Friday, October 30, 2026
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Diwali In Delhi-I: सुप्रीम सुझाव…दिवाली को आनंदमय बनाएं, पटाखों से मुक्त रखें; विराट कोहली और प्रमुख हस्तियों से जागरूकता अभियान चलवाएं

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अदालत की मुख्य टिप्पणियां: “बच्चे बदल सकते हैं माता-पिता का मन”

  1. स्कूली बच्चों के जरिए परिवार में बदलाव:अदालत ने शिक्षा अधिकारियों को शामिल करने का सुझाव देते हुए कहा कि आज की युवा पीढ़ी और बच्चे प्रदूषण को लेकर काफी संवेदनशील हैं। यदि बच्चों को सही तरीके से शिक्षित किया जाए, तो वे अपने माता-पिता को पटाखे न खरीदने के लिए राजी कर सकते हैं।
  2. अनुच्छेद 25 और सार्वजनिक स्वास्थ्य:अदालत ने स्वीकार किया कि त्योहार से लोगों की भावनाएं जुड़ी हैं, लेकिन संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) को सार्वजनिक स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) के आलोक में देखा जाना चाहिए। धार्मिक स्वतंत्रता स्वास्थ्य और जनहित के अधीन है।
  3. क्रमिक सुधार की रणनीति:पीठ ने कहा कि वह इस चरण में एकदम सख्त रुख अपनाकर पूर्ण प्रतिबंध का आदेश नहीं दे रही है, क्योंकि अचानक कड़े कदम से विपरीत असर (Spiralling Effect) हो सकता है। यदि इस वर्ष प्रदूषण में 25% की कमी आती है, तो अगले वर्षों में इसे 30% और 40% तक ले जाया जा सकता है।

न्यायालय मित्र (Amicus Curiae) की चौंकाने वाली रिपोर्ट

1. मौतों और जीवन प्रत्याशा का आंकड़ा:

न्यायालय मित्र उत्तरा बब्बर ने State of Global Air 2025 रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया:

  • भारत में वायु प्रदूषण के कारण वार्षिक 20.1 लाख (2.01 Million) से अधिक मौतें होती हैं, जिनमें से 21% पांच साल से कम उम्र के बच्चे हैं।
  • डब्ल्यूएचओ (WHO) के मानकों (5 μg/m³) की तुलना में अत्यधिक PM2.5 के कारण दिल्ली-एनसीआर के निवासियों की जीवन प्रत्याशा औसतन 8.2 वर्ष कम हो रही है।

2. फेफड़ों के कैंसर का बदलता ट्रेंड:

  • 1980 के दशक में फेफड़ों के कैंसर के 90% मरीज धूम्रपान करने वाले (Smokers) होते थे, लेकिन अब उत्तर भारत में लगभग 50% कैंसर मरीज गैर-धूम्रपान करने वाले (Non-smokers) हैं। 14-16 साल के गैर-धूम्रपान करने वाले बच्चों के फेफड़ों में भी काले जमाव (Black deposits) पाए जा रहे हैं।

3. ‘ग्रीन क्रैकर्स’ (Green Crackers) का भ्रम:

  • याचिकाकर्ता के वकील गोपाल शंकरनारायणन ने बताया कि नियंत्रित परीक्षण में एक अकेला पटाखा लगभग 63,000 PM2.5 कण उत्सर्जित करता है।
  • एमिकस ने बताया कि ‘ग्रीन पटाखे’ भी पूरी तरह प्रदूषण मुक्त नहीं होते। दिवाली 2025 के बाद पीएम2.5 का स्तर तेजी से बढ़ा था। बाजार में बिकने वाले पटाखों पर क्यूआर कोड (QR Codes) फर्जी पाए गए थे और हरित पटाखों के नाम पर पारंपरिक पटाखे बेचे गए थे।

नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 (स्वच्छ पर्यावरण, प्रदूषण मुक्त हवा और जीवन का अधिकार), अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार—जो ‘लोक स्वास्थ्य, नैतिकता और लोक व्यवस्था’ के वैधानिक प्रतिबंधों के अधीन है), वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981, दिल्ली-एनसीआर एवं समीपवर्ती क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अधिनियम, 2021 (CAQM Act, 2021), तथा ऐतिहासिक अर्जुन गोपाल बनाम भारत संघ [(2018) 1 SCC 412] नज़ीर के तहत पटाखों के विनियमन व स्वास्थ्य जोखिमों पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण मौखिक और नीतिगत विमर्श दर्ज किया है.

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश (Justice M.M. Sundresh) और न्यायमूर्ति प्रसन्न बी. वराले (Justice Prasanna B. Varale) की खंडपीठ ने दिल्ली-एनसीआर में गंभीर होते वायु प्रदूषण और आगामी दिवाली के मद्देनजर पटाखों पर प्रतिबंध के प्रभावी क्रियान्वयन से संबंधित मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और दिल्ली प्रशासन को एक अनूठा और व्यावहारिक सुझाव दिया.

शीर्ष अदालत ने कहा कि केवल कागजी आदेश जारी करने या प्रतिबंध लगाने से जमीनी स्तर पर बदलाव नहीं आ रहा है, क्योंकि आदेशों के लागू न होने से अदालती निर्देश ‘मजाक’ (Mockery) बनकर रह जाते हैं. अदालत ने सुझाव दिया कि सरकार को दिग्गज क्रिकेटर विराट कोहली (Virat Kohli) और समाज के अन्य सम्मानित खिलाड़ियों व प्रतिष्ठित हस्तियों को एक व्यापक जन-जागरूकता अभियान में शामिल करना चाहिए, जो जनता से अपील करें कि वे दिवाली को ‘रोशनी के त्योहार’ के रूप में मनाएं और पटाखों से बचकर इसे सबके लिए आनंदमय बनाएं. इसके साथ ही, अदालत ने बच्चों के माध्यम से परिवारों को संवेदनशील बनाने की आवश्यकता पर बल दिया और स्पष्ट किया कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार जन-स्वास्थ्य के मौलिक अधिकार से बड़ा नहीं हो सकता.

शीर्ष अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां

1. ‘विराट कोहली जैसे दिग्गजों से अपील करवाएं: दिवाली मूलतः रोशनी का पर्व था, बारूद का नहीं’:

पीठ ने सरकारी तंत्र द्वारा प्रचार के पारंपरिक तौर-तरीकों की विफलता पर सवाल उठाते हुए जन-जागरूकता में लोकप्रिय हस्तियों को जोड़ने की बात कही:

“आप जनता में जागरूकता फैलाने के लिए प्रतिष्ठित हस्तियों, अच्छे खिलाड़ियों या समाज के हर क्षेत्र में अत्यधिक सम्मानित सार्वजनिक हस्तियों की सेवाओं का उपयोग क्यों नहीं करते?” — न्यायमूर्ति पी.बी. वराले

न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश ने आगे जोड़ते हुए स्पष्ट किया:

*”दिल्ली के लिए, यदि आप उनसे कहेंगे, तो वे आगे आएंगे और आपकी मदद करेंगे। विराट कोहली जैसे विख्यात क्रिकेटर या अन्य सम्मानित हस्तियों से आप अनुरोध कर सकते हैं कि वे एक जागरूकता संदेश रिकॉर्ड करें—’आइए इस दिवाली को आनंदमय बनाएं। आइए रोशनी के त्योहार की मूल भावना का आनंद लें।’

यह मूल रूप से रोशनी का त्योहार है। जैसा कि सही कहा गया है, मूल रूप से इसमें पटाखे शामिल नहीं थे। समस्या तब शुरू हुई जब आतिशबाजी आई; 14वीं और 15वीं शताब्दी में बारूद (Gunpowder) के आने के बाद यह प्रथा पूरी तरह से इसमें समा गई।”

2. ‘बच्चों को शिक्षित करें; नई पीढ़ी पटाखों पर विश्वास नहीं करती’:

  • पीठ ने स्कूली शिक्षा प्रणाली और बच्चों की ग्रहणशीलता को पर्यावरण संरक्षण का सबसे शक्तिशाली माध्यम बताते हुए कहा:“शायद अब समय आ गया है कि हम शिक्षा अधिकारियों को निर्देश जारी करें कि वे बच्चों को शिक्षित करें। बदलाव वहीं से आना चाहिए कि हम किसी को भी असुविधा पहुँचाए बिना इस त्योहार को वास्तव में कैसे मनाएं।मेरा छोटा सा अनुभव यह है कि आज की युवा पीढ़ी और बच्चे इसके प्रति बहुत सतर्क और संशयवादी हैं। यदि आप बच्चों को सही ढंग से शिक्षित करेंगे, तो वे अपने माता-पिता से कहेंगे कि वे पटाखे न जलाएं। युवा पीढ़ी दिवाली मनाना चाहती है, कोई समस्या नहीं है, किंतु वे पटाखों पर विश्वास नहीं करते। सोचिए, इसका समाज पर कितना गहरा प्रभाव पड़ेगा।”

3. ‘अनुच्छेद 25 की धार्मिक स्वतंत्रता जन-स्वास्थ्य के अधीन है’:

  • अदालत ने स्वीकार किया कि त्योहार के साथ गहरी भावनाएं जुड़ी हुई हैं, किंतु उन्होंने रेखांकित किया कि अदालत को सभी वर्गों—बच्चों, बुजुर्गों, दिव्यांगों, बीमारों, और यहाँ तक कि बेजुबान पक्षियों और पशुओं की सुरक्षा का भी ध्यान रखना है:“भारत के संविधान का अनुच्छेद 25, जो अंतःकरण की और धर्म को अबाध रूप से मानने की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, वह ‘लोक स्वास्थ्य’ (Public Health) और भाग III के अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन है।”

4. ‘आदेशों का अनुपालन न होना उन्हें एक मजाक बना देता है’:

  • पीठ ने इस स्तर पर पूर्ण प्रतिबंध (Complete Blanket Ban) लगाने में झिझक जताई, क्योंकि अवैध बिक्री और तस्करी के कारण प्रतिबंध का उल्टा ‘स्पाइरलिंग प्रभाव’ (Spiralling Effect) हो सकता है।
  • हालांकि, खंडपीठ ने सख्त चेतावनी दी कि यदि सरकारें नियमों को लागू करने में विफल रहीं, तो अदालत को बहुत कड़ा रुख (Very Hard Stand) अपनाना पड़ेगा:“यदि आप इस वर्ष कम से कम 25% प्रदूषण कम कर पाते हैं, तो अगले वर्ष इसे 30% और फिर 40% तक ले जाया जा सकता है। लेकिन इसके लिए बहुत उच्च स्तर पर समीक्षा और ठोस प्रवर्तन की आवश्यकता है।”

न्यायमित्र (Amicus Curiae) और याचिकाकर्ता की विधिक दलीलें

सुनवाई के दौरान न्यायालय की सहायता कर रहीं न्यायमित्र वरिष्ठ अधिवक्ता उत्तरा बब्बर (Amicus Curiae Uttara Babbar) और याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने वैज्ञानिक और चिकित्सकीय आंकड़ों के आधार पर अदालत के समक्ष भयावह स्थिति प्रस्तुत की:

1. महीन कणों (PM2.5) का जानलेवा प्रभाव और चिकित्सकीय साक्ष्य:

  • एकल पटाखे का प्रभाव: वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने प्रस्तुत किया कि नियंत्रित प्रयोगशाला परीक्षणों के अनुसार, एक अकेला पटाखा लगभग 63,000 PM2.5 कण उत्सर्जित करता है।
  • रक्तप्रवाह में प्रवेश: न्यायमित्र ने समझाया कि PM2.5 कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि वे शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली को भेदकर सीधे फेफड़ों की गहराई और रक्तप्रवाह (Bloodstream) में समा जाते हैं, जिससे हृदय रोग, स्ट्रोक, कैंसर, भ्रूण मृत्यु और नवजात शिशुओं में जन्मजात विकृतियां उत्पन्न होती हैं।
  • धूम्रपान न करने वालों में फेफड़ों का कैंसर: दिल्ली के वरिष्ठ चेस्ट सर्जनों के अवलोकनों का हवाला देते हुए बताया गया कि 14 और 16 वर्ष के बच्चों के फेफड़ों में काले कार्बन जमाव (Black Deposits) पाए जा रहे हैं, जिन्होंने जीवन में कभी सिगरेट नहीं पी। जहाँ 1980 के दशक में फेफड़ों के कैंसर के 90% मरीज धूम्रपान करने वाले होते थे, वहीं आज उत्तर भारत में फेफड़ों के कैंसर के लगभग 50% मरीज गैर-धूम्रपान करने वाले (Non-smokers) हैं।
  • मौसमी स्थितियां: सर्दियों में ‘तापमान व्युत्क्रमण’ (Temperature Inversion), कम हवा की गति और बारिश के अभाव के कारण प्रदूषक जमीन के नजदीक ही फंस जाते हैं।

2. ‘ग्रीन क्रैकर्स’ (Green Crackers) प्रदूषण-मुक्त नहीं हैं:

  • न्यायमित्र ने स्पष्ट किया कि ग्रीन पटाखे केवल पारंपरिक पटाखों की तुलना में उत्सर्जन को आंशिक रूप से कम करने के लिए डिजाइन किए गए हैं, वे पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त नहीं हैं।
  • CAQM रिपोर्ट की विसंगतियां: वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) की 25 सितंबर 2025 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया कि:
    • बाजार में बेचे जा रहे पटाखों की कोई ठोस फील्ड-लेवल टेस्टिंग नहीं होती; केवल प्रयोगशाला प्रोटोटाइप की जांच होती है।
    • असली ग्रीन पटाखों की पहचान के लिए बनाए गए क्यूआर कोड (QR Codes) अधिकांश मामलों में या तो गायब थे, निष्क्रिय थे या पूरी तरह फर्जी (Fraudulent) पाए गए। पारंपरिक पटाखों को ग्रीन लेबल लगाकर अवैध रूप से बेचा जा रहा है।
  • दिवाली 2025 के बाद स्वास्थ्य संकट: दिवाली 2025 पर जब सीमित समय के लिए ग्रीन पटाखों की अनुमति दी गई थी, तब दिल्ली के 39 मॉनिटरिंग स्टेशनों में से केवल 9 स्टेशन ही चालू थे, जिसके कारण वास्तविक AQI डेटा छुपा रहा। इसके बावजूद त्योहार के बाद पल्मोनोलॉजिस्ट और स्त्री रोग विशेषज्ञों के पास सांस और गर्भावस्था संबंधी जटिलताओं के आपातकालीन मामलों में भारी उछाल दर्ज किया गया।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक विवरण

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं विधिक संदर्भ
मूल वाद का शीर्षकअर्जुन गोपाल व अन्य बनाम भारत संघ व अन्य [W.P.(C) No. 728/2015]
पीठासीन खंडपीठन्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश एवं न्यायमूर्ति प्रसन्न बी. वराले
सुनवाई की तिथि29 अक्टूबर 2026
मूल विवाददिल्ली-एनसीआर में सर्दियों के दौरान पटाखों, पराली और मौसमी कारकों के कारण वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) के ‘गंभीर’ (Severe) श्रेणी में जाने और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर संकट का मुद्दा।
अदालत का मुख्य निर्देश1. केंद्र और दिल्ली सरकार प्रमुख खिलाड़ियों (विराट कोहली आदि) और आदरणीय हस्तियों से जन-जागरूकता अभियान चलवाएं।
2. शिक्षा विभाग स्कूलों में बच्चों को पटाखों के हानिकारक प्रभावों के प्रति जागरूक करे।
3. नियमों के उल्लंघन, अवैध बिक्री और जमाखोरी के खिलाफ कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई की जाए।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल को निर्देशपीठ ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी से व्यक्तिगत रूप से इस मामले की निगरानी करने और अधिकारियों द्वारा उठाए गए कदमों की समीक्षा करने का आग्रह किया।
आगामी आदेशअदालत ने स्पष्ट किया कि वह दो-तीन दिनों के भीतर एक औपचारिक अंतरिम आदेश पारित करेगी और संबंधित अधिकारियों से पूर्व के निर्देशों के अनुपालन पर हलफनामा मांगेगी।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘अनुच्छेद 21 बनाम अनुच्छेद 25’

  • ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ (Essential Religious Practice) की कसौटी:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने अर्जुन गोपाल (2018) और वेल्लोर सिटिजन्स वेलफेयर फोरम में यह सिद्धांत स्थापित किया है कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत केवल वही प्रथाएं संरक्षित हैं जो किसी धर्म का अभिन्न और अनिवार्य अंग हों।
    • दिवाली मूलतः दीपों, प्रकाश और आध्यात्मिक विजय का पर्व है। 14वीं-15वीं शताब्दी में बारूद के आगमन के बाद पटाखों का व्यावसायिक चलन शुरू हुआ, जो धर्म का कोई अपरिवर्तनीय या अनिवार्य धार्मिक अंग नहीं है।
  • सतर्कतामूलक सिद्धांत (Precautionary Principle):
    • भारतीय पर्यावरण न्यायशास्त्र में यह नियम सुस्थापित है कि जब किसी गतिविधि से स्वास्थ्य और जीवन को अपूरणीय क्षति का खतरा हो, तो वैज्ञानिक अनिश्चितता का बहाना बनाकर राज्य निवारक उपाय करने में देरी नहीं कर सकता।
    • जब मेडिकल रिपोर्ट्स यह सिद्ध कर रही हैं कि दिल्ली-एनसीआर में बच्चों और गैर-धूम्रपान करने वालों के फेफड़े काले पड़ रहे हैं और जीवन प्रत्याशा घट रही है, तो पटाखों के उत्सर्जन पर कठोर नियंत्रण लगाना राज्य का संवैधानिक दायित्व है।

विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (संवैधानिक जनहित रिट क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: अर्जुन गोपाल व अन्य बनाम भारत संघ व अन्य [Writ Petition (Civil) No. 728/2015]
  • पीठ: न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश एवं न्यायमूर्ति प्रसन्न बी. वराले
  • तारीख: 29 अक्टूबर 2026

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • न्यायालय मित्र (Amicus Curiae): वरिष्ठ अधिवक्ता उत्तरा बब्बर (Senior Advocate Uttara Babbar)।
  • याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन (Senior Advocate Gopal Sankaranarayanan)।
  • केंद्र सरकार / अधिकारियों की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी (Additional Solicitor General Aishwarya Bhati)।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता—स्वच्छ वायु का अधिकार)
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता—स्वास्थ्य के अधीन) एवं अनुच्छेद 48A (पर्यावरण संरक्षण का राज्य नीति निदेशक तत्व)
    • वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 — वायु गुणवत्ता के मानक एवं दंडात्मक प्रावधान
    • दिल्ली-एनसीआर वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अधिनियम, 2021 (CAQM Act, 2021) — आपातकालीन प्रदूषण नियंत्रण शक्तियां
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • पर्यावरण संरक्षण और त्योहारों के आयोजन का विधिक मानक: ‘त्योहारों का उल्लास दूसरों के स्वास्थ्य और जीवन की कीमत पर नहीं मनाया जा सकता; स्वच्छ वातावरण में सांस लेना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक गैर-हस्तांतरणीय मौलिक अधिकार है; धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) लोक स्वास्थ्य के संवैधानिक प्रतिबंधों के अधीन है; पटाखों के कारण बच्चों, वृद्धों और रोगियों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर और स्थायी दुष्प्रभावों को रोकने के लिए व्यापक जन-जागरूकता, रोल मॉडल हस्तियों की भागीदारी और जमीनी स्तर पर विनियामक नियमों का कठोर अनुपालन अपरिहार्य है।’
  • वर्तमान स्थिति: सुप्रीम कोर्ट ने मामले की विस्तृत सुनवाई पूरी कर ली है और अगले कुछ दिनों के भीतर पटाखों के नियमन, जन-जागरूकता अभियान और प्रशासनिक जवाबदेही पर औपचारिक लिखित अंतरिम आदेश पारित करेगा।

Diwali In Delhi-I: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठन्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश एवं न्यायमूर्ति पी.बी. वराले
मामला/विषयदिल्ली-एनसीआर वायु प्रदूषण, पटाखों पर प्रतिबंध और स्वास्थ्य प्रभाव
न्यायालय मित्र (Amicus Curiae)वरिष्ठ अधिवक्ता उत्तरा बब्बर (Uttara Babbar)
याचिकाकर्ता की ओर सेवरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन (Gopal Sankarnarayanan)
केंद्र/दिल्ली प्रशासनअतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी (ASG Aishwarya Bhati)
अदालत के प्रमुख सुझाव/निर्देश1. हस्तियों से अपील: विराट कोहली जैसे खेल सितारों से ‘पटाखा-मुक्त दिवाली’ का जागरूकता संदेश प्रसारित कराना।
2. बच्चों की शिक्षा: शिक्षा विभागों को निर्देश देकर स्कूलों के जरिए बच्चों को जागरूक करना ताकि वे माता-पिता को पटाखे फोड़ने से रोकें।
3. अनुच्छेद 25 की सीमा: धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार सार्वजनिक स्वास्थ्य (Public Health) के अधीन है।
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