मुख्य संकेतक और अदालती सुनवाई के बिंदु (Key Highlights)
- ‘एकतरफा मेंशनिंग’ और लिस्टिंग पर अदालत की नाराजगी:याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा कि सार्वजनिक रूप से अधिसूचित केस को इस तरह बोर्ड से नहीं हटाया जा सकता। इस पर पीठ ने टिप्पणी की:“उन्हें (याचिकाकर्ताओं को) सूचित किया जाना चाहिए था। वे हैरान रह गए क्योंकि उन्हें बताया नहीं गया था… यदि रजिस्ट्री ने मामला नहीं रखा था, तो उन्हें स्पष्टीकरण देना चाहिए था कि फाइल मुख्य न्यायाधीश के पास है।”
- सरकारी वकीलों की अनशर्त माफी:ASG ऐश्वर्या भाटी ने स्वीकार किया कि उनसे चूक हुई:“मैंने मेंशन किया था… यह मेरी गलती है, मैं माफी मांगती हूं।”सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी कोर्ट से माफी मांगते हुए कहा कि अवमानना याचिका और नए कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को अलग करके नहीं देखा जा सकता, दोनों की सुनवाई एक साथ होनी चाहिए।
- मामले की पृष्ठभूमि (CAPF vs IPS प्रतिनियुक्ति):
- मई 2025 का फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने CAPF को ‘ऑर्गनाइज्ड ग्रुप A सर्विस’ (OGAS) का दर्जा दिया था और सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड (SAG) तक IPS अधिकारियों के डेपुटेशन को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने का आदेश दिया था।
- अवमानना याचिका: मई 2025 के आदेश के बावजूद गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा 46 और IPS अधिकारियों को CAPF में नियुक्त करने के खिलाफ गृह सचिव गोविंद मोहन के खिलाफ अवमानना याचिका दायर की गई।
- CAPF अधिनियम, 2026: सरकार ने संसद से नया कानून पास कर IG, ADG और DG स्तर पर IPS अफसरों के लिए उच्च कोटा (50% से 100%) वैधानिक रूप से तय कर दिया, जिसे एक अलग याचिका में चुनौती दी गई है।
- रजिस्ट्री की रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में रखी गई:अदालत ने निर्देश दिया कि लिस्टिंग में हुई गड़बड़ी को लेकर रजिस्ट्री द्वारा दिया गया लिखित स्पष्टीकरण सीलबंद लिफाफे (Sealed Cover) में रखा जाए।
नई दिल्ली: केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs – BSF, CRPF, CISF, ITBP, SSB) में भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति, अवमानना याचिका की अचानक डी-लिस्टिंग (De-listing) और सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक कॉज लिस्ट के संचालन पर शीर्ष अदालत में बुधवार को तीखी कानूनी बहस देखने को मिली।
इस मामले में केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी और सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने अदालत के समक्ष अपनी प्रक्रियात्मक चूक स्वीकार करते हुए औपचारिक रूप से माफी (Apologised) मांगी। अदालत ने रजिस्ट्री द्वारा पेश स्पष्टीकरण रिपोर्ट को सीलबंद लिफाफे (Sealed Cover) में सुरक्षित रखने का निर्देश देते हुए अवमानना याचिका और नए सीएपीएफ अधिनियम, 2026 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं की संयुक्त सुनवाई 15 अक्टूबर 2026 को दोपहर 2:00 बजे तय की है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत द्वारा गठित न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की विशेष पीठ ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि केंद्र सरकार के कानून अधिकारी द्वारा याचिकाकर्ताओं को पूर्व सूचना दिए बिना सीजेआई के समक्ष एकतरफा (Ex-parte) मेंशनिंग की गई, और मामले को नियमित पीठ से हटाकर विशेष पीठ में भेजने से पहले संबंधित पीठ को सूचित तक नहीं किया गया।
अदालत कक्ष में तीखी बहस: संस्थागत विश्वसनीयता और कॉज लिस्ट की शुचिता पर सवाल
1. ‘एक बार कॉज लिस्ट जारी होने के बाद कोई उससे छेड़छाड़ नहीं कर सकता’: वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान सुनवाई शुरू होते ही याचिकाकर्ताओं (सीएपीएफ कैडर अधिकारियों) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने मामले को विशेष पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने की पूरी प्रक्रिया पर कड़ा एतराज जताया:
*”आप किसी सूचीबद्ध मामले को इस तरह बोर्ड से खींचकर बाहर नहीं निकाल सकते (Plucked off the board)। यह पूरे देश की अदालत है। देश भर से वादकारी यात्रा की व्यवस्था करके यहां आते हैं। जब एक बार कॉज लिस्ट अधिसूचित हो जाती है और दिन की कार्यवाही शुरू हो चुकी होती है, तो उसके बाद उसमें कोई भी छेड़छाड़ (Fiddle) नहीं कर सकता।
हमारे पीछे (Behind our back) एकतरफा मेंशनिंग कैसे की जा सकती है? यह अदालत की संस्थागत विश्वसनीयता (Institutional Credibility) का गंभीर प्रश्न है। जब हम सुनवाई का इंतजार कर रहे थे, तभी मामला अचानक लंच ब्रेक में कॉज लिस्ट से गायब कर दिया गया और हमें अंधेरे में छोड़ दिया गया!”*
वरिष्ठ अधिवक्ता गुरु कृष्ण कुमार ने भी इसका समर्थन करते हुए कहा कि 22 सितंबर को जब अवमानना याचिका पर सुनवाई हुई थी, तब केंद्र ने दोनों मामलों को एक साथ क्लब करने की कोई औपचारिक प्रार्थना नहीं की थी।
2. विशेष पीठ के जजों का अवलोकन: ‘हमें भी रात 9 बजे पता चला’
- न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा ने खुलासा किया कि स्वयं न्यायाधीशों को भी इस विशेष पीठ के गठन की जानकारी मंगलवार रात लगभग 9:00 बजे दी गई थी।
- पीठ ने रजिस्ट्री की उस व्याख्या पर भी असंतोष जताया जिसमें कहा गया था कि केंद्र सरकार के वकील द्वारा सीजेआई के समक्ष मेंशनिंग के बाद सीजेआई के मौखिक निर्देश पर मामले को विशेष पीठ में स्थानांतरित किया गया। पीठ ने कहा कि रजिस्ट्री को यह बात दोपहर 2 बजे न्यायमूर्ति भुइयां की पीठ को स्पष्ट रूप से बतानी चाहिए थी कि फाइल सीजेआई के पास है।
केंद्र सरकार के विधि अधिकारियों की स्वीकारोक्ति और माफी
सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने स्वीकार किया कि उन्होंने ही सीजेआई के समक्ष मेंशनिंग की थी:
ASG ऐश्वर्या भाटी: “मेंशनिंग मेरे द्वारा की गई थी। 22 सितंबर को जब अवमानना याचिका सुनी जा रही थी, तब हमारा मुख्य बचाव ‘केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026’ था। चूंकि उस कानून की वैधता को चुनौती देने वाली रिट याचिकाएं न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ के समक्ष लंबित थीं, इसलिए मैंने दोनों बैचों को एक साथ सुनने की प्रार्थना सीजेआई से की थी। मैं बिना दूसरे पक्ष को सूचित किए मेंशनिंग करने के लिए माफी मांगती हूं। यह मेरी भूल थी (I apologise. It is my mistake)।“
न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा: “उन्हें अंधेरे में रखा गया क्योंकि उन्हें पहले से कोई सूचना नहीं दी गई थी। औचित्य (Propriety) की मांग यही थी कि जब आपका बचाव नया कानून है, तो दोनों मामले एक साथ सुने जाएं, परंतु आपको याचिकाकर्ताओं को सूचित करना चाहिए था। उनका यह सोचना स्वाभाविक है कि न्यायिक आदेश का उल्लंघन हुआ है।”
इसके बाद सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी पीठ के समक्ष खेद व्यक्त किया:
“मैं भी इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूं। परंतु वास्तविकता यह है कि अवमानना की कार्यवाही को नए कानून की वैधता से जुड़ी रिट याचिकाओं से अलग नहीं किया जा सकता। दोनों मामलों को एक साथ सुना जाना ही न्यायसंगत होगा। हम दोनों मामलों में अपने हलफनामे दाखिल करेंगे।”
कानूनी विवाद की धुरी: अवमानना बनाम सीएपीएफ अधिनियम, 2026
- याचिकाकर्ताओं का तर्क (कानून से स्वतंत्र निर्देश):
- वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने दलील दी कि अवमानना याचिका को रिट याचिकाओं के साथ उलझाकर टाला नहीं जाना चाहिए।
- उन्होंने कहा कि 23 मई 2025 के निर्णय (संजय प्रकाश केस) में दिए गए कई निर्देश—जैसे 6 महीने के भीतर कैडर रिव्यू पूरा करना और चरणबद्ध तरीके से आईपीएस प्रतिनियुक्ति को कम करना—समयबद्ध थे और उनका नए 2026 के अधिनियम से कोई लेना-देना नहीं है।
- अधिवक्ता गुरु कृष्ण कुमार ने आरोप लगाया कि 22 सितंबर के बाद भी तीन और आईपीएस अधिकारियों को सीएपीएफ में प्रतिनियुक्त कर दिया गया, जिसे तत्काल रोका जाना चाहिए।
- केंद्र और प्रतिवादियों का रुख:
- वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि संसद द्वारा पारित केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026 स्पष्ट रूप से डीआईजी, आईजी और एडीजी स्तर पर आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति का कोटा वैधानिक रूप से तय करता है। इसलिए जब तक इस कानून के प्रभाव का परीक्षण नहीं होता, तब तक अवमानना का कोई सीधा मामला नहीं बनता।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
विशेष खंडपीठ ने दोनों मामलों को एक साथ जोड़ते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- 15 अक्टूबर को सुनवाई: अवमानना याचिका और सीएपीएफ अधिनियम, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को 15 अक्टूबर 2026 को दोपहर 02:00 बजे एक साथ अंतिम प्रारंभिक सुनवाई हेतु सूचीबद्ध किया जाए।
- कानून से स्वतंत्र निर्देशों का परीक्षण: अदालत 15 अक्टूबर को प्राथमिक रूप से यह परीक्षण करेगी कि क्या 2025 के फैसले में ऐसे निर्देश थे जो नए कानून से अप्रभावित हैं और क्या उनका अनुपालन किया गया है।
- रजिस्ट्री रिपोर्ट सीलबंद: 29 सितंबर को केस हटाए जाने के संबंध में रजिस्ट्री द्वारा प्रस्तुत विस्तृत रिपोर्ट और स्पष्टीकरण नोट को न्यायालय के रिकॉर्ड में सीलबंद लिफाफे (Sealed Cover) में सुरक्षित रखा जाएगा।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: महेंद्र सिंह देव बनाम गोविंद मोहन (केंद्रीय गृह सचिव) [अवमानना याचिका (सिविल) संख्या 112/2026 सहपठित संबद्ध रिट याचिकाएं – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- विशेष खंडपीठ: न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं (सीएपीएफ अधिकारियों) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान, वरिष्ठ अधिवक्ता गुरु कृष्ण कुमार
- भारत संघ / गृह मंत्रालय की ओर से: सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी, वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(b) एवं 12
- केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026 (CAPF Act, 2026 – वैधानिक प्रतिनियुक्ति कोटा)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 129, 141, 142 एवं 145 (सुप्रीम कोर्ट नियम, कॉज लिस्ट निर्धारण एवं रोस्टर का मास्टर होने का सीजेआई का विशेषाधिकार)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- संजय प्रकाश बनाम भारत संघ (23 मई 2025, सुप्रीम कोर्ट) — ‘सीएपीएफ बलों को ओजीएएस (OGAS) घोषित करते हुए कैडर अधिकारियों के पदोन्नति अधिकारों की रक्षा का निर्देश।’
- स्टेट ऑफ राजस्थान बनाम प्रकाश चंद (1998, सुप्रीम कोर्ट) — ‘मुख्य न्यायाधीश रोस्टर के मास्टर (Master of Roster) हैं, परंतु मुकदमों के स्थानांतरण में प्रक्रियात्मक पारदर्शिता और निष्पक्षता अनिवार्य है।’
- वर्तमान स्थिति: मामले की सुनवाई 15 अक्टूबर 2026 को दोपहर 2:00 बजे विशेष पीठ के समक्ष नियत।
Case Listing:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| विशेष पीठ | न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा एवं न्यायमूर्ति उज्ज्वल भूयान |
| मुख्य विवाद | CAPF कैडर में IPS प्रतिनियुक्ति खत्म करने के मई 2025 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन और नए कानून ‘CAPF Act, 2026’ की वैधानिकता। |
| विवादित प्रक्रिया | 29 सितंबर को जस्टिस भूयान की पीठ के कॉज लिस्ट से बिना बताए केस हटाना और CJI के समक्ष एकतरफा मेंशनिंग (Ex-parte Mentioning) करना। |
| अगली सुनवाई की तिथि | 15 अक्टूबर 2026 (अपराह्न 2:00 बजे) |

