बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क
- उधारकर्ता की देरी बैंक को जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करती: अदालत ने बैंक की इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया कि उधारकर्ता ने देरी से संपर्क किया:“उधारकर्ता को बैंक के आंतरिक प्रशासनिक मामलों जैसे शाखा परिसर के बदलने, रिकॉर्ड के आंतरिक हस्तांतरण या कर्मचारियों के तबादले से कोई लेना-देना नहीं है। दस्तावेज सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी केवल बैंक की है। यह कहना कि बैंक दस्तावेज खो दे और फिर केवल इसलिए जिम्मेदारी से बचे क्योंकि उधारकर्ता ने तुरंत मांग नहीं की, पूरी तरह अमान्य है।” — बॉम्बे हाईकोर्ट
- RBI सर्कुलर का भूतलक्षी (Retrospective) प्रभाव नहीं: हाईकोर्ट ने बैंक के इस तर्क को आंशिक रूप से स्वीकार किया कि RBI का प्रतिदिन ₹5,000 पेनल्टी वाला सर्कुलर 2003 से लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने माना कि चूंकि सर्कुलर 1 दिसंबर 2023 से प्रभावी हुआ है, इसलिए पेनल्टी का हिसाब उसी तारीख से लगाया जाएगा।
- बैंकिंग लोकपाल का फैसला अंतिम नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बैंकिंग लोकपाल द्वारा दिया गया ₹1 लाख का सुझाव केवल एक अंतरिम राहत थी और यह हाईकोर्ट को उचित मुआवजा देने से नहीं रोकता। कोर्ट ने आदेश दिया कि SBI द्वारा दिए गए ₹1 लाख को कुल देय मुआवजे में से समायोजित (Adjust) कर लिया जाए।
अदालत का अंतिम आदेश
- प्रतिदिन ₹5,000 का मुआवजा: SBI को 1 दिसंबर 2023 से ₹5,000 प्रति दिन की दर से मुआवजा देने का निर्देश दिया गया (बैंकिंग लोकपाल के ₹1 लाख को इसमें एडजस्ट किया जाएगा)।
- दस्तावेजों का पुनर्गठन (Reconstruction of Title Records): बैंक को अपने खर्च पर MIDC, सहकारी समितियों और रजिस्ट्रार कार्यालय से सत्यापित प्रमाणित प्रतियां (Certified Copies), क्षतिपूर्ति बांड (Indemnity Bonds), और शपथ पत्र जुटाकर संपत्ति का पूरा रिकॉर्ड 12 सप्ताह के भीतर पुनर्गठित करने का आदेश दिया गया।
- मुआवजे की अवधि: यह दैनिक जुर्माना तब तक देय रहेगा जब तक बैंक पूर्ण रूप से मान्य और पुनर्गठित टाइटल दस्तावेज याचिकाकर्ता को नहीं सौंप देता।
मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने बैंकिंग और संपत्ति न्यायशास्त्र पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए व्यवस्था दी है कि लोन की पूरी अदायगी के बाद जमानत के रूप में जमा कराए गए मूल मालिकाना हक के दस्तावेज (Original Title Documents) सुरक्षित रखना और लौटाना बैंक का पूर्ण और अनिवार्य दायित्व है।
कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश रवींद्र वी. घुगे और न्यायमूर्ति गौतम ए. अनखाड की खंडपीठ ने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता फर्म को 1 दिसंबर 2023 से प्रतिदिन ₹5,000 का मुआवजा तब तक अदा करे, जब तक कि बैंक दोनों संपत्तियों के प्रमाणित दस्तावेज प्राप्त कर और आवश्यक हलफनामों व क्षतिपूर्ति बांड (Indemnity) के साथ पूरा टाइटल रिकॉर्ड पुनर्निर्मित (Reconstruct) करके नहीं सौंप देता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कर्जदार ने लोन चुकाने के बाद तुरंत दस्तावेज वापस नहीं मांगे, तो इस देरी का सहारा लेकर बैंक अपने दायित्व से नहीं बच सकता।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
1. शाखा स्थानांतरण या आंतरिक बदलाव बैंक का प्रशासनिक मामला बैंक की इस दलील को खारिज करते हुए कि कर्जदार ने 15-20 साल बाद दस्तावेज मांगे और इस दौरान शाखा का पता बदल गया था, पीठ ने कहा: “लोन पूरी तरह चुकाने वाला कर्जदार यह वैध अपेक्षा रखने का हकदार है कि मूल दस्तावेज संभालने वाला बैंक उनकी उचित अभिरक्षा रखेगा और देयता समाप्त होते ही उन्हें लौटाएगा। दस्तावेजों के संरक्षण, पहचान और पुनः प्राप्ति की पूरी जिम्मेदारी बैंक की है। इसे कर्जदार पर केवल इसलिए नहीं डाला जा सकता क्योंकि उसने तुरंत दस्तावेज नहीं मांगे। शाखा स्थानांतरण, आंतरिक रिकॉर्ड शिफ्टिंग या कर्मचारियों का बदलना बैंक का आंतरिक प्रशासनिक मामला है। यदि इसे स्वीकार किया जाए, तो बैंक दस्तावेज खोने के बाद जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेंगे, जो कानूनन अस्वीकार्य है।”
2. पुलिस शिकायत या विज्ञापन बैंक के मूल दोष को समाप्त नहीं करते अदालत ने माना कि गुमशुदगी की एफआईआर दर्ज कराना, अखबार में सार्वजनिक सूचना प्रकाशित करना या एमआईडीसी (MIDC) से प्रतियां जुटाना नुकसान के प्रभाव को कम करने का प्रयास हो सकता है, लेकिन यह बैंक की मूल लापरवाही (Primary Default) को नहीं मिटा सकता। मूल दस्तावेजों के बिना संपत्ति की बिक्री, बंधक या अंतरण गंभीर रूप से प्रभावित होता है।
3. 1 दिसंबर 2023 से ₹5,000 प्रतिदिन मुआवजा (RBI सर्कुलर की व्याख्या)
- लागू दर: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ‘रिस्पॉन्सिबल लेंडिंग कंडक्ट – रिलीज ऑफ मूवेबल/इम्यूवेबल प्रॉपर्टी डाक्यूमेंट्स’ सर्कुलर के तहत लोन चुकता होने के 30 दिनों के भीतर दस्तावेज न लौटाने पर ₹5,000 प्रतिदिन का मुआवजा निर्धारित है।
- सर्कुलर का प्रभाव: याचिकाकर्ता की 2003 से ₹3.93 करोड़ मुआवजे की मांग को अस्वीकार करते हुए कोर्ट ने कहा कि सर्कुलर पूर्वव्यापी (Retrospectively) लागू नहीं हो सकता, लेकिन 1 दिसंबर 2023 से यह दर बैंक द्वारा देय निरंतर पूर्वाग्रह का एक वस्तुनिष्ठ पैमाना (Rational Measure) है।
4. बैंकिंग लोकपाल का आदेश अंतिम बाधा नहीं अदालत ने व्यवस्था दी कि बैंकिंग लोकपाल (Banking Ombudsman) द्वारा पूर्व में दिलाया गया ₹1 लाख का मुआवजा उच्च न्यायालय द्वारा क्षतिपूर्ति तय करने के रास्ते में बाधा नहीं है। कोर्ट ने लोकपाल द्वारा जमा कराए गए ₹1 लाख को कुल देय मुआवजे में समायोजित (Adjust) करने का निर्देश दिया।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (1979 से चला आ रहा मामला)
- दस्तावेज जमा: याचिकाकर्ता पार्टनरशिप फर्म ने 1970 के दशक में खरीदी गई दो औद्योगिक संपत्तियों के मूल दस्तावेज और पंजीकृत लीज डीड वर्ष 1979 में एसबीआई के पास गिरवी रखे थे।
- लोन चुकता (2003): फर्म ने वर्ष 2003 में पूरा लोन चुका दिया और बैंक ने नो-ड्यूज सर्टिफिकेट (NDC) भी जारी कर दिया, लेकिन मूल दस्तावेज वापस नहीं किए।
- दस्तावेज लापता: बाद में बैंक ने स्वीकार किया कि शाखा शिफ्ट होने के कारण दस्तावेज नहीं मिल रहे हैं। MIDC से मिली कुछ अधूरी प्रतियों से संपत्ति का टाइटल स्पष्ट नहीं हो पा रहा था।
- अदालत का रुख: संपत्ति बेचने में असमर्थ फर्म ने टाइटल रिकॉर्ड पुनर्निर्मित कराने और आरबीआई सर्कुलर के तहत हर्जाने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
- प्रतिदिन ₹5,000 का हर्जाना: एसबीआई को 1 दिसंबर 2023 से शुरू होकर टाइटल रिकॉर्ड पूरी तरह पुनर्निर्मित होने तक प्रतिदिन ₹5,000 का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया (₹1 लाख समायोजित करके)।
- 12 सप्ताह में टाइटल पुनर्निर्माण (Reconstruction): बैंक को 12 सप्ताह के भीतर MIDC और संबंधित सोसायटियों से प्रमाणित प्रतियां प्राप्त करने, स्टांप शुल्क/पंजीकरण प्राधिकारियों के समक्ष आवश्यक एंडोर्समेंट, शपथ पत्र और क्षतिपूर्ति बांड (Indemnity Bonds) निष्पादित करने का आदेश दिया गया ताकि किसी भी भावी खरीदार या संस्था के समक्ष मालिकाना हक निर्विवाद रहे।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: रिट याचिका (बैंक द्वारा गिरवी रखे मूल टाइटल दस्तावेज खोने और मुआवजे का मामला)
- प्रासंगिक नियम: आरबीआई का सर्कुलर (Responsible Lending Conduct, 13 सितंबर 2023) एवं बैंकिंग लोकपाल योजना
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (फर्म) की ओर से: अधिवक्ता ए.एम. सरावगी
- प्रतिवादी (भारतीय स्टेट बैंक) की ओर से: अधिवक्ता बिदान चंद्रन
- पीठ: कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश रवींद्र वी. घुगे और न्यायमूर्ति गौतम ए. अनखाड (बॉम्बे उच्च न्यायालय)
Borrower Documents: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court) |
| पीठासीन पीठ | एक्टिंग चीफ जस्टिस रवींद्र वी. घुगे एवं जस्टिस गौतम ए. आंखड़ |
| याचिकाकर्ता | एक पार्टनरशिप फर्म (जिसने 1979 में लोन के लिए SBI में दस्तावेज जमा किए थे) |
| प्रतिवादी | स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (State Bank of India – SBI) |
| मुख्य विषय | बैंक की कस्टडी में गुम हुए मूल संपत्ति दस्तावेजों पर मुआवजा और रिकॉर्ड रिकंस्ट्रक्शन |
| अदालत का फैसला | SBI को 1 दिसंबर 2023 से प्रतिदिन ₹5,000 मुआवजा देने और दस्तावेज रिकंस्ट्रक्ट कराने का आदेश। |

