Wednesday, September 16, 2026
HomeHigh CourtAnti Conversion Law: शामली के आयुष मलिक ने कहा; स्वेच्छा से इस्लाम...

Anti Conversion Law: शामली के आयुष मलिक ने कहा; स्वेच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया, हाईकोर्ट ने आयुष मलिक को परिवार की हिरासत से किया मुक्त

हाईकोर्ट के मुख्य संवैधानिक निष्कर्ष

  • अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वायत्तता (Individual Autonomy):अदालत ने परिवार की चिंताओं को समझते हुए स्पष्ट किया कि एक बालिग नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के आगे पारिवारिक इच्छाओं को प्राथमिकता नहीं दी जा सकती:“एक बालिग व्यक्ति की यह पसंद कि वह किससे शादी करना चाहता है या किसके साथ रहना चाहता है, उसकी व्यक्तिगत स्वायत्तता का मामला है। केवल यह तथ्य कि ऐसी पसंद परिवार की इच्छाओं के विपरीत है, उसकी स्वतंत्रता को सीमित करने का वैध आधार नहीं हो सकता।”इलाहाबाद हाईकोर्ट
  • धर्म और आस्था चुनने का अधिकार (Freedom of Conscience):न्यायालय ने माना कि संविधान का अनुच्छेद 21 और 25 हर नागरिक को अपनी अंतरात्मा के अनुसार धर्म चुनने और उसका पालन करने की पूर्ण स्वतंत्रता देता है।

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार), अनुच्छेद 25 (अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को मानने का अधिकार) तथा व्यक्तिगत स्वायत्तता (Individual Autonomy) के संरक्षण पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और नजीर पेश करने वाला निर्णय सुनाया है।

न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकल पीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition) का निस्तारण करते हुए 31 वर्षीय बी.फार्मा स्नातक आयुष मलिक (जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर अपना नाम मोहम्मद अली रखा है) को परिवार और पुलिस की निगरानी/अवैध हिरासत से तत्काल मुक्त कर अपनी पसंद के स्थान पर रहने, इस्लाम धर्म का पालन करने और चांदनी कुरैशी के साथ विवाह करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की। अदालत ने स्पष्ट किया है कि एक वयस्क व्यक्ति को अपनी अंतरात्मा के अनुसार धर्म अपनाने, अपनी पसंद के स्थान पर रहने और अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने का पूर्ण संवैधानिक अधिकार है। परिवार की नाराजगी, सामाजिक अपेक्षाएं या पिता की चिंता वयस्क नागरिक की इस संवैधानिक स्वतंत्रता का हनन करने का आधार नहीं बन सकती [आयुष मलिक एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 3 अन्य]।

उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां

1. अंतःकरण की स्वतंत्रता और वयस्क की व्यक्तिगत स्वायत्तता (Articles 21 & 25) नागरिक की अंतरात्मा और धर्म चुनने की स्वतंत्रता को रेखांकित करते हुए न्यायमूर्ति संदीप जैन ने कहा: “अदालत के समक्ष बंदी का स्पष्ट और निर्विवाद बयान है कि उसने स्वेच्छा से इस्लाम धर्म स्वीकार किया है और उसका यह निर्णय किसी धमकी, दबाव, अनुचित प्रभाव या प्रलोभन से प्रेरित नहीं था। रिकॉर्ड पर ऐसी कोई सामग्री नहीं है जो इस अदालत को बंदी द्वारा दिए गए बयानों पर अविश्वास करने के लिए प्रेरित करे। वयस्कता प्राप्त कर चुका व्यक्ति अपनी अंतरात्मा के अनुसार अपना धर्म तय करने का हकदार है। ऐसी पसंद, व्यक्तिगत स्वायत्तता और अंतःकरण की स्वतंत्रता (Freedom of Conscience) की अभिव्यक्ति होने के नाते, केवल इसलिए खारिज नहीं की जा सकती क्योंकि वह उसके परिवार के सदस्यों को स्वीकार्य नहीं है।”

2. जीवनसाथी के चयन का अधिकार अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग

  • अदालत ने वैवाहिक स्वतंत्रता और सुप्रीम कोर्ट के शफीन जहां (हदिया वाद) के सिद्धांतों को दोहराते हुए कहा:“किसी वयस्क व्यक्ति की यह पसंद कि वह किससे विवाह करना चाहता है या किसके साथ संबंध स्थापित करना चाहता है, व्यक्तिगत स्वायत्तता का मामला है। केवल यह तथ्य कि यह पसंद परिवार की इच्छाओं या उम्मीदों के विपरीत हो सकती है, अपने आप में उस पसंद को सीमित करने का कोई वैध आधार नहीं बन सकती।”

3. पारिवारिक चिंता बनाम संवैधानिक अधिकार

  • अदालत ने माना कि एक पिता के रूप में बेटे की भलाई को लेकर चिंता पारिवारिक संबंधों के संदर्भ में स्वाभाविक और समझ में आने योग्य है, लेकिन यह चिंता किसी वयस्क नागरिक के अपने धर्म, निवास और जीवनसाथी के चयन के संवैधानिक अधिकार पर हावी (Override) नहीं हो सकती।
  • अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 226 के तहत अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए अदालत किसी वयस्क व्यक्ति की सुविचारित पसंद पर अपनी स्वयं की धारणा या ‘क्या उसके लिए बेहतर होगा’ का विचार नहीं थोप सकती।

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (शामली धर्मांतरण विवाद)

  • बंदी का विवरण: शामली (उत्तर प्रदेश) निवासी आयुष मलिक (आयु लगभग 31 वर्ष), जिन्होंने बी.फार्मा की डिग्री प्राप्त की है, ने अदालत को बताया कि उन्होंने वर्ष 2014 में ही स्वेच्छा से इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था और वे इसके धार्मिक अनुष्ठानों का नियमित पालन कर रहे हैं।
  • पारिवारिक विवाद और यूपी धर्मांतरण कानून के तहत मुकदमा:
    • आयुष के इस निर्णय का उनके व्यापारी पिता देवराज सिंह मलिक और परिजनों ने कड़ा विरोध किया।
    • शामली पुलिस ने आयुष के धर्मांतरण के मामले में उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 (UP Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act, 2021) के तहत प्राथमिकी दर्ज कर मुस्लिम युवती चांदनी कुरैशी और उनके पिता को गिरफ्तार कर लिया था।
    • आयुष के पिता का दावा था कि उनके बेटे का ब्रेनवॉश किया गया है और परिवार की संपत्ति हड़पने के लिए उसे जबरन धर्म बदलने पर मजबूर किया गया।
  • अवैध नजरबंदी का आरोप: आयुष ने आरोप लगाया कि 4 जून से उसे अपने ही घर में धमकियों और पुलिस की मौजूदगी के बीच अवैध रूप से बंधक (Unlawful Confinement) बनाकर रखा गया था। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई।
  • अदालत में बयान: 9 सितंबर के अदालती निर्देश पर पुलिस ने आयुष को पीठ के समक्ष पेश किया। उसने बंद कमरे व खुली अदालत में बिना किसी हिचकिचाहट के बयान दिया कि उसने किसी दबाव के बिना इस्लाम अपनाया है और वह चांदनी कुरैशी से विवाह करना चाहता है।

Also Read;Custodial Violence: हिरासत में पीटना-महिला से छेड़छाड़; धारा 197 CrPC का संरक्षण नहीं मिलेगा, पुलिसकर्मियों डिस्चार्ज याचिका पर यह टिप्पणी पढ़ें

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश और निर्देश

  1. अवैध हिरासत से तत्काल मुक्ति: उच्च न्यायालय ने माना कि आयुष मलिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध जारी रखने का कोई विधिक औचित्य नहीं है, अतः उन्हें तुरंत मुक्त किया जाता है।
  2. पसंद के स्थान पर रहने व विवाह की स्वतंत्रता: अदालत ने आदेश दिया कि वह अपनी मर्जी से किसी भी स्थान पर रहने, किसी भी व्यक्ति के साथ निवास करने, अपनी पसंद के धर्म (इस्लाम) का पालन करने और कानून के अनुसार चांदनी कुरैशी से विवाह करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: आयुष मलिक एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 3 अन्य [Ayush Malik & Anr. v. State of U.P. & Ors. – बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट याचिका]
  • प्रासंगिक कानून: भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (जीवन, गरिमा एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता), अनुच्छेद 25 (धर्म के अबाध रूप से मानने और आचरण की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 226 (बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट); उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021
  • संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
    • शफीन जहां बनाम असोकन के.एम. (हदिया केस, 2018, सुप्रीम कोर्ट) — ‘वयस्क नागरिक द्वारा धर्म और जीवनसाथी का चयन मौलिक अधिकार है जिसमें राज्य या परिवार हस्तक्षेप नहीं कर सकता।’
    • के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017, 9-जजों की संविधान पीठ) — ‘व्यक्तिगत स्वायत्तता और निजता का अधिकार।’
    • सलामत अंसारी बनाम यूपी राज्य (इलाहाबाद हाईकोर्ट) — ‘दो वयस्कों के आपसी सहमति से साथ रहने के अधिकार पर धर्म का कोई बंधन नहीं।’
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ता (आयुष मलिक) की ओर से: अधिवक्ता दीपक सिंह, मोहम्मद खालिद एवं उमर खालिद
  • पीठ: न्यायमूर्ति संदीप जैन (इलाहाबाद उच्च न्यायालय)

Anti Conversion Law: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति संदीप जैन (Justice Sandeep Jain)
याचिकाकर्ता (Corpus)आयुष मलिक उर्फ मुहम्मद अली (उम्र 31 वर्ष, बी.फार्मा स्नातक)
मामले की प्रकृतिबंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition)
संबंधित संविधान अनुच्छेदअनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) एवं अनुच्छेद 25 (धर्म आचरण की स्वतंत्रता)
कोर्ट का आदेशयाचिकाकर्ता पूरी तरह स्वतंत्र है; अपनी पसंद के स्थान, धर्म और जीवनसाथी चुनने का अधिकार बरकरार।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
broken clouds
26 ° C
26 °
26 °
89 %
2.1kmh
84 %
Wed
29 °
Thu
34 °
Fri
35 °
Sat
35 °
Sun
35 °

Recent Comments