कोर्ट में सुनवाई के मुख्य बिंदु
- पीठ ने याद दिलाया कि चूंकि यह बेंच पहली बार इस मामले को सुन रही है, इसलिए दोनों पक्षों को नए सिरे से अपने तर्क पेश करने होंगे।
- कोर्ट ने इस बहुप्रतीक्षित मामले में जल्द ही अंतिम फैसला सुनाने की प्रतिबद्धता जताई है। इस हफ्ते मामले की सुनवाई जारी रहने की उम्मीद है।
नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय कराधान (International Taxation), डिजिटल अर्थव्यवस्था, क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट गेटवे, और भारत-सिंगापुर दोहरा कराधान परिहार समझौते (India-Singapore DTAA) के तहत ‘स्थायी प्रतिष्ठान’ (Permanent Establishment – PE) के निर्धारण से जुड़े देश के सबसे बड़े और बहुचर्चित कॉरपोरेट टैक्स विवादों में से एक पर दिल्ली हाईकोर्ट में 8 साल के लंबे अंतराल के बाद नए सिरे से (De Novo) अंतिम सुनवाई शुरू हुई।
न्यायमूर्ति दिनेश मेहता और न्यायमूर्ति अदिति चौधरी की खंडपीठ ने मामले के लंबे न्यायिक इतिहास को संज्ञान में लेते हुए स्पष्ट किया कि अदालत अब इस मामले को टालने के बजाय अंतिम निर्णय (Final Adjudication) तक पहुंचाना चाहती है। जब मास्टरकार्ड की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने अपनी पिछली दलीलों का संदर्भ दिया, तो पीठ ने मुस्कुराते हुए याद दिलाया: “हम आपको याद दिलाना चाहते हैं कि हम इस मामले को पहली बार सुन रहे हैं। पिछली बार हमें बताया गया था कि इसे सुनकर छोड़ (Released) दिया गया था, इसलिए अब हमें इसका फैसला करने दीजिए।”
8 वर्षों में 9 पीठों का सफर: जजों के तबादले और सेवानिवृत्ति
वर्ष 2018 में जब मास्टरकार्ड एशिया पैसिफिक प्राइवेट लिमिटेड (सिंगापुर स्थित इकाई) ने ‘अग्रिम निर्णय प्राधिकरण’ (Authority for Advance Rulings – AAR) के फैसले को चुनौती दी थी, तब से यह याचिका दिल्ली हाईकोर्ट की 9 अलग-अलग पीठों के समक्ष सूचीबद्ध हो चुकी है:
- पूर्व पीठों का नेतृत्व: न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट, न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर, न्यायमूर्ति विपिन सांघी, न्यायमूर्ति मनमोहन, न्यायमूर्ति राजीव शकधर, न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा, न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह, न्यायमूर्ति वी. कामेश्वर राव और अब न्यायमूर्ति दिनेश मेहता।
- इनमें से अधिकांश न्यायाधीश या तो सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत होकर/अन्यथा सेवानिवृत्त हो चुके हैं या दिल्ली से बाहर स्थानांतरित हो चुके हैं, जिसके कारण मामले पर बार-बार आंशिक सुनवाई के बाद इसे नए सिरे से सुनना पड़ा।
वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे की प्रमुख विधिक दलीलें
मास्टरकार्ड की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने डीएमडी एडवोकेट्स (DMD Advocates) की ब्रीफिंग के आधार पर कंपनी का पक्ष रखते हुए प्राथमिक और तकनीकी मुद्दों पर जोरदार जिरह की:
1. ‘आप मुझे हेडक्वार्टर में ट्रांजैक्शन प्रोसेस करने का पैसा देते हैं, न कि MIP लगाने का’
- साल्वे ने तर्क दिया कि भारतीय बैंकों में लगाए गए ‘मास्टरकार्ड इंटरफेस प्रोसेसर्स’ (MIPs) केवल प्राथमिक सत्यापन (Preliminary Validation) और डेटा रूटिंग का काम करते हैं।
- राजस्व उत्पन्न करने वाला मुख्य कार्य (Core Revenue-Generating Activity) भारत के बाहर स्थित विदेशी सर्वरों और मास्टरकार्ड के वैश्विक मुख्यालय में संपन्न होता है:“बैंक और ग्राहक मुझे किस बात का भुगतान कर रहे हैं? आप मुझे अपने मुख्यालय में इन लेनदेन को प्रोसेस करने के लिए भुगतान कर रहे हैं। सारा पैसा इसी प्रोसेसिंग का है, न कि आपको केवल एक MIP उपकरण देने के लिए ताकि आप मुझसे जुड़ सकें।”
2. ‘अनिवार्यता’ स्थायी प्रतिष्ठान (PE) का पैमाना नहीं
- साल्वे ने AAR के उस तर्क पर प्रहार किया जिसमें कहा गया था कि चूंकि MIPs ट्रांजैक्शन पूरा करने के लिए ‘अनिवार्य’ हैं, इसलिए वे स्थायी प्रतिष्ठान बनाते हैं:“किसी कार्य की अनिवार्यता (Essentiality) स्थायी प्रतिष्ठान का परीक्षण नहीं है। असली पैमाना उस कृत्य की प्रकृति (Nature of the Act) है। कोई कार्य कितना भी अनिवार्य क्यों न हो, यदि उसकी प्रकृति प्रारंभिक या सहायक (Preparatory or Auxiliary) है, तो वह भारत-सिंगापुर DTAA के अनुच्छेद 5 के तहत स्थायी प्रतिष्ठान की परिभाषा से बाहर ही रहेगा।”
3. सरकार के पास 16.75% टैक्स पहले से जमा, देरी से कंपनी को कोई लाभ नहीं
- साल्वे ने स्पष्ट किया कि याचिका में किसी भी तरह की देरी करने में मास्टरकार्ड का कोई वित्तीय हित (Financial Interest) नहीं है।
- एक अंतरिम वित्तीय व्यवस्था के तहत, मास्टरकार्ड के सकल राजस्व (Gross Revenue) पर कुल 16.75% कर पहले से सरकारी खजाने में जमा हो रहा है—जिसमें 6% की कटौती भारतीय बैंक (Withholding Tax) करते हैं और 10.75% मास्टरकार्ड अग्रिम कर (Advance Tax) के रूप में जमा कराता है।
- यदि मास्टरकार्ड केस जीतता है, तो यह राशि रिफंड होगी; और यदि हारता है, तो पूरा टैक्स पहले ही सरकार के पास सुरक्षित है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं AAR का 2018 का विवादित फैसला
- AAR का 2018 का निष्कर्ष: अथॉरिटी फॉर एडवांस रूलिंग्स (AAR) ने 2018 में फैसला सुनाया था कि मास्टरकार्ड एशिया पैसिफिक (सिंगापुर) का भारत में कई रूपों में स्थायी प्रतिष्ठान (PE) मौजूद है:
- फिक्स्ड प्लेस PE: भारतीय बैंकों के परिसरों में स्थापित MIPs हार्डवेयर और उसका टेलीकॉम नेटवर्क।
- सब्सिडियरी PE: मास्टरकार्ड इंडिया सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड द्वारा भारत में प्रदान की जाने वाली सहायता सेवाएं।
- रॉयल्टी का दावा: AAR ने यह भी माना था कि भारतीय बैंकों और ग्राहकों से मास्टरकार्ड द्वारा ली जाने वाली फीस का एक बड़ा हिस्सा आयकर अधिनियम और DTAA के तहत ‘रॉयल्टी’ (Royalty) की श्रेणी में आता है, जिस पर भारत में पूरा टैक्स देय है।
- हाईकोर्ट का अंतरिम संरक्षण: 2018 में याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने आयकर विभाग को अंतिम असेसमेंट ऑर्डर (Final Assessment Orders) पारित करने से रोक दिया था। सितंबर 2021 में अदालत ने असेसमेंट वर्ष 2018-19, 2019-20 और 2020-21 के लिए भी इस रोक को निरंतर रखा था, बशर्ते कंपनी तय टैक्स जमा करती रहे।
आगे की कार्यवाही
खंडपीठ ने संकेत दिया है कि वह इस जटिल वित्तीय मामले की सुनवाई को निरंतरता में जारी रखेगी। मामले की विस्तृत सुनवाई पूरे सप्ताह चलने की संभावना है, जिसके बाद अदालत भारत में डिजिटल पेमेंट गेटवे कंपनियों पर टैक्स देनदारी के संबंध में अपना ऐतिहासिक फैसला सुरक्षित कर सकती है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: मास्टरकार्ड एशिया पैसिफिक प्राइवेट लिमिटेड बनाम भारत संघ एवं अन्य [W.P.(C) 4124/2018 – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (Mastercard) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे (निर्देशन: DMD Advocates)
- प्रतिवादी (आयकर विभाग / भारत संघ) की ओर से: वरिष्ठ स्थायी वकील
- प्रासंगिक कानून एवं संधियां:
- आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 9(1)(i) (भारत में अर्जित या प्रोद्भूत आय), धारा 9(1)(vi) (रॉयल्टी), धारा 90 (DTAA राहत) एवं धारा 245R (AAR व्यवस्था)
- भारत-सिंगापुर दोहरा कराधान परिहार समझौता (India-Singapore DTAA) – अनुच्छेद 5 (स्थायी प्रतिष्ठान – Permanent Establishment), अनुच्छेद 7 (व्यावसायिक लाभ – Business Profits) एवं अनुच्छेद 12 (रॉयल्टी और तकनीकी सेवाओं के लिए शुल्क)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- फॉर्मूला वन वर्ल्ड चैंपियनशिप लिमिटेड बनाम आयकर आयुक्त (2017, सुप्रीम कोर्ट) — ‘स्थायी प्रतिष्ठान के गठन के लिए व्यवसाय के स्थान पर विदेशी उद्यम का निश्चित नियंत्रण (Disposal Test) होना अनिवार्य है।’
- इंजीनियरिंग एनालिसिस सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाम सीआईटी (2021, सुप्रीम कोर्ट) — ‘कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और डिजिटल सुविधाओं के उपयोग के लिए भुगतान को स्वतः रॉयल्टी नहीं माना जा सकता जब तक कॉपीराइट का विधिक हस्तांतरण न हो।’
- पीठ: न्यायमूर्ति दिनेश मेहता और न्यायमूर्ति अदिति चौधरी (दिल्ली उच्च न्यायालय)
Mastercard Asia Pacific: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठ (Judges) | न्यायमूर्ति दिनेश मेहता और न्यायमूर्ति अदिति चौधरी |
| याचिकाकर्ता | मास्टरकार्ड एशिया पैसिफिक (Mastercard Asia Pacific) |
| मुख्य विवाद | भारत-सिंगापुर दोहरा कर कराधान बचाव समझौता (DTAA) और ‘स्थाई प्रतिष्ठान’ (Permanent Establishment) का दर्जा |
| मास्टरकार्ड के वरिष्ठ वकील | वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे (Harish Salve) |

