सुप्रीम कोर्ट के 3 मुख्य दिशानिर्देश
- आवासीय क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों पर तुरंत सीलिंग: प्राधिकरण उन क्षेत्रों को प्राथमिकता देंगे जिन्हें स्पष्ट रूप से ‘आवासीय’ दर्शाया गया है। यदि ऐसे आवासीय भूखंडों या मकानों में दुकानें, अस्पताल, कोचिंग सेंटर या कोई भी व्यावसायिक काम होता पाया जाता है, तो उसे प्रथम दृष्टया ही सील (Sealed in the first instance) किया जाएगा।
- अदालती मुकदमों (Lis) का बहाना नहीं चलेगा: अदालत ने साफ किया कि भले ही किसी संपत्ति का मालिकाना हक (Title Dispute) या अन्य कोई विवाद निजी पक्षों या सरकार के बीच कोर्ट में लंबित क्यों न हो—यदि उस भवन/भूमि का उपयोग स्वीकृत मास्टर प्लान और अलॉटमेंट के विपरीत हो रहा है, तो मुकदमा लंबित होना सीलिंग की कार्रवाई में बाधा नहीं बनेगा।
- मिश्रित उपयोग (Mixed Use) वाले क्षेत्रों पर यथास्थिति: जिन क्षेत्रों का उपयोग स्पष्ट रूप से तय नहीं है (जैसे मिश्रित आवासीय/व्यावसायिक क्षेत्र), वहां फिलहाल यथास्थिति (Status Quo) बनाई रखी जाएगी, हालांकि कागजी व कानूनी प्रक्रियाएं जारी रह सकती हैं।
नई दिल्ली: देश भर के शहरों में मास्टर प्लान, भवन निर्माण उपविधियों (Building Bye-laws) और लैंड-यूज (भू-उपयोग) अनुमतियों के खुले उल्लंघन पर सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रव्यापी स्तर पर सख्त आदेश जारी किया है।
केवल आवासीय उपयोग के लिए निर्धारित क्षेत्रों में चल रही सभी व्यावसायिक गतिविधियों को तुरंत रोकें
न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की खंडपीठ ने 22 सितंबर 2026 को पारित अपने व्यापक आदेश में प्रशासनिक अधिकारियों को चेतावनी दी कि सीलिंग और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई में “पिक एंड चूज” (मनमाना या भेदभावपूर्ण चयन) की नीति किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यदि किसी प्राधिकरण ने चुनिंदा कार्रवाई की, तो अदालत इसे अत्यंत गंभीरता से लेगी। शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के नगर निगमों और विकास प्राधिकरणों को निर्देश दिया है कि वे केवल आवासीय उपयोग (Exclusively Residential Use) के लिए निर्धारित क्षेत्रों में चल रही सभी व्यावसायिक गतिविधियों को तुरंत रोकने को सर्वोच्च प्राथमिकता दें। अदालत ने दो-टूक व्यवस्था दी है कि जहां भी स्वीकृत भू-उपयोग के विपरीत व्यावसायिक गतिविधि पाई जाए, उन परिसरों को “प्रथम दृष्टया ही तुरंत सील (Sealed in the first instance)” किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा 22 सितंबर 2026 को जारी किए गए 3 मुख्य निर्देश
न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने नगर निकायों और राज्य प्राधिकारियों के लिए निम्नलिखित बाध्यकारी निर्देश तय किए:
1. विशुद्ध रिहायशी क्षेत्रों में तुरंत सीलिंग: “फिलहाल के लिए, प्राधिकरण यह सुनिश्चित करने को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगे कि विशेष रूप से आवासीय दर्शाए गए क्षेत्रों में—जहां राज्य सरकार या सक्षम प्राधिकारी द्वारा दी गई अनुमति केवल आवासीय उपयोग के लिए है—कोई भी व्यावसायिक गतिविधि संचालित न हो। यदि ऐसे क्षेत्रों में कोई भी व्यावसायिक गतिविधि चलती पाई जाती है, तो उस परिसर को प्रथम दृष्टया ही सील (Sealed in the first instance) कर दिया जाएगा।”
2. अनिर्धारित / मिश्रित क्षेत्रों में यथास्थिति (Status Quo):
- जिन क्षेत्रों में मास्टर प्लान के तहत भू-उपयोग स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं है (जैसे मिश्रित उपयोग / Mixed Use वाले क्षेत्र), वहां मिश्रित उपयोग की नीति पर विचार की आवश्यकता हो सकती है।
- अदालत ने आदेश दिया कि फिलहाल ऐसे अनिर्धारित क्षेत्रों में जमीनी स्तर पर यथास्थिति (Status Quo) में कोई छेड़छाड़ न की जाए, हालांकि कागजी व प्रशासनिक कार्यवाहियां (Proceedings on paper) जारी रह सकती हैं।
3. मालिकाना हक का मुकदमा (Pending Lis) सीलिंग में बाधा नहीं बनेगा: अदालत ने भू-माफियाओं और अवैध व्यावसायिक गतिविधि चलाने वालों के उस पुराने कानूनी पैंतरे को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया जिसमें दीवानी मुकदमा लंबित होने की आड़ ली जाती थी: “किसी भी ऐसे भवन, भूमि या क्षेत्र के संबंध में, जिसके मालिकाना हक या किसी अन्य विवाद को लेकर अदालत में कोई मुकदमा (Lis) लंबित है—चाहे वह निजी व्यक्तियों के बीच हो अथवा सरकार और संबंधित पक्षकार के बीच—उस मुकदमे की पेंडेंसी अधिकारियों द्वारा परिसर को सील करने के रास्ते में बाधा नहीं बनेगी, यदि उस परिसर का वास्तविक उपयोग उस उद्देश्य का उल्लंघन करता है जिसके लिए भूमि/भवन आवंटित किया गया था और जिसके लिए सक्षम प्राधिकारी ने नक्शा स्वीकृत किया था।”
‘पिक एंड चूज’ (Pick-and-Choose) दृष्टिकोण पर सख्त चेतावनी
शीर्ष अदालत ने स्थानीय निकायों, नगर निगमों और विकास प्राधिकरणों के अधिकारियों के भ्रष्ट व चयनात्मक रवैये पर कड़ा प्रहार किया:
- अदालत ने स्पष्ट किया कि कई बार अधिकारी रसूखदारों के अवैध परिसरों को छोड़ देते हैं और केवल छोटे व्यापारियों या चुनिंदा लोगों पर कार्रवाई करते हैं।
- पीठ ने चेतावनी दी कि किसी भी प्रकार का भेदभावपूर्ण या चयनात्मक प्रवर्तन (Discriminatory Enforcement) पाए जाने पर संबंधित नगर आयुक्तों और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त अवमानना और विभागीय कार्रवाई की जाएगी।
मामले की पृष्ठभूमि: एक इमारत से शुरू होकर बना ‘अखिल भारतीय अभियान’
- G+1 अवैध इमारत से शुरुआत: यह मामला मूल रूप से एक अनधिकृत G+1 (भूतल + 1 मंजिल) इमारत के निर्माण और लैंड-यूज उल्लंघन से शुरू हुआ था।
- मार्च 2026 में अखिल भारतीय दायरा: मामले की व्यापकता को देखते हुए मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने इसका दायरा पूरे देश में फैला दिया। अदालत ने देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की राजधानियों के नगर निगमों को रिहायशी इलाकों में गैर-आवासीय गतिविधियों के दुरुपयोग की विस्तृत जांच करने का आदेश दिया था।
- न्यायमित्र (Amicus Curiae) की नियुक्ति: अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता अजीत कुमार सिन्हा को इस मामले में सहायता हेतु न्यायमित्र नियुक्त किया।
- प्रमुख शहरों में जांच: इस कार्यवाही के तहत मेरठ, जयपुर, लखनऊ और दिल्ली जैसे महानगरों में लैंड-यूज के बड़े पैमाने पर उल्लंघनों की जांच शुरू हुई। इसमें मेरठ में रिहायशी इलाकों में चल रहे 44 व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की सीलिंग और दिल्ली/जयपुर में रिहायशी परिसरों के बेसमेंट और फ्लैटों में अवैध रूप से संचालित कोचिंग सेंटरों की कड़ी जांच शामिल है।
- पूर्णतः अनधिकृत निर्माणों का ध्वस्तीकरण: अदालत ने यह भी दोहराया कि कानून के अनुसार जो ढांचे पूरी तरह अनधिकृत (Wholly Unauthorised) पाए जाएं, उन्हें विधि सम्मत प्रक्रिया का पालन करते हुए सील किया जाए या सीधे ध्वस्त (Demolish) किया जाए।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: लोगनाथन बनाम तमिलनाडु राज्य व अन्य [विशेष अनुमति याचिका (सिविल) / अखिल भारतीय लैंड-यूज निगरानी – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- न्यायालय सहायता (Amicus Curiae): वरिष्ठ अधिवक्ता अजीत कुमार सिन्हा
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- विभिन्न राज्यों के नगर निगम अधिनियम (Municipal Corporation Acts) एवं नगर योजना एवं विकास अधिनियम (Town and Country Planning Acts)
- राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली मास्टर प्लान (MPD) व संबंधित राज्य राजधानी मास्टर प्लान
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार – नागरिकों के लिए सुरक्षित, योजनाबद्ध और शांतिपूर्ण रिहायशी वातावरण का अधिकार)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता – चुनिंदा कार्रवाई के खिलाफ संरक्षण)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 142 (सर्वोच्च न्यायालय की अंतर्निहित पूर्ण न्याय की शक्तियां)
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (दिल्ली सीलिंग केस, सुप्रीम कोर्ट) — ‘मास्टर प्लान एक वैधानिक कानून है; रिहायशी क्षेत्रों का अनियंत्रित व्यवसायीकरण बुनियादी नागरिक सुविधाओं (सड़क, सीवरेज, बिजली, शांति) को नष्ट करता है और सीलिंग इसका अनिवार्य वैधानिक उपचार है।’
- फ्रेंड्स कॉलोनी डेवलपमेंट कमेटी बनाम उड़ीसा राज्य (2004, सुप्रीम कोर्ट) — ‘योजनाबद्ध विकास के नियमों का उल्लंघन समाज के प्रति अपराध है; बिल्डरों और भूस्वामियों द्वारा स्वीकृत नक्शे के विपरीत किया गया कोई भी व्यावसायिक उपयोग बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।’
- पीठ: न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन (सर्वोच्च न्यायालय)
- अगली सुनवाई: मामले की प्रगति, विभिन्न राज्यों की सीलिंग रिपोर्ट और Amicus Curiae की सिफारिशों पर अगली विस्तृत सुनवाई 23 नवंबर 2026 को तय की गई है।
Sealing Process: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह एवं न्यायमूर्ति आर. महादेवन |
| मामला/क्षेत्र | देशव्यापी (Pan-India) आदेश (इमारत उप-नियमों और भूमि-उपयोग के उल्लंघन पर) |
| मुख्य निर्देश | 1. आवासीय क्षेत्रों में चल रही व्यावसायिक गतिविधियों को पहली बार में ही सील किया जाए। 2. मालिकाना हक (Title) का मुकदमा लंबित होने पर भी सीलिंग नहीं रुकेगी। 3. भेदभावपूर्ण/पसंद-आधारित कार्रवाई करने वाले अधिकारियों पर कड़ा रुख। |
| अगली सुनवाई | 23 नवंबर 2026 |

