हाईकोर्ट के फैसले की पृष्ठभूमि
23 जनवरी 2026 को कर्नाटक हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू की अध्यक्षता वाली पीठ ने एग्रीगेटर्स (Ola, Uber, Rapido) की अपीलों को स्वीकार करते हुए बाइक टैक्सियों पर लगी रोक हटा दी थी। कोर्ट ने माना था कि:
- दोपहिया वाहन भी मोटर वाहन अधिनियम के तहत ‘परिवहन वाहन’ (Transport Vehicle) की श्रेणी में आते हैं यदि उनका उपयोग सवारी ले जाने के लिए किया जाता है।
- केवल वाहन के मोटरसाइकिल होने के आधार पर परमिट देने से इनकार करना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत व्यापार करने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
नई दिल्ली: कर्नाटक में दोपहिया वाहनों को ‘बाइक टैक्सी’ (Bike Taxis) के रूप में संचालित करने की अनुमति देने, उनके पंजीकरण और परमिट जारी करने के कर्नाटक उच्च न्यायालय के निर्देश के खिलाफ राज्य के पारंपरिक सार्वजनिक परिवहन क्षेत्र ने देश की शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया है।
याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क है कि उच्च न्यायालय ने अपने फैसले के जरिए कार्यपालिका और राज्य सरकार के नीतिगत कार्यक्षेत्र (Policy Domain) में हस्तक्षेप करते हुए बाइक टैक्सियों के लिए एक न्यायिक विनियामक रास्ता तैयार कर दिया है, जो संविधान के तहत शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत के विपरीत है। उल्लेखनीय है कि कर्नाटक राज्य सरकार ने भी उच्च न्यायालय के इस आदेश के खिलाफ पहले ही सुप्रीम कोर्ट में एक अलग अपील दायर कर रखी है। कर्नाटक के पांच प्रमुख ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालक संघों तथा एक व्यक्तिगत चालक ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर कर हाईकोर्ट के 23 जनवरी के फैसले को चुनौती दी है और उस पर तत्काल अंतरिम रोक लगाने की गुहार लगाई है।
याचिका दायर करने वाले संघ एवं पक्षकार
यह संयुक्त कानूनी चुनौती अधिवक्ता के. शिवा के माध्यम से दायर की गई है, जिसमें कर्नाटक के निम्नलिखित प्रमुख चालक संगठन शामिल हैं:
- नादप्रभु केंपेगौड़ा ऑटो चालकर संघटने (Nadaprabhu Kempegowda Auto Chalakara Sanghatane)
- कर्नाटक वेंकटगौड़ा ऑटो मट्टू टैक्सी चालकर संघ (Karnataka Venkategowda Auto Mathu Taxi Chalakara Sangha)
- ग्रेटर बैंगलोर चालकर संघ (Greater Bangalore Chalakara Sangha)
- कर्नाटक सारथीगल महासंघ (Karnataka Sarathigala Mahasangha)
- जय कर्नाटक सारथी सेने ट्रस्ट (Jai Karnataka Sarathi Sene Trust)
- सतीश के.एस. (व्यक्तिगत ऑटो-रिक्शा चालक)
सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत प्रमुख विधिक आधार एवं आपत्तियां
1. न्यायिक अतिक्रमण बनाम राज्य का नीतिगत क्षेत्राधिकार
- याचिकाकर्ताओं ने दलील दी है कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत परिवहन नीतियां बनाना, परमिट की शर्तें तय करना और अनुबंध वाहनों (Contract Carriages) का नियमन करना राज्य सरकार और सांविधिक परिवहन प्राधिकरणों (State Transport Authorities) का विशेष नीतिगत अधिकार क्षेत्र है।
- याचिका में कहा गया है:“एक संवैधानिक अदालत राज्य सरकार को किसी विशिष्ट परिवहन नीति को बनाने या लागू करने के लिए विवश नहीं कर सकती, विशेषकर तब जब ऐसा निर्देश निजी ऐप-आधारित एग्रीगेटर्स (Aggregators) के व्यावसायिक और कारोबारी हितों की पूर्ति करता हो।”
2. 1.5 लाख पारंपरिक चालकों की आजीविका और विनियामक समानता (Regulatory Parity) का अभाव
- याचिका में रेखांकित किया गया है कि केवल बेंगलुरु शहर में लगभग 1.5 लाख ऑटो-रिक्शा चालक, टैक्सी परमिट धारक और अन्य विनियमित ऑपरेटर मौजूद हैं, जिनकी आजीविका सीधे तौर पर प्रभावित होगी।
- असमान विनियामक बोझ:
- मौजूदा ऑटो और टैक्सी ऑपरेटरों को वाणिज्यिक परमिट शर्तों, वार्षिक फिटनेस प्रमाणपत्र (FC), भारी वाणिज्यिक बीमा प्रीमियम, वाणिज्यिक कराधान (Commercial Taxes), मीटर-आधारित किराया नियंत्रण (Fare Regulation) और विशिष्ट बैज/लाइसेंसिंग नियमों का कड़ाई से पालन करना पड़ता है।
- इसके विपरीत, निजी दोपहिया वाहनों को बिना किसी ठोस और समान विनियामक सुरक्षा उपायों के वाणिज्यिक संचालन की अनुमति देना एक ‘असमान खेल का मैदान’ (Unequal Playing Field) तैयार करता है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 19(1)(g) (आजीविका का अधिकार) का उल्लंघन करता है।
3. 2019 की विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट की अनदेखी
- याचिका में 2019 में गठित एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति की आधिकारिक रिपोर्ट पर भरोसा जताया गया है।
- उक्त रिपोर्ट में सड़क सुरक्षा (Road Safety), महिलाओं की सुरक्षा, अत्यधिक यातायात संकुलन (Traffic Congestion), सड़क-स्थान दक्षता (Road-Space Efficiency) और पर्यावरणीय उत्सर्जन (Emissions) के आधार पर बेंगलुरु जैसे सघन महानगर में बाइक टैक्सियों को अनुमति न देने की स्पष्ट सिफारिश की गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि उच्च न्यायालय ने इस विशेषज्ञ रिपोर्ट के निष्कर्षों को नजरअंदाज किया।
मामले की पृष्ठभूमि: कर्नाटक हाईकोर्ट का 23 जनवरी का फैसला
- विवाद की जड़: एग्रीगेटर कंपनियों (जैसे Rapido, Uber आदि) और बाइक टैक्सी ऑपरेटरों ने कर्नाटक सरकार द्वारा उनके संचालन पर रोक लगाने और मोटर वाहन अधिनियम के तहत परमिट न दिए जाने के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
- हाईकोर्ट का निर्देश (23 जनवरी): कर्नाटक उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने राज्य सरकार और परिवहन विभाग को निर्देश दिया था कि वे मोटरसाइकिलों को परिवहन वाहनों (Transport Vehicles) के रूप में पंजीकृत करने और उन्हें मोटर वाहन अधिनियम की धारा 73 व 74 के तहत ‘कॉन्ट्रैक्ट कैरिज’ के रूप में संचालित करने के लिए प्राप्त परमिट आवेदनों पर विधि सम्मत विचार करें।
- राज्य की अपील: कर्नाटक सरकार ने इस फैसले को स्वीकार नहीं किया और इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की, जो वर्तमान में विस्तृत सुनवाई के लिए लंबित है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: नादप्रभु केंपेगौड़ा ऑटो चालकर संघटने व अन्य बनाम कर्नाटक राज्य व अन्य [विशेष अनुमति याचिका (सिविल) – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- याचिकाकर्ताओं के वकील: अधिवक्ता के. शिवा
- प्रासंगिक कानून एवं धाराएं:
- मोटर वाहन अधिनियम, 1988 (Motor Vehicles Act, 1988) की धारा 2(7) (कॉन्ट्रैक्ट कैरिज), धारा 66 (परमिट की आवश्यकता), धारा 73, धारा 74 एवं धारा 93 (एग्रीगेटर्स के नियमन की शक्तियां)
- कर्नाटक मोटर वाहन नियम, 1989
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता), अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यापार व आजीविका की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 21 एवं अनुच्छेद 136 (विशेष अनुमति याचिका)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- रोहतास इंडस्ट्रीज बनाम रोहतास इंडस्ट्रीज स्टाफ यूनियन (सुप्रीम कोर्ट) एवं अरुण कुमार अग्रवाल बनाम भारत संघ — ‘सार्वजनिक नीति (Public Policy) और आर्थिक विनियामक ढांचे का निर्धारण कार्यपालिका और विधायिका का कार्य है; अदालतें नीतियों को फिर से नहीं लिख सकतीं।’
- रोड सेफ्टी पर सुप्रीम कोर्ट कमेटी के दिशा-निर्देश — ‘यात्रियों की सुरक्षा और भीड़-भाड़ वाले शहरों में सार्वजनिक सुरक्षा मानकों से समझौता नहीं किया जा सकता।’
- अदालत: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
- वर्तमान स्थिति: याचिकाएं रजिस्ट्री में दाखिल हो चुकी हैं और जल्द ही प्रारंभिक सुनवाई तथा अंतरिम रोक के अनुरोध के लिए पीठ के समक्ष सूचीबद्ध की जाएंगी।
Bike Taxi Permit: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| याचिकाकर्ता | 5 ऑटो-टैक्सी यूनियनें (जैसे केम्पेगौड़ा ऑटो संघ, ग्रेटर बैंगलोर चालक संघ आदि) और 1 चालक |
| चैलेंज किया गया आदेश | कर्नाटक हाईकोर्ट का 23 जनवरी 2026 का फैसला (जिसमें बाइक टैक्सी पर रोक हटाई गई थी) |
| संबंधित एग्रीगेटर्स | ओला (Ola), उबर (Uber) और रैपिडो (Rapido) |
| अन्य अपीलकर्ता | कर्नाटक राज्य सरकार भी हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ SC में अपील दायर कर चुकी है |

