सुप्रीम कोर्ट में तर्क और सख्त टिप्पणियां
- ‘घर वापसी’ (Ghar Wapsi) से अयोग्यता खत्म नहीं होती:नागेंदर के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने तर्क दिया कि नागेंदर ने बाद में बीआरएस में वापसी का प्रयास किया है और 10वीं अनुसूची में पार्टी द्वारा क्षमा किए जाने का प्रावधान है।इस पर न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की: “क्या घर वापसी आपको अयोग्यता से बचा सकती है? जब दलबदल का कृत्य हो गया, तो आप सदन की सदस्यता खो देते हैं। आपको पार्टी में वापस लाया जा सकता है, लेकिन सदन में नहीं।”
- फिक्स्ड डिपॉजिट और शेयर मार्केट का उदाहरण:पीठ ने तीखा व्यंग्य करते हुए कहा:“आपकी स्थिति ‘आया राम, गया राम’ नहीं, बल्कि ‘फिर आया राम’ की है। आपकी विधायक की सीट फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) जैसी थी और आपने सांसद सीट के लिए शेयर मार्केट में निवेश किया। आपने एक बम्पर ड्रॉ का दांव खेला, अब आपकी FD जब्त हो चुकी है।”
नई दिल्ली: संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) के तहत दलबदल रोधी कानून (Anti-Defection Law), विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) के अधिकार क्षेत्र और जनप्रतिनिधियों के अवसरवादी दल-बदल आचरण पर देश की शीर्ष अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए बड़ा फैसला सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना राष्ट्र समिति/भारत राष्ट्र समिति (BRS) के टिकट पर विधायक चुने जाने के बाद सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी में शामिल होकर लोकसभा चुनाव लड़ने वाले खैराताबाद (Khairatabad) के विधायक दानम नागेंद्र (Danam Nagender) की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत ने तेलंगाना उच्च न्यायालय के उस फैसले में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया, जिसने विधानसभा अध्यक्ष के अयोग्यता खारिज करने वाले आदेश को निरस्त करते हुए दानम नागेंद्र को 23 अप्रैल 2024 से पूर्वव्यापी प्रभाव से अयोग्य (Disqualified) घोषित कर दिया था। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने भारतीय राजनीति में बार-बार पाला बदलने वाले नेताओं पर तंज कसते हुए मौखिक टिप्पणी की कि यह मामला विशुद्ध रूप से “आया राम, गया राम, फिर आया राम” जैसा है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी की दलीलें सुनने के बाद यह फैसला पारित किया।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख मौखिक अवलोकन एवं विधिक निष्कर्ष
1. ‘आया राम, गया राम, फिर आया राम’ पर अदालत का तंज:
- सुनवाई के दौरान जब विधायक की ओर से बचाव की दलीलें पेश की जा रही थीं, तब पीठ के सदस्य न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची ने राजनीति में सिद्धांतहीन दलबदल और पाला बदलने की प्रवृत्ति पर तीखा प्रहार करते हुए मौखिक रूप से कहा:“आपका मामला तो ‘आया राम, गया राम, फिर आया राम’ (Aaya Ram, Gaya Ram, phir aaya Ram) वाला है?”
- यह ऐतिहासिक राजनीतिक मुहावरा भारतीय संसदीय लोकतंत्र में उन जनप्रतिनिधियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो निजी स्वार्थ या सत्ता के लिए लगातार अपनी राजनीतिक निष्ठाएं बदलते रहते हैं।
2. हाईकोर्ट के आदेश में कोई त्रुटि नहीं:
- मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि जब कोई निर्वाचित विधायक किसी अन्य राजनीतिक दल का चुनाव चिन्ह लेकर संसदीय चुनाव में नामांकन दाखिल करता है, तो दसवीं अनुसूची के पैरा 2(1)(a) के तहत उसकी मूल पार्टी की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ने (Voluntarily giving up membership) का आचरण स्वतः सिद्ध हो जाता है।
- अदालत ने माना कि तेलंगाना उच्च न्यायालय ने विधानसभा अध्यक्ष के एकतरफा और त्रुटिपूर्ण आदेश को रद्द कर बिल्कुल सही विधिक दृष्टिकोण अपनाया है, इसलिए इसमें सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं बनता।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विधिक कालक्रम
- BRS से विधानसभा चुनाव जीतना (2023):
- दानम नागेंद्र नवंबर/दिसंबर 2023 के तेलंगाना विधानसभा चुनाव में BRS के टिकट पर खैराताबाद विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए थे।
- सत्ता परिवर्तन और कांग्रेस में प्रवेश (2024):
- तेलंगाना में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद नागेंद्र ने पाला बदल लिया।
- 2024 के आम लोकसभा चुनाव में वे सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए और कांग्रेस के आधिकारिक चुनाव चिन्ह पर सिकंदराबाद लोकसभा क्षेत्र (Secunderabad Lok Sabha Seat) से सांसद पद के लिए चुनाव लड़ा।
- अयोग्यता की मांग और विधानसभा अध्यक्ष का आदेश:
- विधानसभा में भाजपा विधायक दल के नेता अल्लेती महेश्वर रेड्डी और BRS के वरिष्ठ नेता पी. कौशिक रेड्डी ने संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत विधानसभा अध्यक्ष गद्दाम प्रसाद कुमार के समक्ष याचिकाएं दायर कर नागेंद्र को अयोग्य ठहराने की मांग की।
- हालांकि, तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष गद्दाम प्रसाद कुमार ने 11 मार्च को अप्रत्याशित रूप से उन सभी अयोग्यता याचिकाओं को खारिज कर दिया था।
- तेलंगाना हाईकोर्ट की सख्ती और ऐतिहासिक आदेश:
- अध्यक्ष के आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने तेलंगाना उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल की।
- उच्च न्यायालय ने विधानसभा अध्यक्ष के आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया और व्यवस्था दी कि दानम नागेंद्र द्वारा 2024 लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन हलफनामा दाखिल करने की तिथि—23 अप्रैल 2024—से ही उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त मानी जाएगी और वे विधायक के रूप में अयोग्य घोषित किए जाते हैं।
- सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: हाईकोर्ट के इस फैसले को दानम नागेंद्र ने वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसे शीर्ष अदालत ने खारिज कर दिया।
दसवीं अनुसूची का पैरा 2(1)(a): ‘स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना’
यह निर्णय संविधान की दसवीं अनुसूची के उस स्थापित विधिक सिद्धांत को और सुदृढ़ करता है:
- प्रत्यक्ष इस्तीफे की आवश्यकता नहीं: पैरा 2(1)(a) के तहत किसी विधायक को अपनी पार्टी से औपचारिक लिखित इस्तीफा देने की जरूरत नहीं होती।
- आचरण से त्याग (Giving up by Conduct): यदि कोई निर्वाचित सदस्य किसी विरोधी राजनीतिक दल के मंच पर सक्रिय रूप से शामिल होता है, उसकी सदस्यता ग्रहण करता है या उसके टिकट पर अन्य चुनाव लड़ता है, तो कानूनन यह माना जाता है कि उसने अपने आचरण से मूल दल की सदस्यता का स्वेच्छा से त्याग कर दिया है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: दानम नागेंद्र बनाम अल्लेती महेश्वर रेड्डी, पी. कौशिक रेड्डी व अन्य [विशेष अनुमति याचिका (सिविल) – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- अपीलकर्ता (विधायक) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी
- प्रतिवादियों (याचिकाकर्ताओं) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता एवं संबंधित राज्य पैनल काउंसल
- प्रासंगिक संवैधानिक प्रावधान:
- भारत का संविधान – दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) का पैरा 2(1)(a) (सदन के सदस्य की स्वेच्छा से राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ने पर अयोग्यता)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 191(2) (विधानसभा या विधान परिषद की सदस्यता के लिए अयोग्यताएं)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 226 (विधानसभा अध्यक्ष के आदेशों पर उच्च न्यायालयों की न्यायिक समीक्षा की शक्ति)
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- किहोटो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू (1992, सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ) — ‘दसवीं अनुसूची के तहत विधानसभा अध्यक्ष एक अधिकरण (Tribunal) के रूप में कार्य करते हैं; उनके आदेश अंतिम नहीं हैं और वे हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे में आते हैं।’
- रवि एस. नाइक बनाम भारत संघ (1994, सुप्रीम कोर्ट) — ”स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ने’ (Voluntarily giving up membership) का अर्थ केवल औपचारिक इस्तीफा नहीं है; किसी सदस्य का राजनीतिक आचरण यह तय करने के लिए पर्याप्त है कि उसने पार्टी निष्ठा त्याग दी है।’
- केशम मेघचंद्र सिंह बनाम माननीय अध्यक्ष, मणिपुर विधानसभा (2020, सुप्रीम कोर्ट) — ‘दलबदल याचिकाओं पर विधानसभा अध्यक्षों को उचित समय (सामान्यतः 3 महीने) के भीतर निष्पक्ष फैसला करना चाहिए; राजनीतिक संरक्षण के चलते मामलों को दबाया नहीं जा सकता।’
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (सर्वोच्च न्यायालय)
- अंतिम निर्णय: एसएलपी खारिज; तेलंगाना उच्च न्यायालय का 23 अप्रैल 2024 से अयोग्यता का आदेश पूरी तरह बहाल और प्रभावी।
BRS MLA: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहाना |
| संबंधित प्रावधान | भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) |
| मुख्य निर्णय | तेलंगाना हाईकोर्ट के अयोग्यता आदेश को सही ठहराया; दानम नागेंदर की याचिका खारिज। |
| परिणाम | खैराबाद विधानसभा सीट 23 अप्रैल 2024 से रिक्त घोषित की गई। |

