अदालत की मुख्य टिप्पणी
“केवल अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए किसी नागरिक को 11 साल तक अदालतों के चक्कर काटने के लिए मजबूर करना अपने आप में एक त्रासदी है। ‘तारीख पर तारीख’ की यह व्यवस्था आम आदमी के मनोबल को तोड़ देती है।” — न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर
सबूतों के अभाव और प्रक्रियात्मक उल्लंघनों को देखते हुए कोर्ट ने माना कि पुलिस का मामला संदेह से परे साबित नहीं हो सका, जिसके बाद अशोक भारती को तत्काल और बिना शर्त बरी करने का आदेश दिया गया।
मुजफ्फरनगर: विशेष एनडीपीएस अदालत एवं अपर सत्र न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या 3) रवि कुमार दिवाकर ने भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में मुकदमों के अत्यधिक खिंचने, वर्षों तक चलने वाली कानूनी प्रक्रियाओं के मानवीय प्रभाव और पुलिसिया जांच की गंभीर खामियों पर एक कड़ा और भावुक फैसला सुनाया है।
न्यायालय ने अभियोजन पक्ष के पूरे कथानक को खारिज करते हुए पाया कि नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट, 1985 (NDPS Act) की धारा 50 के अनिवार्य सुरक्षा उपायों का उल्लंघन हुआ है, बरामदगी के समय स्वतंत्र गवाहों को शामिल नहीं किया गया और पुलिस कर्मियों की गवाहियों में कई गंभीर विरोधाभास मौजूद हैं। अदालत ने वर्ष 2015 के 150 ग्राम चरस बरामदगी मामले में 11 वर्षों तक चले मुकदमे के बाद आरोपी अशोक भारती को सभी आरोपों से बाइज्जत बरी (Acquitted) कर दिया। न्यायाधीश दिवाकर ने फैसले में फिल्म दामिनी के अभिनेता सनी देओल के प्रसिद्ध संवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि एक निर्दोष नागरिक को खुद को बेगुनाह साबित करने के लिए एक दशक से अधिक समय तक अदालतों की चौखट पर भटकने के लिए विवश करना अपने आप में किसी सजा से कम नहीं है।
अदालत के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं टिप्पणियां
1. मुकदमों की लंबी पेंडेंसी पर ‘दामिनी’ संवाद का उल्लेख न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने न्याय वितरण प्रणाली की धीमी गति पर टिप्पणी करते हुए कहा:
“तारीख पर तारीख मिलती रही है लेकिन इंसाफ नहीं मिला… जब एक व्यक्ति को केवल अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए 11 लंबे वर्षों तक एक अदालत से दूसरी अदालत के चक्कर काटने पड़ें, तो यह कानूनी प्रक्रिया स्वयं में उस व्यक्ति के लिए एक अत्यंत कष्टकारी सजा बन जाती है। आपराधिक न्याय प्रणाली में यह गतिहीनता और विलंब न्याय के मूल उद्देश्य को ही परास्त कर देता है।”
2. NDPS एक्ट की धारा 50 का घोर उल्लंघन
- अदालत ने रेखांकित किया कि कथित बरामदगी आरोपी के कुर्ते की दाहिनी जेब यानी उसकी व्यक्तिगत तलाशी (Bodily Search) से की गई थी। ऐसे मामलों में एनडीपीएस कानून की धारा 50 के तहत तलाशी से पूर्व आरोपी को राजपत्रित अधिकारी (Gazetted Officer) या मजिस्ट्रेट के समक्ष ले जाने के उसके विधिक अधिकार से अवगत कराया जाना अनिवार्य है।
- जब्ती मेमो (Seizure Memo) में यह कहीं भी दर्ज नहीं था कि आरोपी को उसका यह वैधानिक अधिकार लिखित रूप में बताया गया था।
- हालांकि सहमति पत्र पर आरोपी के हस्ताक्षर थे, लेकिन वह सहमति पत्र न तो आरोपी द्वारा स्वयं लिखा गया था और न ही उस पर किसी स्वतंत्र लेखक (Independent Scribe) के हस्ताक्षर मौजूद थे।
3. स्वतंत्र गवाहों (Independent Witnesses) की अनुपस्थिति और पुलिस गवाही में विरोधाभास
- घटना स्थल बालाजी धाम मंदिर मोड़ और भारतीय कॉलोनी जैसे घनी आबादी वाले सार्वजनिक क्षेत्र में स्थित था, जहां राहगीर और स्थानीय नागरिक मौजूद थे। इसके बावजूद पुलिस ने एक भी स्थानीय या स्वतंत्र नागरिक को पंचनामा या जब्ती गवाह नहीं बनाया।
- मुख्य पुलिस गवाह उपनिरीक्षक बच्चन सिंह ने जिरह के दौरान दावा किया कि केस डायरी में बरामद चरस का वजन गलती से दर्ज होने से छूट गया था, जबकि जब्ती दस्तावेज में 150 ग्राम की विशिष्ट मात्रा का दावा किया गया था।
- केवल चार पुलिसकर्मियों (एसआई बच्चन सिंह, हेड कांस्टेबल सुनील कुमार, विवेचक एसआई सुनील कुमार और सिपाही लाल जी) की परस्पर विरोधी गवाहियों के आधार पर अभियोजन का मामला उचित संदेह से परे (Beyond Reasonable Doubt) साबित नहीं हो सका।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (2015 नई मंडी चरस बरामदगी विवाद)
- घटना की तारीख: 21 अक्टूबर 2015
- पुलिस की प्राथमिकी का दावा: मुजफ्फरनगर के नई मंडी थाना क्षेत्र में उपनिरीक्षक बच्चन सिंह के नेतृत्व में गश्त कर रही पुलिस टीम ने बालाजी धाम मंदिर मोड़ के पास संदिग्ध अवस्था में अशोक भारती को घेराबंदी कर पकड़ा था।
- बरामदगी का आरोप: पुलिस ने दावा किया था कि तलाशी के दौरान अशोक भारती के कुर्ते की दाहिनी जेब से एक पॉलीथिन मिली, जिसमें 150 ग्राम चरस थी। पुलिस ने मौके पर 20 ग्राम सैंपल के तौर पर सील करने और शेष माल थाने में जमा करने का दावा किया था।
- 11 साल लंबा ट्रायल: वर्ष 2015 से 2026 तक आरोपी को लगातार अदालती तारीखों पर पेश होना पड़ा। ट्रायल के दौरान अभियोजन ने एनडीपीएस एक्ट की धारा 20 के तहत आरोप साबित करने का प्रयास किया।
- अदालती आदेश: साक्ष्यों की पूर्ण पड़ताल के बाद विशेष अदालत ने पाया कि बरामदगी का पंचनामा संदेहास्पद था और धारा 50 की वैधानिक प्रक्रिया पूरी नहीं की गई थी, जिसके चलते आरोपी अशोक भारती को तत्काल प्रभाव से बरी कर दिया गया।
विधिक विवरण
- संबंधित पीठासीन अधिकारी: रवि कुमार दिवाकर, विशेष न्यायाधीश (NDPS Act) / अपर सत्र न्यायाधीश (FTC-3), मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश
- प्रासंगिक कानून: स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act) की धारा 20 (अवैध चरस/मादक पदार्थ रखने का अपराध) एवं धारा 50 (व्यक्तिगत तलाशी के समय अनिवार्य वैधानिक प्रक्रिया); भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 / सीआरपीसी की धारा 100 (तलाशी के समय स्वतंत्र गवाहों की अनिवार्यता)
- संबद्ध संवैधानिक एवं न्यायिक नजीरें:
- स्टेट ऑफ पंजाब बनाम बलदेव सिंह (1999, सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ) — ‘एनडीपीएस एक्ट की धारा 50 का अनुपालन अनिवार्य है; इसका उल्लंघन संपूर्ण बरामदगी और ट्रायल को दूषित कर देता है।’
- हुसैनआरा खातून बनाम गृह सचिव, बिहार राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘त्वरित विचारण (Speedy Trial) संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक अभियुक्त का मौलिक अधिकार है।’
Damini Dialogue:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | विशेष न्यायाधीश (NDPS) / फास्ट ट्रैक कोर्ट, मुजफ्फरनगर |
| न्यायाधीश | रवि कुमार दिवाकर (Ravi Kumar Diwakar) |
| आरोपी | अशोक भारती (Ashok Bharti) |
| मूल मामला | 21 अक्टूबर 2015 को नई मंडी पुलिस द्वारा 150 ग्राम चरस जब्ती का आरोप |
| कोर्ट का अंतिम फैसला | आरोपी को सभी आरोपों से पूरी तरह बरी किया गया |

