मुख्य संकेतक और अदालती टिप्पणियां (Key Highlights)
- “भ्रम केवल उनके मन में होगा जो जाति को मन में रखते हैं”:नाम बदलने से भ्रम पैदा होने के तर्क को खारिज करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:“भ्रम केवल उन लोगों के दिमाग में होगा जो अपने दिमाग में जाति के नाम बनाए रखते हैं, लेकिन उन लोगों के मन में कोई भ्रम नहीं होगा जो अपने मन से जाति को पूरी तरह निकाल चुके हैं।”
- खुली अदालत में न बोले जा सकने वाले नाम:हाईकोर्ट ने कहा कि सड़कों और कॉलोनियों के कुछ मौजूदा नाम इतने ज्यादा अपमानजनक (Derogatory) हैं कि उन्हें खुली अदालत में बोला भी नहीं जा सकता। पीठ ने कहा कि यह कदम कई साल पहले ही उठा लिया जाना चाहिए था।
- नए नाम और उदाहरण:राज्य सरकार द्वारा किए गए कुछ प्रमुख बदलावों का उल्लेख किया गया:
- चेंगलपट्टू में हरिजन कॉलोनी $\rightarrow$ तिरुवल्लुवर स्ट्रीट
- नमक्कल में अरुंथथियार थेरू $\rightarrow$ कामराजर नगर
- तिरुवन्नामलाई में इरुलर कॉलोनी $\rightarrow$ कबिलर थेरू
- रानीपेट में नारीकुरवर कॉलोनी $\rightarrow$ पेरारिग्नार अन्ना थेरू
- वेल्लोर में आदि द्रविड़ कॉलोनी $\rightarrow$ कंबर स्ट्रीट
- तिरुनेलवेली में स्वीपर कॉलोनी $\rightarrow$ भारतीदासन स्ट्रीट
- 1978 के आदेश का हवाला:राज्य सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि तमिलनाडु में सड़कों से जातिसूचक नाम हटाने की शुरुआत 1978 में ही जी.ओ. जारी करके कर दी गई थी। इस कदम का उद्देश्य समानता को बढ़ावा देना और सामाजिक समावेशिता सुनिश्चित करना है।
चेन्नई: जातिविहीन समाज के निर्माण, सार्वजनिक स्थानों के धर्मनिरपेक्ष व समावेशी स्वरूप और सामाजिक समानता को बढ़ावा देने की दिशा में मद्रास हाईकोर्ट ने एक युगांतरकारी फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति सी.वी. कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति आर. शक्तिवेल की खंडपीठ ने 2025 के सरकारी आदेश (Government Order – GO) को चुनौती देने वाली जनहित याचिका को खारिज करते हुए पूर्व में दिए गए अंतरिम स्थगन (Interim Stay) को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जातिगत नामों को हटाने से उत्पन्न कोई भी भ्रम केवल अस्थायी होगा और समाज को जातिगत संकीर्णताओं से मुक्त करने के लिए यह कदम कई दशक पहले ही उठाया जाना चाहिए था। उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार के उस नीतिगत फैसले की संवैधानिक व प्रशासनिक वैधता को बरकरार रखा है, जिसके तहत राज्य भर में सड़कों, बस्तियों, आवासीय कॉलोनियों और जल निकायों से जातिगत और अपमानजनक नामों (Caste-based and Derogatory Names) को हटाकर उनका पुनर्नामकरण (Renaming) समाज सुधारकों, प्रख्यात हस्तियों और तमिल साहित्यकारों के नाम पर किया जा रहा है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘जातिसूचक नामों का विस्मृति में विलीन होना अनिवार्य’
न्यायमूर्ति सी.वी. कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति आर. शक्तिवेल की खंडपीठ ने अपने फैसले में जातिगत पहचान के उन्मूलन पर बल देते हुए कहा:
“जातिसूचक नामों को अंततः विस्मृति के गर्त में विलीन (Disappear into oblivion) हो जाना चाहिए।
सड़कों और आवासीय कॉलोनियों से जातिगत नाम हटाने से होने वाला कोई भी भ्रम केवल अस्थायी होगा। भ्रम केवल उनके मन में पैदा होगा जो अपने दिमाग में जाति के नाम को संजोकर रखते हैं; परंतु उन व्यक्तियों के मन में कोई भ्रम नहीं होगा जो अपने दिमाग से ही जाति की भावना को निकाल चुके हैं।“
2. ‘कुछ नाम इतने अपमानजनक हैं कि खुली अदालत में बोले भी नहीं जा सकते’
- खंडपीठ ने राज्य में प्रचलित कुछ ऐतिहासिक जातिसूचक मोहल्लों के नामों पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया:“मौजूदा समय में उपयोग किए जा रहे कुछ जातिगत नाम इतने अधिक अपमानजनक और हेय (Derogatory) हैं कि उन्हें खुली अदालत (Open Court) में उच्चारित तक नहीं किया जा सकता। यह कदम तो कई वर्ष पहले ही उठाया जाना चाहिए था।”
- अदालत ने राज्य सरकार से आह्वान किया कि वह इस अभियान को यहीं न रोके, बल्कि उन बचे हुए सार्वजनिक स्थानों की भी पहचान करे जो पहली सूची में छूट गए हैं और उनके पुनर्नामकरण के लिए एक नया सरकारी आदेश जारी करे।
3. 21 दिन की आपत्ति अवधि को ठहराया वैध:
- याचिकाकर्ता द्वारा आम जनता से आपत्तियां मांगने के लिए केवल 21 दिनों का समय दिए जाने की प्रक्रियात्मक चुनौती को खारिज करते हुए पीठ ने कहा कि किसी भी प्रशासनिक सुधार प्रक्रिया के लिए एक निश्चित समय-सीमा तय करना अपरिहार्य है और 21 दिन की अवधि पूरी तरह पर्याप्त और वैध है।
क्या था विवादित सरकारी आदेश (GO) और उसका उद्देश्य?
- नगर प्रशासन एवं जल आपूर्ति विभाग का आदेश:
- तमिलनाडु सरकार के नगर प्रशासन एवं जल आपूर्ति विभाग ने वर्ष 2025 में एक व्यापक सरकारी आदेश (GO) जारी किया था।
- इसका उद्देश्य उन सभी आवासीय क्षेत्रों, सड़कों, गलियों और जल निकायों की पहचान करना था जिनके नाम किसी विशिष्ट जाति, उपजाति या अपमानजनक शब्दावली पर आधारित थे, और उन्हें बदलकर समाज सेवा, कला, साहित्य और राष्ट्र निर्माण में योगदान देने वाले महापुरुषों के नाम पर रखना था।
- 1978 की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- राज्य सरकार ने अदालत को अवगत कराया कि यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है; तमिलनाडु ने वर्ष 1978 (पेरियार ई.वी. रामासामी के आत्म-सम्मान आंदोलन की वैचारिक विरासत के तहत) में ही राज्य की सड़कों और परिवहन निगमों से जातिसूचक नाम हटाने का ऐतिहासिक सरकारी आदेश जारी किया था। वर्तमान आदेश उसी समावेशी नीति का विस्तार है।
बदले गए प्रमुख जातिगत नामों की सूची (अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार)
| पूर्ववर्ती जातिसूचक/आपत्तिजनक नाम | नया समावेशी/प्रेरक नाम | जिला/क्षेत्र |
| हरिजन कॉलोनी (Harijan Colony) | तिरुवल्लुवर स्ट्रीट (Thiruvalluvar Street) | चेंगलपट्टू |
| अरुंथथियार थेरु (Arunthathiyar Theru) | कामराजार नगर (Kamarajar Nagar) | नमक्कल |
| इरुलर कॉलोनी (Irular Colony) | कबिलर थेरु (Kabilar Theru) | तिरुवन्नामलाई |
| नरिकुरवर कॉलोनी (Narikuravar Colony) | पेरारिग्नार अन्ना थेरु (Perarignar Anna Theru) | रानीपेट |
| आदि द्रविड़ कॉलोनी (Adi Dravidar Colony) | कम्बार स्ट्रीट (Kambar Street) | वेल्लोर |
| स्वीपर कॉलोनी (Sweeper Colony) | भारतीदासन स्ट्रीट (Bharathidasan Street) | तिरुनेल्वली |
| अरुंथथियार कुदियिरुप्पु | अव्वैयार कुदियिरुप्पु (Avvaiyar Kudiyiruppu) | कांचीपुरम |
अदालत ने पाया कि नए चुने गए सभी नाम या तो पूरी तरह तटस्थ हैं या फिर उन ऐतिहासिक विभूतियों, संतों और कवियों के हैं जिन्होंने सार्वजनिक जीवन में अनुकरणीय योगदान दिया है।
याचिकाकर्ता की आपत्तियां और सरकार का पक्ष
- याचिकाकर्ता (एस. परमासिवम) की दलीलें:
- याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जी. कार्तिकेयन ने तर्क दिया कि यह कदम आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक लाभ लेने के उद्देश्य से उठाया गया है और इससे सामाजिक सौहार्द बिगड़ सकता है।
- उन्होंने दलील दी कि यदि नाम बदलने ही हैं तो केवल नयनमार, अलवार, सिद्धार या तमिल साहित्यकारों के नाम पर ही सहमति से रखे जाने चाहिए थे।
- राज्य सरकार का बचाव:
- महाधिवक्ता (Advocate General) विजय नारायण और सरकारी वकील एम.पी. सेंथिल ने सरकार का बचाव करते हुए कहा कि यह पहल संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 17 के अनुरूप है। इसका एकमात्र उद्देश्य जातिगत भेदभाव को समाप्त करना, छुआछूत की सूक्ष्म स्मृतियों को मिटाना और सार्वजनिक स्थानों को समावेशी व तटस्थ बनाना है।
विधिक एवं संवैधानिक सिद्धांत
- अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का अंत) एवं अनुच्छेद 15 (जातिगत भेदभाव का निषेध):
- सार्वजनिक स्थानों (सड़कों, कुओं, कॉलोनियों) को जाति के आधार पर चिन्हित करना नागरिकों को एक अलग जातिगत पहचान में बांटने और ऐतिहासिक अस्पृश्यता की यादों को जीवित रखने का कार्य करता है।
- राज्य का यह सकारात्मक दायित्व है कि वह सार्वजनिक अवसंरचना से ऐसे प्रतीकों को हटाए जो नागरिकों की मानवीय गरिमा (Dignity) को ठेस पहुंचाते हैं।
- अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार):
- किसी नागरिक को ऐसी बस्ती या सड़क पर रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता जिसका नाम उसकी जाति को उजागर करता हो या जो अपमानजनक सामाजिक रूढ़ियों को बढ़ावा देता हो।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: एस. परमासिवम बनाम तमिलनाडु राज्य व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – मद्रास उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ]
- पीठ: न्यायमूर्ति सी.वी. कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति आर. शक्तिवेल (खंडपीठ)
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता जी. कार्तिकेयन (साथ में अधिवक्ता एम. कार्तिकेय वेंकिटाचालापति)
- तमिलनाडु राज्य की ओर से: महाधिवक्ता (Advocate General) विजय नारायण एवं सरकारी वकील (GP) एम.पी. सेंथिल
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- तमिलनाडु नगर प्रशासन एवं जल आपूर्ति विभाग जीओ (2025)
- तमिलनाडु जिला नगरपालिका अधिनियम एवं नगर निगम अधिनियम
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता)
- अनुच्छेद 15 (धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध)
- अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का उन्मूलन)
- अनुच्छेद 21 (मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (सुप्रीम कोर्ट) — ‘व्यक्तिगत गरिमा और जातिगत कलंक से मुक्ति संविधान के भाग III का अभिन्न अंग है।’
- तमिलनाडु राज्य 1978 नीतिगत दिशानिर्देश — ‘सार्वजनिक परिवहन और सार्वजनिक मार्गों से जातिगत उपाधियों का उन्मूलन।’
- अंतिम निर्णय: रिट याचिका पूरी तरह खारिज; पूर्व में जारी अंतरिम स्थगन आदेश निरस्त; राज्य सरकार को शेष बचे जातिसूचक स्थानों की पहचान कर उनके पुनर्नामकरण हेतु अतिरिक्त आदेश जारी करने का आह्वान।
Cast Wise Street: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति सी.वी. कार्तिकेयन एवं न्यायमूर्ति आर. शक्तिवेल |
| मुख्य मुद्दा | जातियों/अपमानजनक शब्दों से जुड़ी सड़कों और कॉलोनियों के नाम बदलने सम्बन्धी 2025 के सरकारी आदेश (G.O.) की वैधता |
| अदालत का रुख | याचिका खारिज, सरकार का कदम सही ठहराया और छूटी हुई जगहों के नाम भी बदलने का निर्देश दिया। |
| अंतरिम रोक | कोर्ट ने नाम बदलने की प्रक्रिया पर लगी अंतरिम रोक (Interim Stay) को हटा दिया। |

