Saturday, October 3, 2026
HomeLaw Firms & Assoc.Advocate Suspension: अनुशासनात्मक जांच के अंतरिम चरण में स्टेट बार काउंसिल किसी...

Advocate Suspension: अनुशासनात्मक जांच के अंतरिम चरण में स्टेट बार काउंसिल किसी वकील का वकालत का लाइसेंस निलंबित नहीं कर सकती; लाइसेंस निलंबन रद्द

मामले के मुख्य तथ्य (Key Highlights)

  • अंतरिम निलंबन का आदेश:सेंट्रल बार एसोसिएशन (सिविल कोर्ट, लखनऊ) के अध्यक्ष अखिलेश जायसवाल और सचिव अवनीश दीक्षित के खिलाफ उत्तर प्रदेश बार काउंसिल की अनुशासनात्मक समिति के समक्ष मामला लंबित था। 26 सितंबर को समिति ने अगली सुनवाई 11 अक्टूबर तय की, लेकिन साथ ही अंतिम फैसला आने से पहले ही दोनों वकीलों के लाइसेंस को ‘अगले आदेश तक’ अंतरिम रूप से निलंबित कर दिया।
  • प्रक्रियात्मक खामी:हाईकोर्ट ने पाया कि अनुशासनात्मक समिति ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख नहीं किया कि वकीलों की मांग के बावजूद उन्हें शिकायत की प्रति दी गई थी या नहीं। शिकायत की प्रति दिए बिना और सुनवाई पूरी किए बिना अनिश्चितकालीन निलंबन कानूनन पोषणीय नहीं है।
  • मद्रास हाईकोर्ट के फैसले का हवाला:पीठ ने मद्रास उच्च न्यायालय के एक पूर्व फैसले का संदर्भ दिया, जिसमें माना गया था कि तमिलनाडु और पुडुचेरी बार काउंसिल के पास अनुशासनात्मक जांच लंबित रहने के दौरान किसी व्यक्ति को अंतरिम रूप से निलंबित करने का अधिकार नहीं है।

हाईकोर्ट का निष्कर्ष और निर्देश

हाईकोर्ट ने माना कि यूपी बार काउंसिल द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया ‘अधिवक्ता अधिनियम, 1961’ के प्रावधानों के अनुकूल नहीं है।

अदालत ने आदेश देते हुए कहा: “अदालत के अनुसार, अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 35(3)(c) में उल्लिखित निलंबन का आदेश एक अंतिम आदेश है और इसे उत्तर प्रदेश बार काउंसिल द्वारा अंतरिम चरण में पारित नहीं किया जा सकता था।”

लखनऊ/प्रयागराज: अधिवक्ताओं के पेशेवर आचरण, अनुशासनात्मक कार्यवाहियों के वैधानिक ढांचे और राज्य बार काउंसिलों की दंडात्मक शक्तियों की सीमा पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक फैसला सुनाया है।

सिविल कोर्ट लखनऊ के अध्यक्ष अखिलेश जायसवाल और महासचिव अवनीश दीक्षित के वकालत के लाइसेंस को किया था निलंबित

न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने सेंट्रल बार एसोसिएशन, सिविल कोर्ट लखनऊ के अध्यक्ष अखिलेश जायसवाल और महासचिव अवनीश दीक्षित के वकालत के लाइसेंस को यूपी बार काउंसिल द्वारा अंतरिम रूप से निलंबित किए जाने के 26 सितंबर 2026 के आदेश को पूरी तरह निरस्त (Quash) कर दिया। खंडपीठ ने माना कि अधिवक्ता अधिनियम की धारा 35(3)(c) के तहत निलंबन की शक्ति एक अंतिम शास्ति (Final Penalty) है, जिसे केवल पूर्ण जांच और साक्ष्य के बाद ही पारित किया जा सकता है, न कि अंतरिम राहत या अंतरिम दंड के रूप में।उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के तहत किसी राज्य बार काउंसिल की अनुशासनात्मक समिति (Disciplinary Committee) जांच लंबित रहने के दौरान अंतरिम चरण (Interim Stage) में किसी अधिवक्ता का लाइसेंस निलंबित नहीं कर सकती।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. धारा 35(3)(c) के तहत निलंबन केवल ‘अंतिम आदेश’ हो सकता है: न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट कहा:“इस न्यायालय के अनुसार, अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 35(3)(c) में उल्लिखित निलंबन (Suspension) का आदेश एक अंतिम आदेश (Final Order) है और इसे उत्तर प्रदेश बार काउंसिल द्वारा अनुशासनात्मक कार्यवाही के अंतरिम चरण (Interim Stage) में पारित नहीं किया जा सकता था।”

2. प्राकृतिक न्याय और शिकायत की प्रति न देने पर आपत्ति:

  • खंडपीठ ने पाया कि यूपी बार काउंसिल की अनुशासनात्मक समिति के 26 सितंबर के आदेश में इस बात का कोई उल्लेख नहीं था कि क्या याचिकाकर्ताओं को उस शिकायत की प्रति उपलब्ध कराई गई थी, जिसकी उन्होंने औपचारिक मांग की थी।
  • अदालत ने इस बात पर भी गंभीर आपत्ति जताई कि एक ओर अनुशासनात्मक समिति ने मामले की अगली सुनवाई 11 अक्टूबर नियत की थी, वहीं दूसरी ओर अगली सुनवाई से पहले ही “आगामी आदेशों तक” दोनों वकीलों के लाइसेंस को अनिश्चितकाल के लिए निलंबित कर दिया गया था।
  • अदालत ने माना कि जांच लंबित रहने के दौरान इस प्रकार का अनिश्चितकालीन अंतरिम निलंबन (Indefinite Interim Suspension) कानून की नजर में टिकने योग्य नहीं है।

3. मद्रास हाईकोर्ट की नजीर का अनुमोदन:

  • उच्च न्यायालय ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस ऐतिहासिक निर्णय पर सहमति जताई, जिसमें व्यवस्था दी गई थी कि तमिलनाडु और पुडुचेरी बार काउंसिल के पास अनुशासनात्मक जांच लंबित रहने के दौरान किसी अधिवक्ता को अंतरिम निलंबन (Interim Suspension Pending Disciplinary Inquiry) में रखने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।
  • खंडपीठ ने कहा:“उक्त निर्णय के अवलोकन से यह स्पष्ट है कि वर्तमान मामले में प्राधिकारियों द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं है।”

Also Read; Practicing Advocate: न्यायिक अधिकारी को वकालत कर रहे वकीलों से निकटता नहीं रखनी चाहिए; महिला वकील से फोन स्वीकार करना और उससे सैकड़ों कॉल पर बात करना गंभीर कदाचार

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: लखनऊ सेंट्रल बार एसोसिएशन का विवाद

  • याचिकाकर्ताओं की पदस्थिति:
    • याचिकाकर्ता अखिलेश जायसवाल सेंट्रल बार एसोसिएशन, सिविल कोर्ट लखनऊ के वर्तमान अध्यक्ष (President) हैं और दूसरे याचिकाकर्ता अवनीश दीक्षित उसी बार एसोसिएशन के मानद सचिव (Secretary) हैं।
  • यूपी बार काउंसिल में कार्यवाही और अंतरिम निलंबन:
    • दोनों पदाधिकारियों के विरुद्ध कुछ विवादों और शिकायतों को लेकर उत्तर प्रदेश राज्य बार काउंसिल की अनुशासनात्मक समिति के समक्ष कार्यवाही शुरू की गई थी।
    • 26 सितंबर 2026 को अनुशासनात्मक समिति ने मामले की सुनवाई करते हुए कार्यवाही को 11 अक्टूबर 2026 तक स्थगित कर दिया, परंतु उसी आदेश के माध्यम से दोनों वरिष्ठ अधिवक्ताओं के वकालत करने के लाइसेंस को आगामी आदेश तक तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया।
  • हाईकोर्ट में चुनौती:
    • दोनों अधिवक्ताओं ने वरिष्ठ अधिवक्ता शरद पाठक के माध्यम से इलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ पीठ) में रिट याचिका दायर कर दलील दी कि अधिवक्ता अधिनियम में अनुशासनात्मक जांच के दौरान अंतरिम निलंबन (Pendente Lite Suspension) का कोई प्रावधान नहीं है और यह उनके संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत आजीविका के मौलिक अधिकार का सीधा हनन है।

उच्च न्यायालय द्वारा जारी निर्देश

अदालत ने निलंबन आदेश को रद्द करते हुए दोनों पक्षों के लिए संतुलित दिशा-निर्देश जारी किए:

  1. निलंबन आदेश रद्द: 26 सितंबर 2026 का अंतरिम निलंबन आदेश पूरी तरह निरस्त किया जाता है; दोनों अधिवक्ता अपनी नियमित वकालत जारी रख सकते हैं।
  2. निर्धारित तिथि पर पेशी: याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया गया कि वे अनुशासनात्मक समिति द्वारा तय अगली सुनवाई तिथि (11 अक्टूबर) पर यूपी बार काउंसिल के समक्ष अनिवार्य रूप से उपस्थित हों।
  3. 24 घंटे में दस्तावेजों की मांग व आपूर्ति: यदि याचिकाकर्ताओं को कोई संबंधित दस्तावेज/शिकायत की प्रति अभी तक नहीं मिली है, तो वे 24 घंटे के भीतर यूपी बार काउंसिल से इसकी मांग कर सकते हैं और बार काउंसिल कानून के अनुसार उन्हें समस्त दस्तावेज उपलब्ध कराएगी।
  4. अनावश्यक स्थगन (Adjournments) पर रोक: अदालत ने याचिकाकर्ताओं को सख्त हिदायत दी कि वे जांच कार्यवाही में बिना वजह किसी स्थगन की मांग नहीं करेंगे और अनुशासनात्मक प्रक्रिया को तेजी से पूरा करने में पूर्ण सहयोग करेंगे।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है अधिवक्ता अधिनियम, 1961?

  • अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 35 (व्यावसायिक कदाचार के लिए दंड):
    • धारा 35(1): राज्य बार काउंसिल को यदि किसी अधिवक्ता के खिलाफ व्यावसायिक या अन्य कदाचार की शिकायत मिलती है, तो वह मामले को अपनी अनुशासनात्मक समिति (Disciplinary Committee) को संदर्भित करती है।
    • धारा 35(3): अनुशासनात्मक समिति द्वारा संबंधित अधिवक्ता और राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) को सुनवाई का अवसर देने के बाद ही निम्नलिखित अंतिम आदेश पारित किए जा सकते हैं:
      • (a) शिकायत को खारिज करना।
      • (b) अधिवक्ता को फटकार लगाना (Reprimand)।
      • (c) अधिवक्ता को एक निश्चित अवधि के लिए वकालत करने से निलंबित (Suspend) करना।
      • (d) राज्य की नामावली (Roll of Advocates) से अधिवक्ता का नाम हमेशा के लिए हटाना।
  • अधिनियम में अंतरिम शक्ति का अभाव: संसद ने जानबूझकर धारा 35 में बार काउंसिल को जांच के दौरान ‘अंतरिम निलंबन’ की शक्ति नहीं दी है, क्योंकि वकालत का लाइसेंस छीनना किसी वकील के सम्मान और आजीविका पर सीधा प्रहार होता है, जो केवल पूर्ण दोषसिद्धि के बाद ही संभव है।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: अखिलेश जायसवाल व अन्य बनाम बार काउंसिल ऑफ इंडिया व 2 अन्य [रिट याचिका (सिविल) – इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ]
  • पीठ: न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी (खंडपीठ)
  • आदेश की तिथि: 1 अक्टूबर 2026
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता शरद पाठक (साथ में अधिवक्ता मयंक पांडे, आरव सिंह एवं प्रिया सिंह)
    • बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की ओर से: अधिवक्ता शैलेश कुमार पाठक
    • अन्य प्रतिवादियों (यूपी बार काउंसिल आदि) की ओर से: अधिवक्ता सुभाष चंद्र पांडे
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
    • अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961):
      • धारा 35(1) एवं 35(3)(c) (व्यावसायिक कदाचार पर अनुशासनात्मक समिति की अंतिम दंड शक्तियां)
      • धारा 36 एवं 37 (अनुशासनात्मक आदेशों के विरुद्ध अपील प्रावधान)
    • भारत का संविधान:
      • अनुच्छेद 19(1)(g) (कोई भी वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारबार करने की स्वतंत्रता)
      • अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
    • मद्रास उच्च न्यायालय निर्णय (बार काउंसिल ऑफ तमिलनाडु एंड पुडुचेरी केस) — ‘राज्य बार काउंसिलों को अधिवक्ता अधिनियम के तहत अंतरिम निलंबन का कोई अंतर्निहित अधिकार प्राप्त नहीं है; निलंबन केवल धारा 35 की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अंतिम दंड के रूप में ही दिया जा सकता है।’
    • सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ (1998, 5-जज संविधान पीठ) — ‘वकील का लाइसेंस निलंबित या रद्द करने की प्रक्रिया विधायी नियमों और प्राकृतिक न्याय के कड़े बंधनों से बंधी है।’
  • अंतिम परिणाम: अंतरिम निलंबन आदेश रद्द; याचिकाकर्ताओं का वकालत का लाइसेंस बहाल; 11 अक्टूबर 2026 को यूपी बार काउंसिल के समक्ष कार्यवाही में भाग लेने और समयबद्ध निस्तारण का निर्देश।

Advocate Suspension: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court)
पीठन्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ एवं न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी
याचिकाकर्ताअखिलेश जायसवाल (अध्यक्ष, सेंट्रल बार एसोसिएशन, सिविल कोर्ट लखनऊ) और अवनीश दीक्षित (सचिव)
विपक्षबार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) एवं यूपी बार काउंसिल
संबंधित कानूनअधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 35(3) (Section 35(3) of Advocates Act, 1961)
अदालत का फैसला26 सितंबर का अंतरिम निलंबन आदेश रद्द (Quashed); याचिकाकर्ताओं को अगली सुनवाई में शामिल होने का निर्देश।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
few clouds
26 ° C
26 °
26 °
94 %
2.6kmh
24 %
Sat
32 °
Sun
32 °
Mon
33 °
Tue
33 °
Wed
31 °

Recent Comments