याचिका में उठाए गए मुख्य कानूनी व ऐतिहासिक बिंदु
- 6 पदों (Stanzas) और 1937 के कांग्रेस प्रस्ताव का हवाला: याचिका में कहा गया है कि ‘वंदे मातरम’ के पहले दो पद देशभक्ति से ओत-प्रोत हैं, जबकि अंतिम चार पद (जो बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास ‘आनंदमठ’ में जोड़े गए थे) में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे हिंदू देवी-देवताओं का स्तुति-गान है। 1937 में मुस्लिम सदस्यों की आपत्तियों के बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने सार्वजनिक सभाओं में केवल पहले दो पदों को गाने का निर्णय लिया था।
- धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकार: याचिका में तर्क दिया गया है कि सभी 6 पदों को सजा के डर (3 साल तक की जेल) से अनिवार्य बनाना संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a), 21 और 25(1) (धार्मिक स्वतंत्रता और अंतरात्मा की आवाज) का उल्लंघन है।
- बिजो इमैनुएल फैसले पर निर्भरता: याचिकाकर्ता ने 1986 के प्रसिद्ध बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य फैसले का सहारा लिया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने उन स्कूली बच्चों को संरक्षण दिया था जिन्होंने अपने धार्मिक विश्वासों के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था, हालांकि वे इसके सम्मान में शांत खड़े रहे थे।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रीय सम्मान का अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान उस समय अभूतपूर्व टकराव और तीखी नोकझोंक देखने को मिली, जब भारत के सॉलिसीटर जनरल (SG) तुषार मेहता और उड़ीसा उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश व वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर आमने-सामने आ गए।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ कर्नाटक संगीत के प्रमुख गायक टी.एम. कृष्णा की उस रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें ‘वंदे मातरम’ के सभी छह अंतरों (Stanzas) को अनिवार्य रूप से गाने और इसे रोकने पर 3 वर्ष तक की जेल की सजा के नए कानून को चुनौती दी गई है। विवाद का मुख्य बिंदु सॉलिसीटर जनरल द्वारा बहस के दौरान “नक्सली” (Naxalite) शब्द का प्रयोग करना और फिर उस पर अडिग रहते हुए खेद जताने से साफ इनकार करना रहा। वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने भी हस्तक्षेप करते हुए तीखी टिप्पणी की कि “सोचना या विचार रखना नक्सली होना नहीं है।”
अदालत कक्ष में हुई सीधी नोकझोंक: शब्द-दर-शब्द संवाद
बहस उस समय गरमा गई जब डॉ. मुरलीधर ने कानून-निर्माण की प्रक्रिया और जनता की राय पर सवाल उठाए:
- डॉ. एस. मुरलीधर: “इतिहास संवैधानिक निर्णय लेने की प्रक्रिया को नहीं बांधता… आदर्श रूप से इन संवेदनशील विषयों को सार्वजनिक जनमत के निर्माण के जरिए विकसित होना चाहिए… इसीलिए मैं यहां विधि-निर्माण की पूरी प्रक्रिया के इस बड़े प्रश्न को उठा रहा हूं।”
- सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता: “जिन्होंने इसे पसंद नहीं किया, उन्होंने संसद में आपत्ति जताई थी; अब वे इसे यहां अदालत में लेकर आ रहे हैं… संसद संविधान के अनुसार निर्णय लेती है। उस तरह नहीं जिस तरह नक्सली (Naxalites) तय करते हैं।”
- डॉ. एस. मुरलीधर (तीखा विरोध जताते हुए): “लाइव स्ट्रीमिंग के दौरान भारत के सॉलिसीटर जनरल के मुंह से मैं यह अभिव्यक्ति बिल्कुल नहीं सुनना चाहता। माई लॉर्ड, मैं इसका कड़ा विरोध करता हूं… सॉलिसीटर जनरल ने याचिकाकर्ता के लिए जो शब्द इस्तेमाल किया है, उसे वे दोहराएं!”
- एसजी तुषार मेहता: “मैंने इस शब्द का प्रयोग इसलिए किया क्योंकि आप संविधान के अनुसार चलने वाली निर्णय प्रक्रिया को चुनौती दे रहे हैं।”
- डॉ. एस. मुरलीधर: “यह एक विधि अधिकारी को बिल्कुल शोभा नहीं देता (It doesn’t behoove a law officer)… मैंने आज तक किसी सरकारी लॉ ऑफिसर को इस तरह की भाषा का प्रयोग करते नहीं सुना।”
- पीठ (हस्तक्षेप करते हुए): “हम इस शब्द को रिकॉर्ड पर नहीं लेंगे। हम केवल एक विशुद्ध विधिक और संवैधानिक व्याख्या के प्रश्न तक ही स्वयं को सीमित रख रहे हैं।”
- एसजी तुषार मेहता (माफी से इनकार करते हुए): “मैं दोहराऊंगा जो मैंने कहा… निर्णय प्रक्रिया संसद द्वारा की जाती है और मैंने कहा कि यह संवैधानिक रास्ता है, न कि वह जो कोई नक्सली चाहता है। और मुझे इस पर कोई खेद नहीं है (And I am not sorry about it)।”
- डॉ. एस. मुरलीधर: “वे इसे फिर दोहरा रहे हैं। अब मैं इस पर अपना सबसे कड़ा विरोध (Strongest Protest) दर्ज कराता हूं… यह सिर्फ गैलरी को लुभाने (Playing to the gallery) के लिए किया जा रहा है।”
- एसजी तुषार मेहता: “नहीं, नहीं, मैं किसी व्यक्ति पर व्यक्तिगत लेबल नहीं लगा रहा हूं। माई लॉर्ड, मैं विचारधारा (Ideology) की बात कर रहा हूं।”
- वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े (बीच में हस्तक्षेप करते हुए):“सोचना कोई नक्सली होना नहीं है (To think is not to be a Naxalite)।”
याचिका में उठाए गए विस्तृत संवैधानिक व ऐतिहासिक आधार
कर्नाटक गायक टी.एम. कृष्णा द्वारा दायर याचिका में 2026 के संशोधन और गृह मंत्रालय (MHA) के निर्देशों को निरस्त करने की मांग करते हुए कई गंभीर कानूनी बिंदु उठाए गए हैं:
1. अनिवार्य रूढ़िवादिता और दंडात्मक प्रतिबंध (Compelled Orthodoxy)
- याचिका में कहा गया है कि किसी प्रोटोकॉल को विनियमित करने और उस पर दंडात्मक प्रतिबंध (Penal Sanctions) लगाने में जमीन-आसमान का अंतर है।
- आपराधिक दंड का भय दिखाकर नागरिकों को सभी छह अंतरे गाने के लिए विवश करना एक ऐतिहासिक प्रतीक को जबरन “अनिवार्य रूढ़िवादिता” में तब्दील करना है।
2. देवी-देवताओं का आह्वान और धर्मनिरपेक्षता का हनन (Stanzas 3 to 6)
- याचिका के अनुसार, वंदे मातरम के पहले दो अंतरे केवल मातृभूमि के प्राकृतिक सौंदर्य और समृद्धि का गुणगान करते हैं, जिसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने एक स्वतंत्र देशभक्ति गीत के रूप में लिखा था।
- बाद के चार अंतरे (3 से 6) तब जोड़े गए जब इसे उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया। इन अंतिम चार अंतरों में सीधे तौर पर हिंदू देवियों—दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती—का आह्वान और स्तुति है।
- याचिका में तर्क दिया गया है कि यह सरकारी कदम नागरिकों को एक ऐसे प्रतीक के प्रति अपनी औपचारिक सहमति देने के लिए बाध्य करता है जो प्रत्यक्ष रूप से भक्तिपूर्ण, देवी-आह्वान से जुड़ा और गैर-धर्मनिरपेक्ष (Devotional and Non-secular) है।
3. 1937 की ऐतिहासिक सहमति और अल्पसंख्यकों पर प्रभाव
- याचिका में वर्ष 1937 के कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) के उस ऐतिहासिक निर्णय का हवाला दिया गया है, जिसमें मुस्लिम सदस्यों की आपत्तियों के बाद राष्ट्रीय आयोजनों में केवल पहले दो अंतरों के गायन को ही सर्वसम्मति से सीमित किया गया था।
- याचिकाकर्ता का आरोप है कि 2026 के निर्देश ऊपरी तौर पर निष्पक्ष दिखते हैं, लेकिन सारभूत रूप से यह बहुसंख्यकवादी धार्मिक संरेखण का संकेत देते हैं और आस्थावान मुसलमानों तथा अन्य अंतरात्मा के आपत्तिकर्ताओं (Conscientious Objectors) पर एक प्रकार की वैचारिक अधीनता थोपते हैं।
4. बिजो इमैनुएल नजीर का संरक्षण
- याचिका सुप्रीम कोर्ट के 1986 के ऐतिहासिक फैसले बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य पर आधारित है, जहां सर्वोच्च अदालत ने जेहोवा विटनेस संप्रदाय के उन स्कूली बच्चों को निष्कासन से बचाया था जो धार्मिक कारणों से राष्ट्रगान नहीं गाते थे, लेकिन उसके सम्मान में शांत खड़े रहते थे।
Vande Matram-I: विधिक विवरण
- केस संदर्भ: टी.एम. कृष्णा बनाम भारत संघ एवं अन्य [रिट याचिका (सिविल) – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून एवं संशोधन: राष्ट्रीय सम्मान का अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 3 (वर्ष 2026 के संशोधन द्वारा प्रतिस्थापित); गृह मंत्रालय (MHA) के संबंधित कार्यालय ज्ञापन व प्रोटोकॉल आदेश
- प्रासंगिक संवैधानिक प्रावधान: भारत का संविधान – अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 15(1) (धर्म आधारित भेदभाव का निषेध), अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व मौन रहने का अधिकार), अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत गरिमा व स्वतंत्रता) एवं अनुच्छेद 25(1) (धर्म व अंतःकरण की स्वतंत्रता)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य (1986, सुप्रीम कोर्ट) — ‘किसी भी नागरिक को अपनी धार्मिक या अंतरात्मा की आस्था के विपरीत कोई गान गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, बशर्ते वह उसके प्रति कोई असम्मान न दिखाए।’
- श्रीमती सुप्रिया बनाम भारत संघ — ‘आपराधिक कानून में शब्दों की परिभाषा स्पष्ट और निश्चित होनी चाहिए; विधायी अस्पष्टता के आधार पर नागरिकों की स्वतंत्रता को खतरे में नहीं डाला जा सकता।’
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर (सहयोगी: वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े)
- केंद्र सरकार की ओर से: भारत के सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (सर्वोच्च न्यायालय)
- वर्तमान स्थिति: केंद्र सरकार को याचिका पर दो सप्ताह के भीतर अपना औपचारिक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।

