अदालत की मुख्य टिप्पणियां एवं मौखिक सुझाव
- बिजली बिल से जोड़ना:अदालत ने कहा कि यदि लोग चालान का भुगतान नहीं कर रहे हैं, तो बकाया जुर्माने को उनके बिजली बिल (Electricity Bills) में जोड़ दिया जाए। “अगर लोग ट्रैफिक चालान नहीं भर रहे हैं, तो इसे उनके बिजली बिल में जोड़ दें। उन्हें बिजली बिल देना ही होगा, नहीं तो बिजली कनेक्शन काट दिया जाएगा। देश में काम करने के लिए कोई न कोई रास्ता निकालना ही होगा।” — सुप्रीम कोर्ट
- वाहन सेवाओं पर प्रतिबंध (Vehicle-Related Services):जब तक बकाया चालान चुकता न हो जाएं, तब तक वाहन के पंजीकरण प्रमाणपत्र (RC) का नवीनीकरण (Renewal), डुप्लीकेट प्रमाणपत्र जारी करना, और स्वामित्व हस्तांतरण (Ownership Transfer) को रोक दिया जाए।
- परिवहन पोर्टल पर ब्लैकलिस्टिंग:बकाया चालान वाले वाहनों को परिवहन पोर्टल (Parivahan Portal) पर ब्लैकलिस्ट करने, उनका फिटनेस प्रमाणपत्र एवं प्रदूषण नियंत्रण (PUC) प्रमाणपत्र रोकने का सुझाव दिया गया।
- ड्राइविंग लाइसेंस एवं औचक निरीक्षण:बकाया चालान धारकों के ड्राइविंग लाइसेंस के नवीनीकरण पर रोक लगाने या मौजूदा लाइसेंस निलंबित करने की बात कही गई। इसके साथ ही, सड़कों पर वाहनों की रैंडम चेकिंग (Random Checking) करने और चालान न भरने वाले वाहनों को सीधे जब्त (Impound) करने का निर्देश दिया गया।
नई दिल्ली: मोटर वाहन अधिनियम के तहत इलेक्ट्रॉनिक प्रवर्तन तंत्र (Electronic Enforcement Mechanisms), ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर जारी ई-चालान (e-Challans) के भारी बकाये की वसूली और सड़क सुरक्षा के प्रभावी क्रियान्वयन पर देश की शीर्ष अदालत ने कड़ा और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया है।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने वर्ष 2012 से लंबित सड़क सुरक्षा जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान कहा कि अधिकारियों को केवल हजारों और लाखों ई-चालान काटने की औपचारिक कागजी खानापूरी से आगे बढ़कर उन पर अधिरोपित जुर्मानों की वास्तविक वसूली (Recovery of Fines) पर ध्यान केंद्रित करना होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह अभिनव एवं सख्त सुझाव दिया है कि वे अनपेड ट्रैफिक चालानों (Unpaid Traffic Challans) की वसूली को बिजली के बिलों (Electricity Bills) से जोड़ने पर विचार करें, ताकि बिजली कनेक्शन कटने के डर से लोग लंबित जुर्मानों का भुगतान करने को विवश हों।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख मौखिक अवलोकन एवं व्यावहारिक सुझाव
1. ‘बिजली बिल में जोड़ें चालान का बकाया; नहीं भरेंगे तो बिजली कटेगी’ न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला ने भारतीय जमीनी हकीकत का उल्लेख करते हुए अधिकारियों से कहा:
“अधिकारियों के लिए केवल ई-चालान जारी करते रहना पर्याप्त नहीं है। पुलिस हजारों और लाखों ऐसे ई-चालान जारी कर सकती है, परंतु असली सवाल ई-चालान के जरिए लगाए जाने वाले जुर्माने की वास्तविक वसूली का है। यदि लोग ट्रैफिक चालान का भुगतान नहीं कर रहे हैं, तो इसे उनके बिजली के बिल के बकाये में जोड़ दें। वे बिजली का बिल जरूर भरेंगे, अन्यथा उनका बिजली कनेक्शन काट दिया जाएगा। इसका कोई व्यावहारिक रास्ता निकालिए। इस देश में आपको काम कराने का कोई न कोई व्यावहारिक उपाय ढूंढना ही होगा।”
2. ₹45,000 करोड़ का भारी बकाया और वसूली का संकट
- सुनवाई के दौरान अदालत को अवगत कराया गया कि देशभर के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ई-चालान के तहत कुल लगभग ₹45,000 करोड़ का जुर्माना अधिरोपित है, जिसमें से अब तक मात्र ₹25,000 करोड़ की ही वसूली हो सकी है, जबकि लगभग ₹20,000 करोड़ का विशाल राजस्व आज भी फंसा हुआ है।
- अदालत ने कहा कि इस बड़े पैमाने पर बकाये को देखते हुए अधिकारियों को कागजी औपचारिकताओं से बाहर निकलकर “जमीनी हकीकत” (Ground Realities) के अनुरूप प्रवर्तन कार्य करना होगा।
3. रैंडम चेकिंग और ई-चालान न भरने पर वाहन जब्ती (Impounding)
- खंडपीठ ने सड़कों पर औचक जांच (Random Checking) का सुझाव देते हुए कहा:“सड़कों पर वाहनों की रैंडम चेकिंग की जाए और यदि यह पाया जाता है कि किसी वाहन पर लंबे समय से ई-चालान का भुगतान नहीं किया गया है, तो उस वाहन को मौके पर ही जब्त (Impound) करने के लिए आवश्यक विधिक कदम उठाए जाएं।”
बकाया चालानों की वसूली हेतु सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुझाए गए 6 प्रशासनिक उपाय
पीठ ने वाहन संबंधी सार्वजनिक सेवाओं को चालान भुगतान से जोड़ने का एक व्यापक खाका प्रस्तुत किया:
- वाहन पोर्टल पर ब्लैकलिस्टिंग: बकाया ई-चालान वाले वाहनों को सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के ‘परिवहन/वाहन पोर्टल’ (Parivahan Portal) पर तत्काल ब्लैकलिस्ट (Blacklist) किया जाए।
- पंजीकरण और डुप्लीकेट आरसी पर रोक: जब तक सभी पुराने चालानों का निपटारा नहीं हो जाता, तब तक वाहन के पंजीकरण प्रमाण पत्र (RC) का नवीनीकरण, डुप्लीकेट आरसी जारी करना या आरसी में कोई संशोधन पूरी तरह रोक दिया जाए।
- स्वामित्व हस्तांतरण (Ownership Transfer) पर प्रतिबंध: चालान क्लियर न होने तक किसी भी वाहन के स्वामित्व हस्तांतरण (NOC/Transfer of Ownership) को ब्लॉक किया जाए।
- फिटनेस और प्रदूषण (PUC) प्रमाण पत्र पर रोक: बकायेदार वाहनों के लिए फिटनेस प्रमाण पत्र (Fitness Certificate) और प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र (PUC) जारी करने या नवीनीकृत करने से इनकार किया जाए।
- ड्राइविंग लाइसेंस का निलंबन: बार-बार नियमों की अनदेखी करने वाले और चालान न भरने वाले चालकों के ड्राइविंग लाइसेंस (DL) के नवीनीकरण पर रोक लगाई जाए तथा वर्तमान में प्रभावी लाइसेंसों को निलंबित करने के कदम उठाए जाएं।
- बिजली बिल से लिंकिंग: नागरिक सेवाओं और यूटिलिटी बिलों के साथ चालान डेटाबेस को एकीकृत किया जाए ताकि बकायेदार पर भुगतान का प्रत्यक्ष दबाव बने।
14 वर्षों की सुनवाई पर अदालत की नाराजगी: ‘आदेश केवल कागजों पर न रहें’
- न्यायमित्र से स्टेटस चार्ट तलब:
- मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल न्यायालय मित्र (Amicus Curiae) के रूप में अदालत की सहायता कर रहे हैं।
- अदालत ने लगभग 14 वर्षों से लंबित इस याचिका में जारी निर्देशों के जमीनी क्रियान्वयन पर सवाल उठाते हुए तीखी टिप्पणी की:“हम विद्वान न्यायमित्र से जानना चाहते हैं कि जमीनी स्तर पर वास्तविक स्थिति क्या है? क्या हम अनिश्चितकाल तक केवल निर्देश ही जारी करते रहेंगे? यदि ये सभी निर्देश केवल कागजों पर ही सिमटे रहने वाले हैं और अधिकारियों द्वारा लागू नहीं किए जाने हैं, तो किसी दिन हमें ऐसा कठोर कदम (Stern Action) उठाना पड़ेगा जो अधिकारियों को बिल्कुल पसंद नहीं आएगा।”
- अदालत ने न्यायमित्र को एक विस्तृत चार्ट तैयार करने का निर्देश दिया, जिसमें पिछले 14 वर्षों में शीर्ष अदालत द्वारा जारी सभी दिशा-निर्देश, उनके क्रियान्वयन हेतु दी गई समय-सीमा, वर्तमान स्थिति और न्यायमित्र की टिप्पणियां शामिल हों।
मामले की पृष्ठभूमि: सड़क सुरक्षा पर डॉ. राजशेखरन की 2012 की ऐतिहासिक PIL
- मूल याचिकाकर्ता: कोयंबटूर स्थित प्रख्यात ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. एस. राजशेखरन ने वर्ष 2012 में देश में सड़क दुर्घटनाओं, अपर्याप्त ट्रॉमा केयर और खराब बुनियादी ढांचे के कारण होने वाली लाखों मौतों को रोकने के लिए संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत यह जनहित याचिका दायर की थी।
- मोटर वाहन कानून की धारा 136A:
- वर्तमान आवेदन मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 136A (इलेक्ट्रॉनिक निगरानी और प्रवर्तन) तथा केंद्रीय मोटर वाहन नियमावली, 1989 के नियम 167A (स्पीड कैमरे, सीसीटीवी, स्वचालित नंबर प्लेट पहचान – ANPR और ई-चालान) के प्रभावी क्रियान्वयन से संबंधित है।
- पूर्ववर्ती महत्वपूर्ण आदेश:
- अगस्त 2025: सड़क दुर्घटना पीड़ितों को त्वरित मुआवजा वितरण हेतु समर्पित राष्ट्रीय/राज्य पोर्टल स्थापित करने पर विचार।
- अक्टूबर 2025: पैदल यात्रियों (Pedestrian Safety) की सुरक्षा और साइकिल व गैर-मोटर चालित वाहनों के विनियमन हेतु राज्यों को नियम बनाने का निर्देश।
- मई 2026: नियम 125H के तहत सभी सार्वजनिक यात्री वाहनों में लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (VLTD) और आपातकालीन पैनिक बटन अनिवार्य रूप से लगाने तथा उन्हें ‘वाहन’ डेटाबेस से इंटीग्रेट करने का सख्त आदेश।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: डॉ. एस. राजशेखरन बनाम भारत संघ व अन्य [रिट याचिका (सिविल) संख्या 295/2012 – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- न्यायमित्र (Amicus Curiae): वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल
- प्रतिवादी: भारत संघ, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) तथा सभी राज्य/केंद्र शासित प्रदेश
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- मोटर वाहन अधिनियम, 1988 (Motor Vehicles Act, 1988):
- धारा 136A (सड़क सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय राजमार्गों, राजकीय राजमार्गों और शहरी सड़कों पर इलेक्ट्रॉनिक मॉनिटरिंग और प्रवर्तन)
- धारा 19 और 21 (ड्राइविंग लाइसेंस का निलंबन व निरस्तीकरण)
- धारा 53 (मोटर वाहन के पंजीकरण का निलंबन)
- केंद्रीय मोटर वाहन नियमावली, 1989 (CMVR, 1989):
- नियम 167A (इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों द्वारा ट्रैफिक उल्लंघन का पता लगाना और ई-चालान जारी करने की प्रक्रिया)
- नियम 125H (सार्वजनिक सेवा वाहनों में VLTD और पैनिक बटन की अनिवार्यता)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (सड़क सुरक्षा और सुरक्षित आवागमन जीवन के अधिकार का अंग)
- मोटर वाहन अधिनियम, 1988 (Motor Vehicles Act, 1988):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- डॉ. एस. राजशेखरन बनाम भारत संघ (2014 एवं 2018, सुप्रीम कोर्ट) — ‘सड़क सुरक्षा समिति (न्यायमूर्ति राधाकृष्णन समिति) का गठन और दुर्घटनाओं को कम करने के लिए राज्यों को अनिवार्य कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश।’
- एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (यातायात प्रबंधन वाद, सुप्रीम कोर्ट) — ‘सार्वजनिक सड़कों पर अनुशासन बनाए रखने के लिए सख्त प्रवर्तन और तकनीकी निगरानी का उपयोग विधि के शासन का हिस्सा है।’
- पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन (सर्वोच्च न्यायालय)
- अंतिम निर्देश: न्यायमित्र को पिछले 14 वर्षों के निर्देशों पर अनुपालन चार्ट दाखिल करने का आदेश; राज्यों को वसूली हेतु व्यावहारिक रास्ते निकालने और चेकिंग तेज करने का सुझाव।
Unpaid Challan:मामले का मुख्य विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन |
| मुख्य मामला | एस. राजासेकरन बनाम भारत संघ (S Rajaseekaran v. Union of India & Ors.) |
| बकाया राशि | लगभग ₹45,000 करोड़ के ई-चालान में से केवल ₹25,000 करोड़ ही वसूल हो सके हैं। |
| प्रासंगिक कानून | मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 136A एवं केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 का नियम 167A। |

