोरेटरों (Ward Corporators) और स्थानीय नेताओं को सक्रिय रूप से शामिल किया जाए, क्योंकि लोग अपने परिचित स्थानीय प्रतिनिधियों की बात अधिक सुनते हैं।
3. शिकायत हेल्पलाइन का प्रचार करने के निर्देश:
वरिष्ठ अधिवक्ता एस्पी चिनॉय और BMC के अधिवक्ता जोएल कार्लोस की दलीलें सुनने के बाद, पीठ ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि:
- नागरिक निकाय (BMC) की 24 घंटे चलने वाली आपदा हेल्पलाइन 1916 और पुलिस आपातकालीन नंबर 100 को सिनेमाघरों, प्रिंट और डिजिटल मीडिया के माध्यम से प्रमुखता से विज्ञापित किया जाए ताकि आम जनता पटाखे और ध्वनि प्रदूषण की शिकायतें दर्ज करा सके।
मुंबई: भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 (प्रदूषण-मुक्त एवं शांत वातावरण में जीने का मौलिक अधिकार), पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियम, 2000, राज्य के राजकोषीय धन के सार्वजनिक हित में सदुपयोग (Prudent Use of State Exchequer), तथा त्योहारी जुलूसों में लेजर लाइट्स व देर रात पटाखों पर अदालती प्रतिबंधों के प्रभावी क्रियान्वयन पर बॉम्बे उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत तल्ख और स्पष्ट आदेश पारित किया है।
बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जी.एस. कुलकर्णी (Justice GS Kulkarni) और न्यायमूर्ति नीला गोखले (Justice Neela Gokhale) की खंडपीठ ने मुंबई में ध्वनि और पर्यावरण प्रदूषण को लेकर चल रही स्वतः संज्ञान जनहित याचिका (Suo Motu PIL) की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को दो-टूक निर्देश दिया कि प्रदूषण विरोधी नागरिक अभियानों के लिए ऐसी किसी भी फिल्मी या मशहूर हस्ती (Celebrity) से संपर्क न किया जाए जो समाज सेवा के संदेश के लिए भी अपनी फीस मांगते हैं।
अदालत ने कहा कि जब यही हस्तियां पुलिस विभाग के आयोजनों या वार्षिक उत्सवों में बिना झिझक शामिल हो सकती हैं, तो जिस शहर में वे रहते हैं और कमाते हैं, उसके पर्यावरण और स्वास्थ्य के प्रति उनकी कोई नागरिक जिम्मेदारी क्यों नहीं दिखती। पीठ ने सार्वजनिक धन को सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट पर खर्च करने पर नाराजगी जताते हुए बीएमसी और पुलिस हेल्पलाइन के प्रचार तथा मुंबई की 40-50% झुग्गी बस्तियों में सघन अभियान चलाने का आदेश दिया। मामले की अगली सुनवाई 25 नवंबर 2026 को नियत की गई है।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘अगर वे अपने शहर के प्रति जागरूक नहीं हैं, तो हमें बहुत खेद है’
सुनवाई के दौरान जब अतिरिक्त सरकारी वकील ज्योति चव्हाण ने अदालत को अवगत कराया कि प्रशासन ने जन-जागरूकता अभियानों के समर्थन हेतु मशहूर हस्तियों से संपर्क किया था, किंतु वे इन अभियानों में शामिल होने के लिए अपनी पेशेवर फीस की मांग कर रहे हैं, तो न्यायमूर्ति जी.एस. कुलकर्णी ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए कहा: “ऐसी किसी भी मशहूर हस्ती (Celebrity) के पास मत जाइए जो आपसे फीस वसूलने जा रही हो! यदि सेलिब्रिटी अपने खुद के शहर के प्रति जरा भी सचेत और जागरूक नहीं हैं और वे सार्वजनिक हित के काम में भी केवल फीस लेकर ही आना चाहते हैं, तो हमें उनके इस रवैये पर बेहद अफसोस है! हम यह उम्मीद करते हैं कि सार्वजनिक हस्तियां मुंबई शहर के प्रति अपने जुड़ाव और अपनेपन (Sense of belonging) का परिचय देंगी और शहर के कल्याण में अपना निःस्वार्थ योगदान देंगी।”
2. ‘जब पुलिस के जश्न में आ सकते हैं, तो नागरिक अभियानों में क्यों नहीं?’
- पीठ ने सार्वजनिक आयोजनों में मशहूर हस्तियों के दोहरे मापदंडों पर सवाल उठाते हुए टिप्पणी की:“वे पुलिस विभाग द्वारा आयोजित समारोहों और कार्यक्रमों में नियमित रूप से शिरकत करते हैं। जब वे उस जश्न में खुशी-खुशी आ सकते हैं, तो फिर प्रदूषण विरोधी नागरिक जागरूकता अभियान में क्यों नहीं आ सकते?”
- खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक जागरूकता अभियानों में फिल्मी हस्तियों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए सरकारी खजाने (State Exchequer) और करदाताओं के पैसे का एक भी रुपया खर्च नहीं किया जाना चाहिए।
3. ‘मुंबई की 40-50% झुग्गी बस्तियों में विशेष अभियान की जरूरत’:
- अदालत ने इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त की कि मुंबई का एक बड़ा भूभाग झुग्गी बस्तियों (Slum Settlements) से आच्छादित है, जहां पारंपरिक अभियानों का असर कम होता है और देर रात तक तेज आवाज वाले पटाखों का उल्लंघन जारी रहता है:“हम चिंतित हैं कि आप इस अभियान को झुग्गियों तक कैसे पहुंचाएंगे? यदि 40-50% क्षेत्र झुग्गी बस्ती है, तो वहां नियम कैसे लागू होंगे?हमें उनके खिलाफ कुछ नहीं है, किंतु कानून का पालन सभी को करना होगा। वहां लोगों को जागरूक और संवेदनशील बनाने के लिए एक विशेष अभियान (Special Kind of Drive) चलाने की आवश्यकता है।”
अदालत द्वारा जारी प्रमुख प्रशासनिक व सुधारात्मक निर्देश
त्योहारों और जुलूसों के दौरान ध्वनि व पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के लिए उच्च न्यायालय ने त्रिस्तरीय कार्ययोजना जारी की:
- शिकायत निवारण हेल्पलाइनों का त्रि-माध्यम प्रचार:
- वरिष्ठ अधिवक्ता आस्पी चिनॉय द्वारा समर्पित शिकायत दर्ज तंत्र के अभाव का मुद्दा उठाए जाने पर, बीएमसी के वकील ने स्पष्ट किया कि नगर निकाय की 24 घंटे चलने वाली आपदा हेल्पलाइन 1916 पर ध्वनि प्रदूषण की शिकायतें दर्ज की जाएंगी।
- अदालत ने बीएमसी और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वे नागरिक हेल्पलाइन 1916 तथा पुलिस आपातकालीन नंबर 100 का प्रिंट मीडिया, सिनेमा हॉल (स्क्रीनिंग से पूर्व) और डिजिटल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रमुखता से व्यापक प्रचार-प्रसार सुनिश्चित करें ताकि नागरिक सीधे शिकायत कर सकें।
- वार्ड पार्षदों (Ward Corporators) की अनिवार्य सहभागिता:
- न्यायमित्र (Amicus Curiae) आनंद पई ने अदालत को सुझाव दिया कि घनी आबादी वाली झुग्गी बस्तियों में आम नागरिक अपने स्थानीय नेताओं से अधिक जुड़ाव महसूस करते हैं।
- पीठ ने इस सुझाव को स्वीकार करते हुए बीएमसी को निर्देश दिया कि वह संबंधित वार्ड पार्षदों और स्थानीय प्रतिनिधियों को जमीनी स्तर पर जागरूकता फैलाने और कानून का अनुपालन सुनिश्चित कराने के लिए सीधे शामिल करे।
- संयुक्त समन्वय तंत्र:
- बीएमसी, मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) को एक-दूसरे के साथ तालमेल बिठाकर निगरानी करने और त्योहारों के दौरान ध्वनि मानकों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त व निरंतर कानूनी कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| मामले की प्रकृति | महाराष्ट्र में त्योहारी जुलूसों और आयोजनों के दौरान ध्वनि व पर्यावरण प्रदूषण के बढ़ते स्तर पर बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा दर्ज स्वतः संज्ञान जनहित याचिका (Suo Motu PIL)। |
| पूर्ववर्ती अंतरिम आदेश (22 सितंबर 2026) | खंडपीठ ने त्योहारों के दौरान सार्वजनिक सड़कों/गलियों में पटाखे फोड़ने, तेज आवाज वाले लाउडस्पीकरों, लेजर लाइट्स और उच्च तीव्रता वाली बीम लाइट्स के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। |
| राज्य सरकार का खुलासा | अतिरिक्त सरकारी वकील ज्योति चव्हाण ने बताया कि प्रदूषण नियंत्रण और नागरिक जागरूकता के लिए प्रसिद्ध फिल्मी हस्तियों से संपर्क किया गया था, किंतु उन्होंने मानदेय/फीस की मांग की। |
| अदालत की प्रतिक्रिया | सरकारी धन से सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट खरीदने पर पूर्ण रोक; निःस्वार्थ सेवा देने वालों को ही जोड़ने का आदेश। |
| शिकायत निवारण तंत्र | बीएमसी हेल्पलाइन 1916 और पुलिस हेल्पलाइन 100 को रिकॉर्डेड शिकायत प्रणाली के रूप में अधिसूचित किया गया। |
| आगामी तारीख | निरंतर अनुपालन और समन्वय रिपोर्ट की समीक्षा हेतु मामला 25 नवंबर 2026 को सूचीबद्ध। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘अनुच्छेद 21 और सार्वजनिक धन का संरक्षण’
- ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियम, 2000 और मौलिक अधिकार:
- सर्वोच्च न्यायालय ने इन री: नॉइज़ पॉल्यूशन (कार्यान्वयन एवं दिशा-निर्देश) मामले में स्पष्ट किया था कि शांतिपूर्ण नींद और शांत वातावरण संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। किसी भी व्यक्ति का त्योहार मनाने का अधिकार किसी अन्य नागरिक के स्वास्थ्य को खतरे में डालने तक विस्तारित नहीं हो सकता।
- सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट और वित्तीय शुचिता:
- अदालत का यह निर्देश प्रशासनिक कानून के उस सुस्थापित सिद्धांत को पुष्ट करता है जिसके तहत राज्य को लोक कल्याणकारी अभियानों में मितव्ययिता बरतनी चाहिए।
- जनहित अभियानों में हस्तियों का योगदान ‘नागरिक कर्तव्य’ (Civic Duty) होना चाहिए, न कि करदाताओं के पैसे से संचालित एक व्यावसायिक प्रचार।
विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता
- न्यायालय: बॉम्बे उच्च न्यायालय (मूल जनहित रिट क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: स्वतः संज्ञान जनहित याचिका (ध्वनि एवं पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण) [Suo Motu PIL]
- पीठ: न्यायमूर्ति जी.एस. कुलकर्णी एवं न्यायमूर्ति नीला गोखले (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 26 अक्टूबर 2026
- आगामी सुनवाई: 25 नवंबर 2026
विधिक प्रतिनिधित्व:
- न्यायालय द्वारा नियुक्त न्यायमित्र (Amicus Curiae): वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद पई (Anand Pai)
- हस्तक्षेपकर्ता / याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता आस्पी चिनॉय (Senior Advocate Aspi Chinoy)
- महाराष्ट्र राज्य की ओर से: अतिरिक्त सरकारी वकील (AGP) ज्योति चव्हाण (Jyoti Chavan)
- बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) की ओर से: अधिवक्ता जोएल कार्लोस (Advocate Joel Carlos)
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 — धारा 15 (उल्लंघन हेतु दंड)
- ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 — नियम 3, 5 और 8 (ध्वनि स्तर की सीमाएं और शिकायत प्रक्रिया)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार), अनुच्छेद 48A (पर्यावरण संरक्षण), अनुच्छेद 51A(g) (नागरिकों का मौलिक कर्तव्य), एवं अनुच्छेद 226
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- प्रदूषण जागरूकता और सार्वजनिक व्यय का विधिक मानक: ‘नागरिक जागरूकता अभियानों के लिए राज्य का खजाना मशहूर हस्तियों की भारी फीस पर खर्च नहीं किया जा सकता; यदि हस्तियां अपने शहर के पर्यावरण हेतु निःशुल्क योगदान देने को तैयार नहीं हैं, तो सरकार को उनके पास जाने की कोई आवश्यकता नहीं है; प्रशासन को स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधियों और वार्ड तंत्र के माध्यम से झुग्गियों सहित सभी क्षेत्रों में कानून का कड़ाई से पालन कराना चाहिए।’
- वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: बीएमसी और मुंबई पुलिस को 1916 तथा 100 हेल्पलाइन नंबरों का सभी दृश्य, मुद्रित व डिजिटल माध्यमों में व्यापक प्रचार करने का निर्देश; वार्ड स्तर पर पार्षदों को जोड़कर झुग्गी बस्तियों में विशेष संवेदीकरण अभियान चलाने का आदेश प्रभावी; 25 नवंबर 2026 को प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की जाएगी।
Mumbai Pollution: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति जी. एस. कुलकर्णी एवं न्यायमूर्ति नीला गोखले |
| मामला/विषय | मुंबई में ध्वनि एवं पर्यावरण प्रदूषण पर स्वतः संज्ञान जनहित याचिका (Suo Motu PIL) |
| राज्य का पक्ष | अतिरिक्त सरकारी वकील ज्योति चव्हाण |
| न्यायालय मित्र (Amicus Curiae) | अधिवक्ता आनंद पाई |
| अदालत का मुख्य निर्देश | 1. सेलिब्रिटी फीस पर रोक: जनहित अभियानों के लिए भुगतान मांगने वाले फिल्मी सितारों को सरकार न बुलाए। 2. हेल्पलाइन का प्रचार: BMC हेल्पलाइन ‘1916’ और पुलिस नंबर ‘100’ का प्रिंट व डिजिटल मीडिया में व्यापक प्रचार हो। 3. स्लम बस्तियों में जागरूकता: कॉर्पोरेटरों और स्थानीय नेताओं के सहयोग से झुग्गी बस्तियों में विशेष अभियान चलाया जाए। |

