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मामले की पृष्ठभूमि और सर्वोच्च न्यायालय की मुख्य टिप्पणियां
- आरबीआई के परामर्श रवैये पर CJI का असंतोष:अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि आरबीआई, आईटी मंत्रालय (MeiTY) और दूरसंचार विभाग (DoT) मिलकर विनियामक उपाय तैयार कर रहे हैं, जो दिसंबर 2026 तक लागू होंगे। इस पर CJI सूर्यकांत ने नाराजगी जताते हुए पूछा कि जब देश की अर्थव्यवस्था में हजारों करोड़ रुपये का सबसे बड़ा डिजिटल फ्रॉड हो चुका है, तब भी आरबीआई बैंकों से ही राय क्यों ले रहा है?
- बैंकों को बनाना होगा ‘सुरक्षात्मक छत्र’ (Protective Umbrella):CJI ने सवाल उठाया कि बैंकों के पास ग्राहक के खाते का पूरा विवरण होता है। जब किसी खाते से अचानक कोई असामान्य या बड़ी रकम ट्रांसफर करने का संदेश या ट्रांजेक्शन आता है, तो बैंक उसे तुरंत रोक क्यों नहीं देते? खातों को 3-4 श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाना चाहिए और असामान्य लेनदेन पर तत्काल रोक लगाकर स्थानीय पुलिस व बैंक को भौतिक सत्यापन (Physical Verification) करना चाहिए।
- व्हाट्सएप और बैंक अधिकारियों की मिलीभगत पर सवाल:न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और CJI ने इस बात पर जोर दिया कि प्रस्तावित नियमों में व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्मों (Intermediaries) की भूमिका और ठगी में शामिल बैंक अधिकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही और अभियोजन (Prosecution) का स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए।
नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 32 व अनुच्छेद 142 (पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने की अंतर्निहित शक्ति), बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 (Banking Regulation Act, 1949) की धारा 35A (जमाकर्ताओं के संरक्षण व जनहित में रिज़र्व बैंक के निर्देश), भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934, तथा टॉर्ट कानून के तहत कठोर दायित्व का सिद्धांत (Doctrine of Strict Liability) और बैंकों के ‘उचित सावधानी’ (Duty of Care & Due Diligence) के वैधानिक मानकों पर सर्वोच्च न्यायालय ने ‘डिजिटल अरेस्ट’ (Digital Arrest) घोटालों के संदर्भ में एक अत्यंत कड़ा और व्यापक न्यायिक रुख अपनाया है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ ने फर्जी अदालती आदेशों और जांच एजेंसियों के नाम पर की जा रही डिजिटल अरेस्ट ठगी से संबंधित स्वतः संज्ञान मामले [SMW (Crl.) No. 3/2025] पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट व्यवस्था दी कि यदि किसी वित्तीय संस्थान या बैंक अधिकारियों की लापरवाही और सतर्कता (Due Diligence) की विफलता के कारण कोई ग्राहक साइबर ठगी का शिकार होता है, तो बैंकों पर कठोर देयता (Strict Liability) लागू की जानी चाहिए।
शीर्ष अदालत ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट के मामलों में पीड़ित के खाते से हुआ डेबिट ‘शून्य’ (Zero Debit) माना जाना चाहिए और पूरी वित्तीय भरपाई बैंक को करनी होगी। पीठ ने भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा तैयार किए जा रहे प्रस्तावित साइबर सुरक्षा नियमों में यह अनिवार्य शर्त जोड़ने का निर्देश दिया कि वित्तीय संस्थान पीड़ितों को गंवाई गई राशि से किसी भी स्थिति में कम नहीं (Not less than the amount lost) का मुआवजा देकर क्षतिपूर्ति करेंगे।
शीर्ष अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘समस्या यह है कि बैंक अधिकारी मिले होते हैं; RBI अभी भी बैंकों से ही सलाह ले रहा है’: CJI सूर्यकांत
सुनवाई के दौरान जब अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने बताया कि RBI बैंकों के साथ परामर्श करके दिसंबर तक विनियामक उपाय लागू करने पर विचार कर रहा है, तो मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने गहरी नाराजगी व्यक्त की: “समस्या यह है कि बैंक अधिकारी खुद इन घोटालों में संलिप्त पाए जा रहे हैं। और जब हम कदम उठाने के लिए कह रहे हैं, तो RBI बैंकों के साथ ही परामर्श (Soft-pedalling) करने में जुटा हुआ है! जब तक बैंकों के खिलाफ कठोर दंडात्मक निर्देश (Penal Direction) नहीं होंगे, वे अपनी कार्यप्रणाली कभी नहीं सुधारेंगे! डिजिटल अरेस्ट के जरिए देश की अर्थव्यवस्था पर सबसे बड़ा वित्तीय हमला हुआ है… हजारों करोड़ रुपये गायब हो गए हैं।”
2. ‘बैंकों को ग्राहकों के लिए सुरक्षात्मक छतरी (Protective Umbrella) बनना होगा’:
- CJI ने बैंकों के पास मौजूद खाताधारकों के वित्तीय डेटा और उनके निष्क्रिय रवैये पर सवाल खड़े किए:*”बैंक भली-भांति जानते हैं कि उनका खाताधारक कौन है। जैसे ही आपको पता चलता है कि खाते में बड़ी रकम जमा है, बैंकों को उस पैसे के चारों ओर एक सुरक्षात्मक छतरी (Protective Umbrella) तैयार करनी चाहिए।बैंक पैसे मांगने वाले संदिग्ध और कपटपूर्ण संदेशों को ब्लॉक क्यों नहीं करते? जैसे ही कोई असामान्य लेन-देन (Unusual Transaction) सामने आता है, उसे उसी क्षण रोक (Withheld) क्यों नहीं दिया जाता?“
3. ‘मोबाइल को दीवार पर मारो, अरेस्ट खत्म हो जाएगी’: पीड़ितों के अंधविश्वास पर CJI की खरी-खरी
- जब न्यायमित्र (Amicus Curiae) वरिष्ठ अधिवक्ता एन.एस. नप्पिनई ने बताया कि व्यापक प्रचार के बावजूद पिछले सप्ताह एक महिला से ₹2.5 करोड़ ठग लिए गए, तो CJI सूर्यकांत ने शिक्षित समाज की संवेदनहीनता पर तीखा प्रहार किया: “इन पीड़ितों को क्या हो गया है? वे इस तरह के जाल में कैसे फंस रहे हैं? क्या वे इतनी बुनियादी बात भी नहीं समझ सकते? मोबाइल पर गिरफ्तारी का यह कैसा खौफ है? ‘मोबाइल को दीवार पर पटक दो, अरेस्ट अपने आप खत्म हो जाएगी’ (Hit the mobile on the wall, and the arrest goes)। एक लोकतांत्रिक देश में आप किस प्रकार के नागरिक हैं कि यह मान लेते हैं कि फोन पर आपकी गिरफ्तारी हो गई है? आप स्वयं अपने आप को पीड़ित (Victimising yourself) बना रहे हैं। यदि कोई अदालती आदेश है, तो कोई भी सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर जाकर उसकी प्रामाणिकता जांच सकता है।”
4. ‘वित्तीय संस्थानों पर कठोर दायित्व (Strict Liability) तय करेंगे’: जस्टिस जयमाल्या बागची
- पीठ के सदस्य न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची ने बैंक प्रशासन की जवाबदेही को विधिक धरातल पर रखते हुए कहा:*”अदालत वित्तीय संस्थानों पर कठोर दायित्व (Strict Liability) लागू करने का प्रस्ताव करती है। RBI जो नियम बना रहा है, हम उसकी जांच करेंगे कि क्या उन नियमों में अपराध को नियंत्रित करने वाले ‘पर्याप्त दांत’ (Sufficient Teeth) हैं या नहीं। लेन-देन में एक अनिवार्य ‘स्टिंग’ (निवारक रोक) होनी चाहिए और जब तक लिखित में लेन-देन की वास्तविकता की पुष्टि न हो, भुगतान को रोका जाना चाहिए।”
5. सुप्रीम कोर्ट के आदेश का मूल अंश (Formal Dictation):
खंडपीठ ने अपने लिखित आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज किया: “हम इस बात को दोहराते हैं कि RBI द्वारा प्रस्तावित विनियामक उपायों में वित्तीय संस्थानों के लिए यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि वे डिजिटल अरेस्ट या साइबर धोखाधड़ी के पीड़ितों को ऐसे मुआवजे के माध्यम से क्षतिपूर्ति (Indemnify) करें, जो उनके द्वारा गंवाई गई राशि से कम न हो—यदि यह पाया जाता है कि धोखाधड़ी वित्तीय संस्थान की ओर से उचित सावधानी (Due Diligence) बरतने में विफलता के कारण हुई है।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| मामले का शीर्षक | इन री: पीड़ितों के विरुद्ध फर्जी दस्तावेजों से डिजिटल अरेस्ट [SMW (Crl.) No. 3/2025] |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना। |
| न्यायालय मित्र (Amicus Curiae) | वरिष्ठ अधिवक्ता एन.एस. नप्पिनई (Senior Advocate NS Nappinai) — उन्होंने बताया कि जागरूकता अभियानों के बावजूद पिछले सप्ताह ही एक महिला से ₹2.5 करोड़ की ठगी हुई; विलंबित भुगतान (Lagged Payments) और साझा दायित्व का तंत्र अभी भी लंबित है। |
| अटॉर्नी जनरल का पक्ष | भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने प्रस्तुत किया कि अदालत के हस्तक्षेप के बाद मामलों में 50% की कमी आई है; बैंक अब संदिग्ध लेन-देन को चिह्नित कर रहे हैं; RBI, MeitY और दूरसंचार विभाग विनियामक उपायों पर काम कर रहे हैं जिन्हें दिसंबर तक लागू कर दिया जाएगा। उन्होंने बैंक अधिकारियों की आपराधिक संलिप्तता पर भी नियम बनाए जाने की बात कही। |
| CJI का प्रस्तावित वर्गीकरण मॉडल | CJI ने सुझाव दिया कि बैंकों को अपने खातों को 3-4 श्रेणियों (जैसे वरिष्ठ नागरिक, पेंशनभोगी आदि) में बांटना चाहिए। जब किसी खाते से उसके इतिहास से हटकर कोई बड़ा असामान्य लेन-देन हो, तो बैंक लेन-देन को रोक दे और स्थानीय पुलिस थाने को तुरंत ऑटोमेटेड सूचना भेजे ताकि एक पुलिस अधिकारी जाकर भौतिक रूप से ग्राहक से पूछ सके कि क्या उसने सच में यह ट्रांसफर किया है। |
| मध्यवर्तियों (WhatsApp) की भूमिका | पीठ ने पूछा कि क्या प्रस्तावित नियमों में वॉट्सऐप जैसे मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स की भूमिका को शामिल किया गया है, जिसके माध्यम से डिजिटल अरेस्ट की वीडियो कॉल और फर्जी अदालती दस्तावेज भेजे जाते हैं। अदालत ने कहा कि बैंक अपना व्यापार प्रभावित होने के डर से इस समस्या को पूरी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। |
विधिक एवं विनियामक विश्लेषण: ‘बैंकिंग लापरवाही और कठोर दायित्व का सिद्धांत’
- टॉर्ट कानून के तहत कठोर दायित्व (Strict Liability):
- न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची द्वारा बैंकों पर ‘कठोर दायित्व’ लागू करने का प्रस्ताव रायलैंड्स बनाम फ्लेचर के उस आधुनिक विधिक सिद्धांत पर आधारित है, जिसके तहत यदि कोई संस्था जोखिम भरी वाणिज्यिक गतिविधियां संचालित करती है, तो अपनी सुरक्षा प्रणाली में विफलता के कारण किसी तीसरे पक्ष (ग्राहक) को होने वाले नुकसान की भरपाई उसे बिना किसी बहाने के करनी होगी।
- बैंक केवल यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते कि ग्राहक ने स्वयं ओटीपी साझा किया या डर के मारे पैसे ट्रांसफर किए। जब ठगों द्वारा उपयोग किए जा रहे ‘म्यूल अकाउंट्स’ (Mule Accounts) की केवाईसी जांच में बैंक अधिकारियों की मिलीभगत सामने आती है, तो पूरी संस्थागत देयता बैंक की बन जाती है।
- अनुच्छेद 21 और वरिष्ठ नागरिकों की वित्तीय सुरक्षा:
- सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि पेंशनभोगियों और बुजुर्गों की जीवन भर की गाढ़ी कमाई का कुछ ही मिनटों में गायब हो जाना उनके गरिमापूर्ण जीवन और आजीविका के अधिकार (अनुच्छेद 21) पर सीधा प्रहार है।
- अदालत का यह रुख कि “रकम अक्षुण्ण रहनी चाहिए और ग्राहक का नुकसान शून्य होना चाहिए” देश के बैंकिंग नियामक ढांचे में एक युगांतरकारी बदलाव लाएगा, जिससे बैंकों को असामान्य निकासी पर ऑटोमेटेड फ्रीज लगाने के लिए विवश होना पड़ेगा।
विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता
- न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (संवैधानिक जनहित क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: इन री: पीड़ितों के विरुद्ध फर्जी अदालती दस्तावेजों से डिजिटल अरेस्ट [Suo Motu Writ Petition (Crl.) No. 3/2025]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
- आदेश की तिथि: 29 अक्टूबर 2026
विधिक प्रतिनिधित्व:
- भारत संघ एवं RBI की ओर से: भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी (Attorney General R. Venkataramani)।
- न्यायालय मित्र (Amicus Curiae): वरिष्ठ अधिवक्ता एन.एस. नप्पिनई (Senior Advocate NS Nappinai)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचार), अनुच्छेद 142 (न्यायहित में पूर्ण शक्ति), एवं अनुच्छेद 21 (जीवन और संपत्ति की सुरक्षा)
- बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 (Banking Regulation Act, 1949) — धारा 35A (जनहित व जमाकर्ताओं के हित में बैंकों को बाध्यकारी निर्देश देने की शक्ति)
- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन दिशानिर्देश (2017/2026) — ग्राहक की सीमित देयता एवं शून्य देयता सिद्धांत
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act, 2000) — धारा 66D (कंप्यूटर संसाधन द्वारा प्रतिरूपण कर धोखाधड़ी) एवं धारा 79 (मध्यवर्तियों का दायित्व)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- डिजिटल अरेस्ट और बैंकिंग लापरवाही में देयता का विधिक मानक: ‘वित्तीय संस्थान केवल खाता संचालक नहीं हैं बल्कि वे ग्राहकों के धन के सांविधिक संरक्षक (Custodians) हैं; यदि बैंक अपनी उचित सावधानी (Due Diligence) बरतने, असामान्य लेन-देन को समय पर रोकने या फर्जी म्यूल खातों की पहचान करने में विफल रहता है, तो डिजिटल अरेस्ट धोखाधड़ी के शिकार ग्राहक का वित्तीय नुकसान शून्य माना जाएगा; RBI द्वारा बनाए जा रहे नियमों में यह अनिवार्य प्रावधान होना चाहिए कि बैंक पीड़ित को गंवाई गई संपूर्ण राशि के बराबर क्षतिपूर्ति दे और लापरवाह अधिकारियों पर आपराधिक मुकदमा चलाया जाए।’
- वर्तमान स्थिति व भावी कदम: सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि वह RBI द्वारा तैयार किए जा रहे केवाईसी संशोधन और साइबर सुरक्षा नियमों के मसौदे की स्वयं न्यायिक समीक्षा करेगा; अदालत ने रिज़र्व बैंक से सभी अधिकृत वित्तीय संस्थानों की सूची तलब की है ताकि इन सभी पर एकमुश्त बाध्यकारी दिशा-निर्देश लागू किए जा सकें।
Bank Fraud: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| मामला/विषय | डिजिटल अरेस्ट व साइबर फ्रॉड पर स्वतः संज्ञान मामला (Suo Motu Proceeding on Digital Arrest Scams) |
| न्यायालय मित्र (Amicus Curiae) | वरिष्ठ अधिवक्ता एन.एस. नप्पिनई (Senior Advocate NS Nappinai) |
| सरकार/आरबीआई पक्ष | अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी (AG R Venkataramani) |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | सख्त दायित्व और पूर्ण क्षतिपूर्ति (Strict Liability & Full Indemnity): बैंक की चूक से हुई ठगी पर बैंक पीड़ित ग्राहक को गंवाई गई राशि के बराबर या उससे अधिक मुआवजा देगा। |

