मुख्य संकेतक (Key Highlights)
- आपसी सहमति न बनने पर टिप्पणी:अदालत को जब यह सूचित किया गया कि हाईकोर्ट के समक्ष हिंदू पक्षकारों के बीच प्रतिनिधि वकील/मुख्य वादी चुनने को लेकर अब तक कोई आपसी सहमति या समझौता नहीं हो सका है, तब पीठ ने कहा:“हमें आप सभी को विस्तार से सुनना होगा। यह मामला इस मायने में मनहूस (Jinxed) लग रहा है कि यह तारीख दर तारीख सिर्फ स्थगित ही होता जा रहा है…”
- गुण-दोष (Merits) पर सुनवाई का फैसला:जब यह स्पष्ट हो गया कि हिंदू पक्षकारों के आंतरिक मतभेद सुलझ नहीं रहे हैं, तो कोर्ट ने कहा कि वह इस मामले की सुनवाई गुण-दोष के आधार पर करेगा। हालांकि, समय की कमी के कारण मामले को टालना पड़ा।
- मामले की कानूनी पृष्ठभूमि:
- सितंबर 2020: मथुरा सिविल कोर्ट ने पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 (Places of Worship Act, 1991) का हवाला देते हुए मूल मुकदमे को खारिज कर दिया था।
- मई 2022: मथुरा जिला अदालत ने अपीलीय स्तर पर फैसला पलटते हुए माना कि मुकदमा सुनवाई योग्य (Maintainable) है।
- 2023: मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया, जहां सभी मूल मुकदमों को एक साथ जोड़ा गया।
नई दिल्ली: मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद के ऐतिहासिक भूमि विवाद से जुड़े मुकदमों में वादी हिंदू पक्षों के आपसी समन्वय के अभाव, मुख्य प्रतिनिधि वादी (Lead Plaintiff) तय करने में विफलता और बार-बार अदालती सुनवाई टलने (Repeated Adjournments) पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी निराशा जताई है।
न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा की खंडपीठ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसके द्वारा उच्च न्यायालय ने एक विशिष्ट हिंदू पक्ष को भगवान श्रीकृष्ण के सभी भक्तों की ओर से आधिकारिक व मुख्य प्रतिनिधि (Representative Party) के रूप में नामित किया था। सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि इस मामले पर मानो कोई साया हो या यह अभिशप्त (Jinxed) हो, क्योंकि तारीख-दर-तारीख मिलने के बावजूद यह कार्यवाही आगे ही नहीं बढ़ पा रही है।
पीठ के समक्ष जब यह तथ्य आया कि विभिन्न वादियों के बीच सौहार्दपूर्ण समझौते और समन्वय की पूर्व संभावनाओं के बावजूद हिंदू पक्षकारों के मध्य अब तक कोई सहमति नहीं बन पाई है, तो अदालत ने टिप्पणी की कि अब वह सभी पक्षों को उनके गुण-दोष (Merits) पर सुनेगी। हालांकि, बुधवार को समय की कमी (Paucity of Time) के कारण मामले की सुनवाई पूरी नहीं हो सकी और अदालत ने इसे 6 नवंबर 2026 तक के लिए स्थगित कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख मौखिक अवलोकन एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘यह मामला ऐसा है जैसे इस पर किसी का साया हो (Jinxed)’
जब पीठ को सूचित किया गया कि हिंदू पक्षों के आंतरिक मतभेदों के चलते साझा समझ नहीं बन सकी है, तो न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा की पीठ ने टिप्पणी की:
“हमें आप सभी को विस्तार से सुनना होगा। इस अर्थ में यह मामला मानो अभिशप्त (Jinxed) है। यह बस एक के बाद एक अगली तारीख पर टलता ही जा रहा है… (Getting adjourned from date after date…)”
2. आंतरिक विवाद सुलझाने में विफलता
- पूर्व की सुनवाइयों में पक्षकारों ने शीर्ष अदालत को संकेत दिया था कि उच्च न्यायालय में दायर विभिन्न मूल दीवानी मुकदमों के वादी आपस में बैठकर हिंदू पक्ष के नेतृत्व और प्रतिनिधित्व को लेकर आम सहमति बना लेंगे।
- बुधवार को अदालत को अवगत कराया गया कि कोई अंतिम सहमति नहीं बन सकी है, जिसके बाद अदालत ने स्पष्ट किया कि वह प्रतिनिधित्व के विधिक पहलू पर सभी पक्षकारों को विस्तार से सुनेगी।
विवाद का विधिक संदर्भ: ‘प्रतिनिधि वाद’ (Representative Suit) पर विवाद
- इलाहाबाद हाईकोर्ट का आक्षेपित आदेश:
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मथुरा से स्थानांतरित होकर आए दर्जनों वादों को समेकित (Consolidate) करते हुए नागरिक प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश 1 नियम 8 (Order I Rule 8) के तहत एक हिंदू वादी को भगवान श्रीकृष्ण के सभी भक्तों का प्रतिनिधित्व करने वाला मुख्य वादी नामित किया था।
- सुप्रीम कोर्ट में चुनौती:
- अन्य हिंदू वादियों और संगठनों ने उच्च न्यायालय के इस आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में यह कहते हुए चुनौती दी कि किसी एक पक्षकार को सभी भक्तों का एकाधिकारवादी प्रतिनिधि नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि प्रत्येक वादी के वादपत्र (Plaint) में मांगे गए उपचार, ऐतिहासिक साक्ष्य और प्रार्थनाएं विशिष्ट हैं।
कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद की ऐतिहासिक व कानूनी यात्रा
- सिविल कोर्ट में मूल वाद (सितंबर 2020):
- मूल दीवानी मुकदमा ‘भगवान श्री कृष्ण विराजमान’ (Hindu Deity) और भक्तों की ओर से सिविल जज (सीनियर डिवीजन), मथुरा के समक्ष दायर किया गया था।
- इसमें दावा किया गया कि 13.37 एकड़ में फैले कटरा केशव देव परिसर में शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण भगवान कृष्ण के जन्मस्थान (गर्भगृह) पर मंदिर तोड़कर किया गया था, अतः मस्जिद को हटाकर जमीन का कब्जा मंदिर ट्रस्ट को सौंपा जाए।
- सितंबर 2020 में खारिज: सिविल जज ने पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 [Places of Worship Act, 1991] की धारा 4 के अवरोध का हवाला देते हुए मुकदमे को शुरुआत में ही खारिज कर दिया था।
- मथुरा जिला अदालत का फैसला (मई 2022):
- जिला न्यायाधीश की अदालत ने सिविल कोर्ट के आदेश को पलट दिया और व्यवस्था दी कि एक देवता (Deity) और भक्तों द्वारा दायर वाद पोषणीय (Maintainable) है और इसे पूजा स्थल कानून के तहत प्रारंभिक स्तर पर खारिज नहीं किया जा सकता।
- इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्थानांतरण (मई 2023):
- राष्ट्रीय महत्व और सार्वजनिक हित को देखते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सीपीसी की धारा 24 के तहत मथुरा जिला न्यायालय से इस विवाद से जुड़े सभी दीवानी मुकदमों को सीधे अपने पास स्थानांतरित कर लिया।
- कोर्ट कमिश्नर सर्वे का विवाद:
- वादियों ने दावा किया था कि मस्जिद की संरचना में कमल के फूल, ॐ और प्राचीन हिंदू मंदिर के कई वास्तुशिल्प संकेत मौजूद हैं, जिसके आधार पर हाईकोर्ट ने एडवोकेट कमिश्नर सर्वे का आदेश दिया था (जिस पर बाद में शीर्ष अदालत ने अंतरिम रोक लगाई थी)।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: भगवान श्री कृष्ण विराजमान व अन्य बनाम प्रबंध समिति शाही मस्जिद ईदगाह व अन्य [विशेष अनुमति याचिका (सिविल) – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा (सर्वोच्च न्यायालय)
- आदेश की तिथि: 30 सितंबर 2026
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC):
- आदेश I नियम 8 (समान हित वाले व्यक्तियों की ओर से प्रतिनिधि वाद / Representative Suit)
- धारा 24 (मुकदमों के स्थानांतरण की उच्च न्यायालय की शक्ति)
- आदेश VII नियम 11 (वादपत्र की पोषणीयता और खारिज करने के आधार)
- पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 [Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991] की धारा 3 एवं 4
- विशिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 (घोषणात्मक डिक्री और कब्जे का दावा)
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- एम. सिद्दीक बनाम सुरेश दास (अयोध्या विवाद, 2019, सुप्रीम कोर्ट 5-जज बेंच) — ‘मूर्ति/देवता एक विधिक व्यक्ति (Juristic Person) है जिसके पास संपत्ति धारण करने और अपने सेवादार/भक्त (Next Friend) के माध्यम से मुकदमा दायर करने का विधिक अधिकार है।’
- कमेटी ऑफ मैनेजमेंट अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद बनाम राखी सिंह (ज्ञानवापी विवाद, सुप्रीम कोर्ट) — ‘पूजा स्थल कानून 1991 के तहत धार्मिक चरित्र का निर्धारण साक्ष्यों के विचारण का विषय है।’
- वर्तमान स्थिति: समय की कमी के कारण सुनवाई स्थगित; मामले की अगली विस्तृत सुनवाई 6 नवंबर 2026 को नियत।
Krishna JanamBhoomi: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति संजय कुमार एवं न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा |
| मुख्य विवाद | इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा एक हिंदू पक्षकार को सभी भक्तों का प्रतिनिधि नियुक्त करने के आदेश के खिलाफ याचिका। |
| सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी | “यह मामला इस मायने में बदकिस्मत/मनहूस (Jinxed) है, जहां तारीख दर तारीख मामला टलता ही जा रहा है…” |
| अगली सुनवाई की तिथि | 6 नवंबर 2026 |

