हाईकोर्ट का रुख और मुख्य कानूनी बिंदु
- हड़ताल/बहिष्कार का कोई असीमित अधिकार नहीं: अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए दोहराया कि वकीलों को हड़ताल करने का कोई सामान्य अधिकार नहीं है। केवल दुर्लभतम मामलों (Rare of Rare Cases) में—जहां बार या बेंच की गरिमा और स्वतंत्रता का प्रश्न हो—अधिकतम 1 दिन का कार्य बहिष्कार किया जा सकता है।
- जज से परामर्श अनिवार्य: ऐसे दुर्लभ 1-दिवसीय बहिष्कार से पहले भी बार एसोसिएशन के अध्यक्ष को संबंधित प्रधान जिला न्यायाधीश या मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करना अनिवार्य है और उनके निर्देशों का पालन करना होता है।
- हिंसा और दबाव पूरी तरह अवैध: पीठ ने स्पष्ट किया:“चाहे परिस्थितियां कितनी भी असाधारण क्यों न हों, किसी भी वकील, पक्षकार या व्यक्ति को अदालत में उपस्थित होने या अपने कानूनी उपचार पाने के लिए धमकाया, रोका या शारीरिक रूप से प्रताड़ित नहीं किया जा सकता।”
अवमानना मामला क्यों खारिज हुआ?
हाईकोर्ट ने वकीलों के दुर्व्यवहार की निंदा तो की, लेकिन अवमानना याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने कारण बताते हुए कहा:
- अवमानना की याचिका व्यक्तिगत भूमिका स्पष्ट किए बिना बार एसोसिएशन के सभी पदाधिकारियों पर सामूहिक रूप से दायर की गई थी।
- मारपीट की घटना के संबंध में अलग से आपराधिक मुकदमा (Criminal Case) पहले से चल रहा है, इसलिए अवमानना अदालत द्वारा समानांतर सुनवाई करना उचित नहीं होगा।
- शिकायतकर्ता वकील अंततः उसी दिन अदालत में प्रवेश कर मजिस्ट्रेट के समक्ष अपनी केस सुनवाई में शामिल होने में सफल रहे थे।
हैदराबाद: तेलंगाना हाईकोर्ट ने वकीलों द्वारा अदालती कामकाज के बहिष्कार (Court Boycott/Strike), अदालतों तक निर्बाध पहुंच और वकीलों के पेशेवर कर्तव्यों के निष्पादन पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत दोहराया है।
न्यायमूर्ति लक्ष्मी नारायण अलीशेट्टी की एकल पीठ ने नामपल्ली मेट्रोपॉलिटन क्रिमिनल कोर्ट बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों के खिलाफ दायर अदालत की अवमानना (Contempt of Court) याचिका पर 21 सितंबर 2026 को विस्तृत आदेश पारित करते हुए यह विधिक अवलोकन दर्ज किया। हालांकि, सामूहिक अवमानना दायित्व के विधिक अभाव और आपराधिक कार्यवाही पहले से लंबित होने के चलते अदालत ने पदाधिकारियों के खिलाफ अवमानना कार्यवाही को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया। उच्च न्यायालय ने दो-टूक व्यवस्था दी है कि बार एसोसिएशन द्वारा घोषित हड़ताल या बहिष्कार किसी भी अधिवक्ता को न्यायालय कक्ष में जाने और अपने मुवक्किल के कानूनी अधिकारों की पैरवी करने से रोक नहीं सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ (Rarest of Rare) असाधारण परिस्थितियों में बुलाई गई एक दिवसीय सांकेतिक हड़ताल के दौरान भी किसी भी वकील, वादकारी या नागरिक को अदालत में जाने पर डराना, धमकाना, रास्ता रोकना (Obstruction) या शारीरिक हमला करना कानूनन अक्षम्य है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं अवलोकन
1. ‘कोर्ट जाने वाले वकील पर जबरदस्ती या शारीरिक हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा’ न्यायमूर्ति लक्ष्मी नारायण अलीशेट्टी ने अदालतों की स्वतंत्रता और विधिक कार्यप्रणाली को रेखांकित करते हुए अपने आदेश में कहा: “भले ही बहिष्कार या विरोध प्रदर्शन को अपवादात्मक परिस्थितियों में आयोजित करने का दावा किया जाए, लेकिन अदालत में उपस्थित होने या अपने विधिक उपचार की पैरवी करने का विकल्प चुनने के लिए किसी भी अधिवक्ता, वादकारी या अन्य व्यक्ति को धमकी (Intimidation), जबरदस्ती (Coercion), बाधा (Obstruction) या शारीरिक क्षति का शिकार नहीं बनाया जाएगा।”
2. वकीलों को हड़ताल का कोई सामान्य अधिकार नहीं; सुप्रीम कोर्ट की कठोर सीमाएं
- उच्च न्यायालय ने दोहराया कि अधिवक्ताओं को अदालती कार्य ठप करने या हड़ताल का आह्वान करने का कोई मौलिक या सामान्य विधिक अधिकार प्राप्त नहीं है।
- किसी भी वकील को हड़ताल में भाग लेने के लिए विवश (Compelled) नहीं किया जा सकता, और जो वकील कोर्ट में पेश होना चाहता है, उसे किसी भी प्रतिकूल परिणाम का सामना नहीं करना पड़ेगा।
- सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित अपवाद की शर्तें:
- हड़ताल की अनुमति केवल बार या बेंच की गरिमा, अखंडता या स्वतंत्रता को प्रत्यक्ष खतरे की स्थिति में “दुर्लभ से दुर्लभतम” मामलों में ही है।
- ऐसी सांकेतिक अनुपस्थिति एक दिन से अधिक नहीं हो सकती।
- इसके लिए बार एसोसिएशन के अध्यक्ष को संबंधित मुख्य न्यायाधीश या प्रधान जिला/सत्र न्यायाधीश से पूर्व परामर्श (Prior Consultation) करना अनिवार्य है और न्यायिक प्राधिकारी के निर्णय का पालन करना होगा।
- अदालत ने पाया कि नामपल्ली बार एसोसिएशन ने इस हड़ताल से पहले मेट्रोपॉलिटन सेशंस जज से कोई औपचारिक परामर्श नहीं किया था।
3. सामूहिक अवमानना (Collective Contempt Liability) का अभाव अवमानना याचिका को खारिज करते हुए पीठ ने स्पष्ट किया:
- अवमानना की कार्यवाही में बिना प्रत्येक व्यक्ति की विशिष्ट भूमिका और संलिप्तता (Specific Act/Role) सिद्ध किए, सामूहिक रूप से पूरी कार्यकारिणी या बार के पदाधिकारियों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
- केवल बार एसोसिएशन में कोई पद (Office-bearer) धारण करने के कारण किसी व्यक्ति पर स्वतः अवमानना की देयता थोपी नहीं जा सकती।
- कथित मारपीट और सीढ़ियों से गिराने का विशिष्ट आरोप केवल प्रतिवादी संख्या 5 (एक व्यक्तिगत अधिवक्ता) के खिलाफ था, न कि पदाधिकारियों के खिलाफ। चूंकि इस विवादित घटना पर पहले से ही नियमित पुलिस जांच और आपराधिक केस चल रहा है, इसलिए अवमानना अदालत के लिए उसी विवादित तथ्य पर समानांतर सुनवाई (Parallel Adjudication) चलाना उचित नहीं है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विवाद
- 16 जून 2025 का एक दिवसीय बहिष्कार:
- नामपल्ली (हैदराबाद) की मेट्रोपॉलिटन क्रिमिनल कोर्ट बार एसोसिएशन ने वकीलों पर कथित हमलों के विरोध में एकजुटता प्रकट करने के लिए एक दिन के कार्य बहिष्कार का प्रस्ताव पारित किया था।
- याचिकाकर्ता अधिवक्ता के आरोप:
- याचिकाकर्ता अधिवक्ता ने बहिष्कार में शामिल होने से इनकार करते हुए अपने मुवक्किल के मामले में पेश होने के लिए अदालत भवन में प्रवेश करने का प्रयास किया।
- आरोप है कि एसोसिएशन के पदाधिकारियों और कुछ सदस्यों ने उन्हें कोर्ट परिसर में प्रवेश करने से रोका।
- महासचिव और अन्य ने कथित रूप से उनसे एडवोकेट बैंड (Advocate’s Band) उतारने और वहां से चले जाने को कहा।
- विवाद बढ़ने पर प्रतिवादी संख्या 5 द्वारा कथित रूप से उन्हें थप्पड़ मारा गया और हाथापाई की गई, जिससे वे सीढ़ियों से नीचे गिर गए और उनके सिर व माथे पर चोटें आईं।
- प्रतिवादियों का रुख: बार पदाधिकारियों ने इन आरोपों को मनगढ़ंत बताया। उन्होंने दावा किया कि अधिवक्ता बाद में उसी दिन अदालत में पेश हुए और मजिस्ट्रेट के समक्ष अपनी सुनवाई पूरी की, तथा किसी अन्य वकील के साथ ऐसी कोई घटना नहीं घटी।
बार पदाधिकारियों को भविष्य के लिए सख्त विधिक हिदायत
अदालत ने यह स्पष्ट किया कि अवमानना याचिका खारिज करने का अर्थ यह कतई नहीं है कि अदालत किसी वकील के साथ मारपीट या धक्का-मुक्की को उचित ठहराती है। उच्च न्यायालय ने सभी बार पदाधिकारियों को सख्त चेतावनी देते हुए कहा:
- भविष्य में किसी भी विरोध प्रदर्शन या हड़ताल के आयोजन के दौरान बार पदाधिकारियों को “अत्यधिक सावधानी, संयम और जिम्मेदारी” (Due Care, Restraint & Responsibility) का परिचय देना होगा।
- कोई भी आह्वान सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक्स-कैप्टन हरीश उप्पल मामले में तय दिशानिर्देशों के अनुरूप होना चाहिए और उससे अदालत तक वादकारियों या वकीलों की पहुंच में कोई बाधा या न्याय प्रशासन में कोई व्यवधान नहीं आना चाहिए।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: शिकायतकर्ता अधिवक्ता बनाम मेट्रोपॉलिटन क्रिमिनल कोर्ट बार एसोसिएशन, नामपल्ली, हैदराबाद के पदाधिकारी व अन्य [अवमानना वाद (Contempt Case) – तेलंगाना उच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) की धारा 2(c) एवं धारा 12 (आपराधिक अवमानना और न्याय प्रशासन में बाधा का दायित्व)
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) — अधिवक्ताओं के पेशेवर कर्तव्य और विशेषाधिकार
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (न्याय तक पहुंच का अधिकार / Access to Justice)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 215 (उच्च न्यायालय का अवमानना क्षेत्राधिकार)
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- एक्स-कैप्टन हरीश उप्पल बनाम भारत संघ (2003, सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ) — ‘अधिवक्ताओं को हड़ताल पर जाने या अदालतों के बहिष्कार का कोई विधिक अधिकार नहीं है; केवल अत्यंत असाधारण स्थितियों में चीफ जस्टिस की पूर्व सहमति से अधिकतम एक दिन का सांकेतिक कार्य विराम लिया जा सकता है; अदालत में आने वाले किसी भी वकील को रोकना पूरी तरह अवैध है।’
- कॉमन कॉज, ए रजिस्टर्ड सोसाइटी बनाम भारत संघ (सुप्रीम कोर्ट) — ‘हड़ताल के कारण मुवक्किल के हितों की बलि नहीं दी जा सकती; वकील न्यायालय के अधिकारी (Officers of the Court) हैं।’
- प्रशांत भूषण व अन्य (अवमानना न्यायशास्त्र) — ‘आपराधिक अवमानना में व्यक्तिगत दायित्व का प्रमाण संदेह से परे होना आवश्यक है; मात्र पद धारण करने से दायित्व उत्पन्न नहीं होता।’
- पीठ: न्यायमूर्ति लक्ष्मी नारायण अलीशेट्टी (तेलंगाना उच्च न्यायालय)
- अंतिम निर्णय: कानूनी सिद्धांतों की पुष्टि के साथ बार पदाधिकारियों के खिलाफ व्यक्तिगत संलिप्तता के अभाव में अवमानना याचिका खारिज; लंबित आपराधिक जांच अपने कानूनी क्रम में जारी रहेगी।
Bar Boycott: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | तेलंगाना उच्च न्यायालय (Telangana High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति लक्ष्मी नारायण अलीशेट्टी (Justice Laxmi Narayana Alishetty) |
| विवाद का कारण | 16 जून 2025 को बार एसोसिएशन के 1-दिवसीय बहिष्कार में शामिल होने से मना करने पर एक वकील से हाथापाई व रुकावट। |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | वकीलों को हड़ताल का कोई मौलिक अधिकार नहीं है; किसी भी वकील पर बहिष्कार का हिस्सा बनने के लिए दबाव या हिंसा नहीं बनाई जा सकती। |
| कोर्ट का आदेश | अवमानना याचिका खारिज (क्योंकि आपराधिक मामला अलग से लंबित था), लेकिन भविष्य के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी। |

