Sunday, September 20, 2026
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Clock Tower: जब हर नागरिक की जेब में मोबाइल और कलाई पर घड़ी है; तब भीड़भाड़ वाले बाजार में घंटाघर बनाना मनमानापन, क्यों लगाई रोक, फैसला जानें

हाईकोर्ट की मुख्य और तल्ख टिप्पणियां

  1. ‘रिप वैन विंकल’ से की नगर निगम की तुलना: पीठ ने 55 साल बाद नगर निगम के जागने पर तंज कसते हुए कहा:“फिरोजाबाद नगर निगम 55 साल बाद ‘रिप वैन विंकल’ (Rip Van Winkle – एक काल्पनिक पात्र जो दशकों तक सोता रहा) की उपलब्धि को भी पीछे छोड़ते हुए गहरी नींद से जागा है और अचानक दानदाता की इच्छा को पूरा करने का फैसला कर लिया।”
  2. तकनीकी दौर में अप्रासंगिकता: हाईकोर्ट ने कहा कि क्लॉक टावर अतीत में एक महान उद्देश्य पूरा करते थे, जब लोगों के पास समय देखने के साधन नहीं थे।“वर्तमान समय में इस तरह की पुरानी तकनीक पर सोचना और काम करना कोई नीतिगत निर्णय (Policy Decision) नहीं है। यह उच्चतम स्तर की मनमानी और अव्यावहारिकता का परिणाम है… आज हर व्यक्ति के पास न केवल कलाई घड़ी है, बल्कि मोबाइल फोन में पूरी दुनिया का समय मौजूद है।”
  3. ‘साइ-प्रे’ का सिद्धांत (Doctrine of Cy-près): अदालत ने स्पष्ट किया कि दान की गई जमीन का उपयोग जनहित में होना चाहिए, लेकिन समय के अनुसार:“हम यह नहीं कह रहे कि दान की गई भूमि का उपयोग जनहित में न हो। ट्र्स्ट कानून के ‘साइ-प्रे’ सिद्धांत (Doctrine of Cy-près – उद्देश्य को समकालीन संदर्भ में पूरा करना) के तहत इस जमीन का उपयोग किसी भी आधुनिक और प्रासंगिक सार्वजनिक उद्देश्य के लिए किया जा सकता है।”

प्रयागराज: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सार्वजनिक भूमि के उपयोग, शहरी नियोजन में बदलती समकालीन जरूरतों, प्रशासनिक सुस्ती और नागरिक सुविधाओं की तार्किकता पर एक अत्यंत रोचक, व्यावहारिक और तल्ख टिप्पणी करते हुए फिरोजाबाद में प्रस्तावित घंटाघर (Clock Tower) के निर्माण पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। अदालत ने तीखा सवाल उठाया कि जब आज हर व्यक्ति के मोबाइल फोन में दुनिया भर का सटीक समय उंगलियों पर उपलब्ध है और हाथों में घड़ियां हैं, तो व्यस्त और तंग बाजार में प्राचीन तकनीकी अवशेष के रूप में घंटाघर बनाने का क्या विधिक और व्यावहारिक औचित्य है?

न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने स्थानीय व्यापारी गौरव गोयल द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए फिरोजाबाद नगर निगम के उस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसके तहत पुरानी मंडी स्थित व्यस्त बाजार में घंटाघर बनाने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। अदालत ने निर्माण कार्य को आगामी सुनवाई तक स्थगित करते हुए प्रमुख सचिव (नगर विकास विभाग), नगर आयुक्त, फिरोजाबाद के जिलाधिकारी और स्थानीय निकाय निदेशक को दो सप्ताह में जवाबी हलफनामा (Counter Affidavit) दाखिल कर इस निर्माण का ठोस औचित्य पेश करने का निर्देश दिया है।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं तीखी टिप्पणियां

1. ‘मोबाइल युग में घंटाघर बनाना नीतिगत फैसला नहीं, घोर मनमानापन’: खंडपीठ अदालत ने तकनीकी विकास और शहरी प्राथमिकताओं को रेखांकित करते हुए दो टूक शब्दों में कहा: “घंटाघर उस दौर में बेहद उपयोगी और महान उद्देश्य की पूर्ति करते थे जब वे बनाए गए थे और उस पीढ़ी के लिए जो उन पर निर्भर थी। परंतु वर्तमान समय में पुरानी और अप्रचलित तकनीक (Antiquated Technology) पर विचार करना और उस पर काम करना कोई नीतिगत निर्णय नहीं है। यह पूरी तरह से अतार्किक है और उच्चतम स्तर की मनमानी (Arbitrariness of the highest order) का उत्पाद है। आज के युग में घंटाघरों की कोई प्रासंगिकता नहीं बची है, जहां हर व्यक्ति के पास न केवल कलाई घड़ी है, बल्कि उसके मोबाइल फोन में अंतरराष्ट्रीय समय उसकी उंगलियों पर रहता है।”

2. 55 साल बाद कुंभकर्णी नींद से जागा नगर निगम: ‘रिप वैन विंकल’ का संदर्भ

  • नगर निगम ने अदालत में दलील दी थी कि 1970 में रामस्वरूप गोविंद राम गोयल नामक व्यक्ति ने यह जमीन विशेष रूप से घंटाघर निर्माण के लिए ही दान (Danpatra) दी थी।
  • अदालत ने 55 साल की लंबी निष्क्रियता पर कटाक्ष करते हुए टिप्पणी की:“गोयल ने यह जमीन 1970 में दान दी थी। परंतु फिरोजाबाद नगर निगम 55 साल बाद अपनी गहरी नींद से जागा है—इतने लंबे समय बाद जागकर तो उसने ‘रिप वैन विंकल’ (प्रसिद्ध कथा का पात्र जो 20 साल सोता रहा था) की उपलब्धि को भी पीछे छोड़ दिया है—और अचानक उसे दानदाता की इच्छा पूरी करने की याद आ गई।”

3. ‘साइ-प्रे का सिद्धांत’ (Doctrine of Cy-près): समकालीन जनहित में हो जमीन का उपयोग

  • अदालत ने स्पष्ट किया कि वह दानदाता की भूमि के सार्वजनिक उपयोग के खिलाफ नहीं है, परंतु ट्रस्ट लॉ के सुप्रसिद्ध ‘साइ-प्रे सिद्धांत’ (Doctrine of Cy-près) को लागू किया जाना चाहिए:
    • यदि किसी ट्रस्ट या दान का मूल उद्देश्य समय बीतने या परिस्थितियों के बदलने से अव्यवहारिक या अप्रासंगिक हो जाता है, तो उस संपत्ति का उपयोग मूल उद्देश्य के सबसे निकटतम (As near as possible) किसी अन्य समकालीन जनहित (Contemporary Public Purpose)—जैसे पार्किंग, नागरिक सुविधा या अस्पताल—के लिए किया जा सकता है।
    • पीठ ने कहा कि वह नीतिगत विकल्पों को निर्देशित नहीं करना चाहती, लेकिन तंग बाजार में बिना पार्किंग के भारी ढांचा खड़ा करना जनता के लिए सिरदर्द बनेगा।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (पुरानी मंडी, सदर बाजार विवाद)

  • विवादित स्थल: फिरोजाबाद के सदर बाजार स्थित पुरानी मंडी का अत्यधिक व्यस्त और संकरा बाजार क्षेत्र।
  • याचिकाकर्ता की व्यथा: स्थानीय व्यापारी गौरव गोयल की दुकान प्रस्तावित घंटाघर निर्माण स्थल के ठीक सामने स्थित है। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि इस घने बाजार में पहले से ही वाहनों की पार्किंग की भारी समस्या है। यदि यहां क्लॉक टावर खड़ा किया गया, तो रास्ता पूरी तरह अवरुद्ध हो जाएगा और व्यापारियों का कारोबार पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा।
  • निगम का रुख: नगर निगम का दावा था कि चूंकि 1970 के दानपत्र में जमीन घंटाघर बनाने के लिए ही दी गई थी, इसलिए वहां घंटाघर के अलावा अन्य कोई निर्माण नहीं किया जा सकता।
  • याचिकाकर्ता के वकील का पक्ष: अधिवक्ता विजय बहादुर विश्वकर्मा ने अदालत को अवगत कराया कि बिना जनहित और व्यावहारिक ट्रैफिक व पार्किंग अध्ययन के सार्वजनिक धन और जमीन का इस तरह का उपयोग प्रशासनिक अविवेक का प्रमाण है।

उच्च न्यायालय के अंतिम निर्देश

  1. निर्माण कार्य पर अंतरिम रोक: अदालत ने अधिकारियों और निजी निर्माण फर्म को निर्देश दिया कि अगली सुनवाई तक प्रस्तावित स्थल पर किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य तत्काल प्रभाव से स्थगित रखा जाए।
  2. जवाबी हलफनामा तलब: प्रमुख सचिव (नगर विकास), नगर आयुक्त फिरोजाबाद, जिलाधिकारी फिरोजाबाद और निदेशक (स्थानीय निकाय) को दो सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया गया है।
  3. अगली सुनवाई: मामले की अगली सुनवाई 30 सितंबर 2026 को नियत की गई है।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: गौरव गोयल बनाम फिरोजाबाद नगर निगम एवं अन्य [रिट याचिका (सिविल) – इलाहाबाद उच्च न्यायालय]
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक सिद्धांत: भारत का संविधान – अनुच्छेद 14 (मनमानेपन के विरुद्ध संरक्षण एवं तार्किकता का सिद्धांत), अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यापार और आजीविका की स्वतंत्रता) एवं अनुच्छेद 226; उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959; भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, 1882 एवं सार्वजनिक ट्रस्टों से संबंधित ‘साइ-प्रे का सिद्धांत’ (Doctrine of Cy-près)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • ई.पी. रोयप्पा बनाम तमिलनाडु राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘समानता और मनमानापन एक-दूसरे के धुर विरोधी हैं; जहां प्रशासनिक कार्य में घोर अतार्किकता और मनमानापन होता है, वहां अनुच्छेद 14 का उल्लंघन माना जाता है।’
    • रतिलाल पानाचंद गांधी बनाम बॉम्बे राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘यदि मूल धर्मार्थ या सार्वजनिक उद्देश्य समय के साथ निष्प्रभावी या अव्यवहारिक हो जाता है, तो अदालतें या सक्षम अधिकारी उस संपत्ति को समकालीन जनोपयोगी कार्यों के लिए ‘साइ-प्रे’ के तहत मोड़ने के लिए अधिकृत हैं।’
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ता की ओर से: अधिवक्ता विजय बहादुर विश्वकर्मा
  • पीठ: न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला (इलाहाबाद उच्च न्यायालय)

Clock Tower: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court)
पीठ (Judges)न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला
स्थान / निकायपुरानी मंडी, सदर बाजार (फिरोजाबाद नगर निगम)
याचिकाकर्तास्थानीय व्यापारी गौरव गोयल (Gaurav Goyal)
अदालत का अंतरिम आदेशक्लॉक टावर निर्माण पर तात्कालिक रोक; अधिकारियों को 2 सप्ताह में जवाब दाखिल करने का नोटिस
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