सुप्रीम कोर्ट में दलीलें और अदालत की सख्त टिप्पणी
- BCI और लॉ कॉलेजों का पक्ष:बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और NMIMS लॉ कॉलेज की ओर से पेश वकीलों ने तर्क दिया कि अनिवार्य उपस्थिति को समाप्त करने से कानूनी शिक्षा का स्तर गिरेगा, संस्थागत स्वायत्तता (Institutional Autonomy) प्रभावित होगी और अनुशासनहीनता बढ़ेगी। उन्होंने यह भी बताया कि हाईकोर्ट के फैसले के बाद देश भर के विभिन्न कॉलेजों में परीक्षाएं देने की छूट मांगने वाली मुकदमों की बाढ़ आ गई है।
- सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम रोक और टिप्पणी:इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले के मुख्य निर्देश (पैराग्राफ 249) पर अंतरिम रोक लगा दी थी। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा था कि नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज (NLUs) और देश भर के लॉ कॉलेज हाईकोर्ट के इस आदेश से “पीड़ित” हो रहे हैं, क्योंकि हाईकोर्ट ने एक तरह से “कानून बना दिया” (Legislated) है और अनुशासनहीनता दिखाने वाले छात्रों को बढ़ावा दिया है।
नई दिल्ली: देश भर के विधि विश्वविद्यालयों, राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों (NLUs) और लॉ कॉलेजों में एलएलबी/बीए एलएलबी छात्रों के लिए न्यूनतम वैधानिक उपस्थिति (Mandatory Attendance Norms) की अनिवार्यता, विधिक शिक्षा में अकादमिक अनुशासन बनाम छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य, और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियामक अधिकारों के विधिक दायरे पर देश की शीर्ष अदालत में मैराथन सुनवाई पूरी हो गई है।
दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के कार्यकारी निर्देश का मामला
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI), विभिन्न प्रमुख लॉ स्कूलों (एनएमआईएमएस आदि) और अन्य पक्षकारों की ओर से विस्तृत मौखिक बहस सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखने का आदेश दिया। इससे पूर्व, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के कार्यकारी निर्देश (पैरा 249) पर भविष्यलक्षी प्रभाव (Prospectively) से अंतरिम रोक लगा दी थी और मौखिक टिप्पणी की थी कि हाईकोर्ट ने वस्तुतः स्वयं विधायिका का काम करते हुए कानून बना दिया, जिससे अनुशासनहीन छात्रों को अनुचित लाभ मिला और देश भर के लॉ कॉलेज पीड़ित हुए। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस चर्चित फैसले को चुनौती देने वाली अपीलों के समूह पर अपना अंतिम निर्णय सुरक्षित (Reserved Verdict) रख लिया है, जिसमें कहा गया था कि किसी भी विधि छात्र को केवल उपस्थिति की कमी के आधार पर परीक्षा देने या अगली कक्षा में पदोन्नत होने से नहीं रोका जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के प्रमुख विधिक पहलू एवं दलीलें
1. बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) का पक्ष: ‘पेशेवर मानकों और अकादमिक अनुशासन का क्षरण’ बीसीआई की ओर से पेश अधिवक्ता राधिका गौतम ने दलील दी:
- सांविधिक नियामक अधिकार: अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 7(1)(h) के तहत देश में कानूनी शिक्षा के मानकों को निर्धारित करने और उनकी निगरानी करने का अनन्य अधिकार केवल बार काउंसिल ऑफ इंडिया के पास है।
- अकादमिक अनुशासन का क्षरण: बीसीआई के लीगल एजुकेशन रूल्स (नियम 12) के अनुसार 70% (और असाधारण मामलों में 65%) न्यूनतम उपस्थिति अनिवार्य है। हाईकोर्ट द्वारा इस अनिवार्यता को पूरी तरह समाप्त कर दिए जाने से विधि शिक्षा की गंभीरता, कक्षा-कक्ष की विधिक चर्चाओं और पेशेवर आचार-संहिता के प्रशिक्षण को अपूरणीय क्षति पहुंची है।
- मुकदमेबाजी की बाढ़: हाईकोर्ट के निर्देश के बाद देश भर के विभिन्न लॉ कॉलेजों में छात्रों ने अदालतों का रुख करना शुरू कर दिया, जिससे शैक्षणिक संस्थानों की प्रशासनिक स्वायत्तता पूरी तरह चरमरा गई।
2. विधि संस्थानों (NMIMS आदि) की दलीलें: ‘संस्थागत स्वायत्तता पर प्रहार’ एनएमआईएमएस स्कूल ऑफ लॉ की ओर से अधिवक्ता कानू अग्रवाल ने तर्क रखा:
- प्रत्येक विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षण संस्थान को अपने यहां शैक्षणिक अनुशासन, ट्यूटोरियल, मूट कोर्ट और नियमित उपस्थिति के नियम तय करने की आंतरिक स्वायत्तता प्राप्त है।
- केवल अंतिम परीक्षा में बैठ जाना ही पेशेवर विधिक डिग्री प्राप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता; नियमित कक्षाओं में भाग लेना एक सफल वकील बनने की अनिवार्य प्रक्रिया का हिस्सा है।
3. सुप्रीम कोर्ट की पूर्व की तीखी टिप्पणियां:
- अंतरिम रोक लगाते समय पीठ ने मौखिक रूप से कहा था:“उच्च न्यायालय ने अपने न्यायिक दायरे से बाहर जाकर एक प्रकार से विधायिका की भूमिका निभाते हुए कानून बना दिया (Legislated) है। इसके चलते देश भर के राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (NLUs) और लॉ संस्थान गंभीर संकट झेल रहे हैं, क्योंकि इस आदेश ने अनुशासन की कमी वाले छात्रों को एक अनुचित प्रीमियम/छूट दे दी है।”
मामले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: सुशांत रोहिल्ला आत्महत्या कांड और दिल्ली हाईकोर्ट का 2025 का फैसला
- 2017 का सुशांत रोहिल्ला मामला:
- एमिटी लॉ स्कूल (दिल्ली) के तीसरे वर्ष के छात्र सुशांत रोहिल्ला ने कथित तौर पर कम उपस्थिति के कारण अंतिम वर्ष की परीक्षाओं में बैठने से रोके जाने और एक साल बर्बाद करने के लिए मजबूर किए जाने के मानसिक तनाव में आत्महत्या कर ली थी।
- इस हृदयविदारक घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट को भेजे गए एक पत्र के आधार पर दिल्ली हाईकोर्ट ने इसे स्वतः संज्ञान जनहित याचिका (Suo Motu PIL) के रूप में दर्ज किया था।
- दिल्ली हाईकोर्ट का नवंबर 2025 का ऐतिहासिक निर्णय:
- दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले की लंबी सुनवाई के बाद नवंबर 2025 में फैसला सुनाया था।
- अदालत ने माना था कि उपस्थिति की कमी के आधार पर किसी छात्र को पूरा शैक्षणिक वर्ष दोहराने के लिए मजबूर करना या परीक्षा से बाहर करना छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
- हाईकोर्ट ने निर्देश दिया था (पैरा 249) कि किसी भी मान्यता प्राप्त लॉ कॉलेज या विश्वविद्यालय में नामांकित छात्र को केवल कम उपस्थिति के आधार पर परीक्षा देने से रोका नहीं जा सकता और न ही उसकी अकादमिक प्रगति को बाधित किया जा सकता है।
- सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती (2026):
- दिल्ली हाईकोर्ट के इस क्रांतिकारी परंतु विवादित फैसले के विरुद्ध बीसीआई, विभिन्न निजी व डीम्ड लॉ यूनिवर्सिटीज ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिकाएं दायर की थीं।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961):
- धारा 7(1)(h): बार काउंसिल ऑफ इंडिया को भारत के विश्वविद्यालयों के परामर्श से कानूनी शिक्षा के मानकों को बढ़ावा देने और निर्धारित करने का दायित्व सौंपती है।
- धारा 49(1)(d): बीसीआई को विधि स्नातकों के बार में नामांकन के लिए आवश्यक शैक्षणिक योग्यताओं और प्रशिक्षण के नियम बनाने की वैधानिक शक्ति देती है।
- बीसीआई लीगल एजुकेशन रूल्स, 2008 (नियम 12):
- नियम 12 स्पष्ट रूप से आदेशित करता है कि प्रत्येक सेमेस्टर में छात्र की न्यूनतम उपस्थिति 70% होनी अनिवार्य है, जिसे डीन/प्रिंसिपल द्वारा विशेष चिकित्सीय या अप्रत्याशित कारणों से अधिकतम 65% तक शिथिल (Relax) किया जा सकता है।
- न्यायिक समीक्षा बनाम नीतिगत निर्णय:
- स्थापित न्यायिक सिद्धांत है कि उच्च न्यायालय शैक्षणिक मामलों, परीक्षा पात्रता और उपस्थिति के नियमों में आम तौर पर तब तक हस्तक्षेप नहीं करते जब तक कि कोई नियम पूरी तरह मनमाना या असंवैधानिक न हो।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: बार काउंसिल ऑफ इंडिया बनाम भारत संघ व अन्य [विशेष अनुमति याचिकाएं (सिविल) – सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह (तीन न्यायाधीशों की विशेष पीठ)
- आदेश की तिथि: 6 अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की ओर से: अधिवक्ता राधिका गौतम
- एनएमआईएमएस (NMIMS) की ओर से: अधिवक्ता कानू अग्रवाल
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक नियम:
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (धारा 7(1)(h) एवं धारा 49)
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया रूल्स ऑन लीगल एजुकेशन, 2008 (नियम 12 – उपस्थिति अनिवार्यता)
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 21 (शिक्षा का अधिकार, मानवीय गरिमा एवं मानसिक स्वास्थ्य)
- अनुच्छेद 136 (सर्वोच्च न्यायालय की अपीलीय अधिकारिता)
- अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)
- वर्तमान स्थिति: सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की मौखिक बहस सुनकर अपना अंतिम निर्णय सुरक्षित रख लिया है; देश भर के लॉ कॉलेजों में उपस्थिति नियमों की विधिक वैधता पर शीर्ष अदालत का फैसला जल्द आने की संभावना है।
Law Student:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित मामला | Bar Council of India v. Union of India & Others |
| पीठ | न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता एवं न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह |
| अपीलकर्ता | बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI), NMIMS लॉ कॉलेज व अन्य |
| मूल विवाद | दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा लॉ छात्रों के लिए अनिवार्य अटेंडेंस की बाध्यता खत्म करने के फैसले के खिलाफ अपील। |
| वर्तमान स्थिति | मौखिक बहस पूरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा। |

