Tuesday, September 29, 2026
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Cancer Medicine: मलयालम सिनेमा की कालजयी फिल्म ‘सुकृतम’ में कैंसर के इलाज का जो भयानक आर्थिक बोझ दिखाया गया था; तीन दशक बाद भी हालात जस के तस हैं

हाईकोर्ट ने फिल्म ‘सुकृतम’ का उल्लेख क्यों किया?

  1. फिल्म का दृश्य और संवाद:फिल्म ‘सुकृतम’ में ममूटी ने ‘रविशंकर’ नाम के एक पत्रकार की भूमिका निभाई थी, जो ब्लड कैंसर से पीड़ित होता है। हाईकोर्ट ने फिल्म के उस दृश्य को याद किया जहां रविशंकर अपने डॉक्टर से कहता है कि वह आगे इलाज नहीं कराना चाहता। वह एक बेहद भावुक भाषण में बताता है कि कैसे कैंसर के इलाज का भारी खर्च परिवारों को कर्ज के पहाड़ तले दबा देता है और वे अपना पूरा जीवन गिरवी रखने पर मजबूर हो जाते हैं।
  2. 30 साल बाद भी स्थिति जस की तस:न्यायमूर्ति मेनन ने कहा:“यह अत्यंत व्यथित करने वाला है कि इस कहानी को बड़े पर्दे पर उतारे जाने और राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर पुरस्कार जीतने के 30 से अधिक वर्ष बीत जाने के बाद भी, और अपार तकनीकी प्रगति के बावजूद, रोगियों और उनके परिवारों की दुर्दशा वैसी की वैसी ही बनी हुई है।”
  3. समाज में कला की भूमिका:अदालत ने कहा कि कला का उद्देश्य हमेशा समाज के विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे के जीवन और संघर्षों के प्रति जागरूक बनाना रहा है। लेकिन दुखद यह है कि इतनी सामाजिक जागरूकता के बावजूद, ऐसी परिस्थितियों में समाज और व्यवस्थाएं एक जगह ठहरी हुई हैं।

कोच्चि: जीवन रक्षक दवाओं की आसमान छूती कीमतों, पेटेंट एकाधिकार और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे आम नागरिकों की आर्थिक लाचारी पर केरल हाईकोर्ट ने न केवल सख्त कानूनी दृष्टिकोण अपनाया, बल्कि मानवीय संवेदनशीलता की एक अनूठी मिसाल पेश की है।

न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन ने रेखांकित किया कि ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात लेखक एम.टी. वासुदेवन नायर द्वारा लिखित और अभिनेता ममूटी (Mammooty) द्वारा अभिनीत इस फिल्म को रिलीज हुए 32 वर्ष बीत चुके हैं, देश ने अभूतपूर्व चिकित्सा एवं तकनीकी प्रगति की है, परंतु कैंसर के इलाज के भारी आर्थिक बोझ तले पिसने वाले मरीजों और उनके परिवारों की जमीनी त्रासदी आज भी वैसी ही बनी हुई है। उच्च न्यायालय ने स्तन कैंसर की पेटेंट दवाओं के अत्यधिक मूल्य निर्धारण से जुड़े स्वतः संज्ञान मामले के अंतिम फैसले के उपसंहार (Epilogue) में मलयालम सिनेमा की कालजयी फिल्म ‘सुकृतम’ (Sukrutham – 1994) का मार्मिक संदर्भ देते हुए गहरी व्यथा व्यक्त की।

फैसले के उपसंहार (Epilogue) में उच्च न्यायालय के मार्मिक विचार

1. फिल्म ‘सुकृतम’ का संदर्भ और मरीज का हृदयविदारक एकालाप (Monologue) न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन ने फैसले के समापन अंश में 1994 की राष्ट्रीय और राज्य पुरस्कार विजेता फिल्म ‘सुकृतम’ के एक दृश्य का विशेष उल्लेख किया:

  • फिल्म में ममूटी ने ‘रविशंकर’ नामक एक पत्रकार की भूमिका निभाई थी, जिसे ब्लड कैंसर का पता चलता है। फिल्म मृत्यु की आशंका के साथ उसके संघर्ष और उसके परिजनों पर पड़ने वाले प्रभाव को दर्शाती है।
  • पीठ ने उस दृश्य का स्मरण किया जिसमें रविशंकर अपने डॉक्टर से इलाज कराने से इनकार कर देता है, क्योंकि कैंसर का इलाज मरीज और पूरे परिवार पर असहनीय आर्थिक बोझ डाल देता है:“वह इसके बाद एक हृदयविदारक एकालाप (Heartbreaking Monologue) बोलता है कि कैसे कैंसर के मरीज और उनकी तीमारदारी करने वाले परिजन उचित चिकित्सा देखभाल वहन करने के लिए अपना पूरा जीवन गिरवी रख देते हैं, और अंततः वे केवल कर्ज के पहाड़ों तले दबकर (Buried in Mountains of Debt) रह जाते हैं।”

2. तीन दशकों की तकनीकी प्रगति, परंतु लाचारी जस की तस

  • न्यायाधीश ने आधुनिक स्वास्थ्य प्रणाली की विसंगति पर पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा:“यह अत्यंत व्यथित करने वाला है कि इस कहानी को सिनेमाई भाषा में ढाले जाने और इसे राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर सराहना मिलने के तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी, और तमाम तकनीकी विकास के बावजूद, मरीजों और उनके परिवारों की दुर्दशा आज भी जस की तस बनी हुई है।”

3. समाज को आईना दिखाने में कला और सिनेमा की भूमिका न्यायमूर्ति मेनन ने जनचेतना जगाने में कला के महत्व पर दार्शनिक अवलोकन दर्ज किया:

“कला का उद्देश्य समाज के विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे के करीब लाना और उन्हें दूसरों द्वारा जिए जाने वाले जीवन और संघर्षों के प्रति अधिक संवेदनशील व जागरूक बनाना रहा है, है और हमेशा रहेगा। फिर भी, सामाजिक चिंतन के इतने मजबूत माध्यमों के बावजूद, ऐसे मामलों में हमारा समाज और परिस्थितियां एक ठहराव (Standstill) पर अटकी हुई हैं।”

4. सामूहिक संकल्प का आह्वान: ‘वित्तीय स्थिति से तय न हो जीवन का अधिकार’

  • उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, नीति-निर्माताओं, फार्मा कंपनियों और आम जनता से एकजुट होकर ठोस कदम उठाने का आह्वान किया:
    • समाज में ऐसा तंत्र विकसित होना चाहिए जहां किसी भी व्यक्ति की वित्तीय स्थिति (Financial Condition) यह तय न करे कि उसे जीवन रक्षक इलाज मिलेगा या नहीं।
    • स्वास्थ्य सेवा तंत्र को ऐसा नाजुक संतुलन साधना होगा जहां एक तरफ चिकित्सा उपचार पूरी तरह वहन योग्य (Affordable) बने, और दूसरी तरफ दवा अनुसंधान एवं नवाचार के लिए निर्माताओं को पर्याप्त प्रोत्साहन भी मिलता रहे।

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मामले की मूल पृष्ठभूमि: ₹78,000 प्रति माह की दवा और महिला की मौत

यह भावुक उपसंहार उसी विधिक फैसले का हिस्सा है जिसमें केरल हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को पेटेंट अधिनियम, 1970 की धारा 100 के तहत महंगी स्तन कैंसर दवाओं के लिए हस्तक्षेप करने का सुझाव दिया है:

  • 2022 की मूल जनहित याचिका: यह मामला जून 2022 में स्तन कैंसर से पीड़ित एक महिला द्वारा दायर किया गया था, जिसे नोवार्टिस कंपनी की पेटेंट दवा रिबोसिक्लिब (Ribociclib) की आवश्यकता थी, जिसका मासिक खर्च लगभग ₹78,468.75 था।
  • मरीज की दुखद मौत: याचिका लंबित रहने के दौरान ही सितंबर 2022 में उस महिला मरीज ने दम तोड़ दिया था।
  • स्वतः संज्ञान जनहित याचिका: महिला की मृत्यु के बाद हाईकोर्ट ने 16 सितंबर 2022 को इस मामले को बंद करने के बजाय जनहित में ‘In Re Exorbitant Pricing of Life Saving Patented Medicines’ के रूप में स्वतः संज्ञान लेकर आगे बढ़ाया, ताकि देश के अन्य गरीब व मध्यमवर्गीय मरीजों को पेटेंट दवाओं के अत्यधिक दामों से राहत दिलाने के लिए कानूनी तंत्र तलाशा जा सके।

विधिक एवं मानवीय प्रासंगिकता

  • अनुच्छेद 21 का मानवीय आयाम: उच्च न्यायालय की यह टिप्पणी स्पष्ट करती है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वास्थ्य और जीवन रक्षा का अधिकार केवल एक कागजी प्रावधान नहीं हो सकता। जब जीवन रक्षक दवाएं किसी नागरिक की आर्थिक क्षमता से बाहर हो जाती हैं, तो यह सीधे तौर पर जीने के अधिकार का हनन है।
  • न्यायिक संवेदनशीलता (Judicial Empathy): कानूनी धाराओं (पेटेंट अधिनियम की धारा 100 व 92) की शुष्क तकनीकी व्याख्या के बीच साहित्य और सिनेमा के माध्यम से आम नागरिक की लाचारी को न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनाना यह रेखांकित करता है कि कानून का अंतिम उद्देश्य मानवीय पीड़ा को कम करना है।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: इन रे: जीवन रक्षक पेटेंट दवाओं का अत्यधिक मूल्य निर्धारण [स्वप्रेरणा रिट याचिका (सिविल) – केरल उच्च न्यायालय, एर्नाकुलम]
  • न्यायिक खंडपीठ: न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन (केरल उच्च न्यायालय)
  • अदालती संदर्भ: 1994 की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता मलयालम फिल्म ‘सुकृतम’ (लेखक: एम.टी. वासुदेवन नायर, मुख्य भूमिका: ममूटी)
  • संबद्ध संवैधानिक एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (स्वास्थ्य और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार) सहपठित अनुच्छेद 47 (सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधारने का राज्य का प्राथमिक कर्तव्य)
    • पेटेंट अधिनियम, 1970 की धारा 100 एवं 92 (जीवन रक्षक दवाओं के लिए सरकारी उपयोग एवं अनिवार्य लाइसेंसिंग)
  • अदालत का अंतिम संदेश: किसी भी नागरिक का जीवन इस बात पर निर्भर नहीं होना चाहिए कि उसकी जेब में दवा खरीदने के पैसे हैं या नहीं; सरकार और दवा उद्योग को मिलकर जन स्वास्थ्य को मुनाफे से ऊपर रखना होगा।

Cancer Medicine: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकेरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court)
पीठन्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन
संदर्भित फिल्मसुकृतम (1994, लेखक: एम.टी. वासुदेवन नायर, मुख्य भूमिका: ममूटी)
मुख्य मुद्दाकैंसर के इलाज का अत्यधिक वित्तीय बोझ और जीवनरक्षक पेटेंटेड दवाओं की सामर्थ्य (Affordability)
अदालत का संदेशकला और समाज के माध्यम से जागरूकता के बावजूद जमीनी स्थिति जस की तस; इलाज में धन की कमी बाधा नहीं बननी चाहिए।
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