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आंकड़ों का गणित: कितने आदेश सार्वजनिक, कितने गायब?
- विधानसभा में दी गई जानकारी (मार्च 2025):राज्य सरकार ने स्वयं मार्च 2025 में तेलंगाना विधानसभा को सूचित किया था कि 2 जून 2014 से 14 मार्च 2025 के बीच कुल 1,99,115 सरकारी आदेश (GOs) जारी किए गए थे, जिनमें से केवल 82,657 GOs ही सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराए गए। यानी शेष 1,16,458 (लगभग 58.5%) आदेश अप्रकाशित हैं।
- RTI से हुआ खुलासा (नवंबर 2025):18 नवंबर 2025 को प्राप्त एक आरटीआई जवाब के अनुसार, 7 दिसंबर 2023 से 26 जनवरी 2025 के बीच जारी किए गए 19,064 आदेशों में से मात्र 3,290 GOs को ही सार्वजनिक डोमेन में रखा गया।
- न्यायालय के पूर्व आदेशों का उल्लंघन:याचिका में बताया गया है कि तेलंगाना हाईकोर्ट ने 10 मार्च 2022 और फिर 23 दिसंबर 2025 को राज्य सरकार को 8 सप्ताह के भीतर सभी अप्रकाशित GOs अपलोड करने के निर्देश दिए थे। आदेशों का पालन न होने के कारण अवमानना (Contempt) का मामला भी लंबित है।
मामले के मुख्य कानूनी पहलू और याचिकाकर्ता की माँगें
1. “सार्वजनिक और आंतरिक” (Public & Internal) टैगिंग का दुरुपयोग:
- याचिका के अनुसार, सरकारी विभाग ‘गवर्नमेंट ऑर्डर इश्यू रजिस्टर’ (GOIR) पोर्टल पर आदेशों को बिना किसी लिखित कारण के ‘Internal’ (आंतरिक) के रूप में टैग कर देते हैं। RTI अधिनियम की धारा 8 या धारा 9 के तहत छूट का कोई कारण दर्ज किए बिना हजारों GOs को जनता की पहुंच से दूर रखा जा रहा है।
- याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क है कि जिस सरकारी आदेश के बारे में नागरिक जानते ही नहीं, वे न तो उसका लाभ उठा सकते हैं और न ही उसे कानूनन लागू माना जा सकता है।
2. तेलंगाना सूचना आयोग की विफलता:
- याचिकाकर्ता ने 17 जनवरी 2026 को आरटीआई आवेदन दाखिल किया था और 22 फरवरी को तेलंगाना सूचना आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप है कि आयोग ने कई सुनवाइयों के बावजूद कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया और हाइब्रिड (वर्चुअल) सुनवाई का अवसर भी नहीं दिया।
अदालत से मांगी गई मुख्य राहतें (Relief Sought)
- 2 जून 2014 से अब तक के सभी GOs (वैध कानूनी छूट वाले आदेशों को छोड़कर) को तुरंत ऑनलाइन सार्वजनिक किया जाए।
- अप्रकाशित GOs का विभाग-वार आंकड़ा जारी किया जाए और भविष्य में आदेशों को अपलोड करने के लिए एक निश्चित समय-सीमा तथा उत्तरदायी अधिकारियों की नियुक्ति की जाए।
- तेलंगाना राज्य सूचना आयोग को शिकायत पर 4 सप्ताह में फैसला करने और हाइब्रिड (Video Conference) सुनवाई तथा 3 दिनों के भीतर सुनवाई का रिकॉर्ड ऑनलाइन अपलोड करने का निर्देश दिया जाए।
हैदराबाद: सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act, 2005) की धारा 4(1)(b) (सार्वजनिक प्राधिकरणों द्वारा स्वतः संज्ञान प्रकटीकरण / Suo Motu Proactive Disclosure), धारा 8 एवं 9 (सूचना प्रकटीकरण से छूट के सीमित वैधानिक आधार), भारत का संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) (नागरिकों का जानने का मौलिक अधिकार / Right to Know), न्यायिक आदेशों के बावजूद शासनादेशों को अपलोड न करने पर अदालत की अवमानना (Contempt of Court), तथा सरकारी पोर्टल पर आदेशों को मनमाने ढंग से ‘पब्लिक’ बनाम ‘इंटरनल’ टैग करने की प्रशासनिक प्रथा के खिलाफ तेलंगाना उच्च न्यायालय में एक अत्यंत महत्वपूर्ण रिट याचिका दायर की गई है।
तेलंगाना उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुरेपल्ली नंदा (Justice Surepalli Nanda) की एकल पीठ के समक्ष सामाजिक कार्यकर्ता बी. विनय रेड्डी ने अधिवक्ता महेश मामिंडला के माध्यम से याचिका दायर की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि तेलंगाना राज्य के गठन (2 जून 2014) से लेकर अब तक जारी किए गए कुल 1.99 लाख शासनादेशों (Government Orders – GOs) में से लगभग 1,16,458 (58.5%) शासनादेशों को सरकार ने सार्वजनिक डोमेन से बाहर (अप्रकाशित) रखा है।
याचिकाकर्ता ने रेखांकित किया है कि उच्च न्यायालय द्वारा पूर्व में दो बार (10 मार्च 2022 और 23 दिसंबर 2025 को) 8 सप्ताह के भीतर सभी अप्रकाशित आदेशों को पोर्टल पर अपलोड करने के स्पष्ट निर्देश दिए जाने के बावजूद राज्य सरकार ने इसका पूर्ण अनुपालन नहीं किया है।
याचिकाकर्ता की मुख्य मांगें एवं संवैधानिक तर्क
1. 2 जून 2014 से जारी सभी शासनादेशों को सार्वजनिक डोमेन में लाना:
- याचिका में मांग की गई है कि तेलंगाना सरकार 2 जून 2014 से लेकर अब तक जारी किए गए प्रत्येक शासनादेश (GO) को सार्वजनिक डोमेन (वेबसाइट/पोर्टल) पर अनिवार्य रूप से अपलोड करे।
- केवल उन्हीं विशिष्ट आदेशों को रोका जाए जिन्हें सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8 (राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता आदि) या धारा 9 के तहत विधि सम्मत और सकारण आदेश (Reasoned Order) दर्ज करके रोका गया हो।
2. ‘पब्लिक’ बनाम ‘इंटरनल’ की मनमानी टैगिंग पर रोक:
- याचिकाकर्ता के अनुसार, प्रशासनिक विभाग गवर्नमेंट ऑर्डर इश्यू रजिस्टर (GOIR) पोर्टल पर अपलोड करते समय बिना किसी वैधानिक आधार या लिखित कारण के आदेशों को मनमाने तरीके से ‘पब्लिक’ (Public) या ‘इंटरनल’ (Internal) के रूप में वर्गीकृत कर देते हैं।
- मुख्य विधिक तर्क यह है कि:“जिस शासनादेश तक नागरिक की कोई पहुंच नहीं है और जो कभी सार्वजनिक डोमेन में आया ही नहीं, एक सामान्य नागरिक न तो उसके अस्तित्व को जान सकता है और न ही अपने विधिक अधिकारों के लिए उस पर भरोसा कर सकता है।”
3. विभागवार आंकड़े, अपलोड समय-सीमा और जवाबदेही:
- याचिका में मांग की गई है कि सरकार से विभागवार अप्रकाशित शासनादेशों की आधिकारिक सूची तलब की जाए।
- भविष्य में जारी होने वाले सभी शासनादेशों के लिए पोर्टल पर अपलोड करने की एक निश्चित समय-सीमा तय की जाए और इसका उल्लंघन होने पर संबंधित नोडल अधिकारियों (Responsible Officers) की व्यक्तिगत विधिक जवाबदेही तय की जाए।
4. तेलंगाना सूचना आयोग की कार्यप्रणाली में सुधार:
- याचिका में राज्य सूचना आयोग के समक्ष लंबित शिकायत का निपटारा 4 सप्ताह के भीतर करने और आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी 2 सप्ताह में निःशुल्क उपलब्ध कराने की प्रार्थना की गई है।
- इसके अलावा, सूचना आयोग में हाइब्रिड/वर्चुअल सुनवाई (VC) की अनुमति देने, सुनवाई से कम से कम 7 दिन पूर्व नोटिस जारी करने और सुनवाई के 3 दिन के भीतर कार्यवाहियों का रिकॉर्ड पोर्टल पर अपलोड करने का निर्देश देने की मांग की गई है।
याचिका के प्रमुख आंकड़े: 58.5% आदेश जनता की पहुंच से बाहर
| संदर्भ / स्रोत | जारी कुल शासनादेश | सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध | अप्रकाशित / रोके गए शासनादेश |
| विधानसभा में राज्य सरकार का आधिकारिक बयान (मार्च 2025) | 1,99,115 (2 जून 2014 से 14 मार्च 2025) | 82,657 (41.5%) | 1,16,458 (58.5%) |
| आरटीआई जवाब (18 नवंबर 2025) | 19,064 (7 दिसंबर 2023 से 26 जनवरी 2025) | 3,290 (17.2%) | 15,774 (82.8%) |
न्यायिक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2022–2026)
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: RTI धारा 4 बनाम शासकीय गोपनीयता
- RTI अधिनियम की धारा 4 का अधिदेश:
- सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 4(1)(b) यह अनिवार्य बनाती है कि प्रत्येक सार्वजनिक प्राधिकरण अपने नियमों, विनियमों, निर्देशों, मैनुअल्स और सरकारी नीतियों को इंटरनेट और आधिकारिक पोर्टलों के माध्यम से स्वतः प्रकाशित करे ताकि जनता को न्यूनतम आरटीआई आवेदन करने की आवश्यकता पड़े।
- शासनादेश (GOs) राज्य के कार्यकारी आदेश होते हैं जिनके माध्यम से कानून लागू होते हैं, सार्वजनिक धन खर्च होता है और नागरिकों के अधिकार तय होते हैं। इन्हें छिपाना विधि के शासन (Rule of Law) के विपरीत है।
- धारा 8 और 9 के अपवादों का सख्त दायरा:
- कानून के अनुसार, किसी भी जानकारी को केवल तभी गोपनीय रखा जा सकता है जब वह आरटीआई की धारा 8 या 9 के तहत आती हो।
- यदि कोई आदेश ‘इंटरनल’ मार्क किया जाता है, तो सक्षम प्राधिकारी को लिखित रूप में यह दर्ज करना अनिवार्य है कि वह आदेश किस विशिष्ट वैधानिक छूट के अंतर्गत आता है। प्रशासनिक सुविधा या आलोचना के डर से थोक में 58% आदेशों को छिपाना कानून का उल्लंघन है।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- केस संदर्भ: बी. विनय रेड्डी बनाम तेलंगाना राज्य व अन्य [रिट याचिका – तेलंगाना उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति सुरेपल्ली नंदा (एकल पीठ)
- रिपोर्टिंग तिथि: 23 अक्टूबर 2026
- संबद्ध विषय: 1.16 लाख अप्रकाशित शासनादेश (GOs), GOIR पोर्टल पर ‘पब्लिक’ बनाम ‘इंटरनल’ वर्गीकरण, RTI धारा 4 का स्वतः प्रकटीकरण एवं अनुच्छेद 19(1)(a)
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता की ओर से: अधिवक्ता महेश मामिंडला (Advocate Mahesh Mamindla)
- प्रतिवादी (तेलंगाना राज्य) की ओर से: शासकीय अधिवक्ता (GP for General Administration Department / State of Telangana)
- प्रासंगिक कानून एवं सांविधिक प्रावधान:
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act) — धारा 4(1)(b) (सार्वजनिक प्राधिकरणों द्वारा स्वतः सूचना का प्रकाशन), धारा 8 (सूचना प्रकटीकरण से छूट) एवं धारा 9 (कॉपीराइट आधार पर अस्वीकृति)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा जानने का अधिकार) एवं अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 — धारा 11 व 12 (न्यायिक आदेशों के गैर-अनुपालन पर कार्यवाही)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- पारदर्शिता और लोक-प्रशासन में शासनादेशों का प्रकटीकरण: ‘लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार जिन आदेशों के माध्यम से शासन संचालित करती है, उन्हें सार्वजनिक डोमेन में रखना उसका वैधानिक व संवैधानिक कर्तव्य है; RTI कानून के विशिष्ट अपवादों के बिना किसी भी शासनादेश को “इंटरनल” मानकर गोपनीय रखना नागरिकों के जानने के मौलिक अधिकार का हनन है।’
- वर्तमान स्थिति: याचिका न्यायमूर्ति सुरेपल्ली नंदा के समक्ष विचारार्थ प्रस्तुत; राज्य सरकार का औपचारिक जवाब दाखिल होना शेष है; अदालत द्वारा मामले की अगली सुनवाई की तिथि निर्धारित की जाएगी।
Govt Order: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | तेलंगाना उच्च न्यायालय (Telangana High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति सुरेपल्ली नंदा (Justice Surepalli Nanda) |
| मामले का शीर्षक | बी. विनय रेड्डी बनाम तेलंगाना राज्य व अन्य (B Vinay Reddy v. The State of Telangana and Others) |
| याचिकाकर्ता के वकील | अधिवक्ता महेश ममिंडला (Advocate Mahesh Mamindla) |
| मुख्य मुद्दा | जून 2014 से अब तक जारी 1,99,115 सरकारी आदेशों में से 1.16 लाख से अधिक GOs को वेबसाइट पर अपलोड न करना। |
| याचिकाकर्ता का दावा | यह सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act, 2005) की धारा 4 (स्वतः प्रकटीकरण) और हाईकोर्ट के पुराने आदेशों का सीधा उल्लंघन है। |

