Friday, October 30, 2026
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Staff Appointment: NCLT में कर्मचारियों की नियुक्तियां मंत्रालय द्वारा हाइजैक किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण; नियुक्ति की संपूर्ण शक्ति केवल NCLT अध्यक्ष के पास होनी चाहिए

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मामले की पृष्ठभूमि और सर्वोच्च न्यायालय में बहस

  1. निजी कंपनियों को भर्ती का ठेका देने पर आपत्ति:कर्मचारियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने कोर्ट को बताया कि NCLT के न्यायिक सदस्यों से जुड़े निजी कर्मचारियों और प्रशासनिक अमले की पूरी भर्ती प्रक्रिया को किसी निजी संस्था को आउटसोर्स कर दिया गया है। इससे लगभग 8 साल से काम कर रहे संविदा कर्मचारियों की नौकरियां 1 या 2 नवंबर से समाप्त होने का खतरा पैदा हो गया है। उन्होंने तर्क दिया कि निजी एजेंसी के तहत काम करने से न्यायिक कार्यों की निष्पक्षता प्रभावित होगी और यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 (समानता व अवसर की समता) का उल्लंघन है।
  2. संविदा कर्मचारियों की ‘बैकडोर एंट्री’ पर CJI का कड़ा रुख:अदालत ने केवल संविदा कर्मचारियों को सेवा में बनाए रखने या उन्हें सुरक्षा कवच देने की मांग पर कड़ा रुख अपनाया। CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि कोर्ट व्यक्तिगत लाभ चाहने वाले संविदा कर्मचारियों की याचिकाओं पर NCLT अध्यक्ष के हाथ नहीं बांधेगा।“आप लोग भी बैकडोर एंट्री (Backdoor Entrants) से आए हैं। मैं जानता हूं कि निजी ठेकेदार कैसे काम करते हैं; उन्हें न्यायिक या तकनीकी सदस्यों से कोई सरोकार नहीं होता। हम व्यक्तिगत लाभ वाले कर्मचारियों की अर्जी पर राहत नहीं देंगे, बल्कि NCLT अध्यक्ष द्वारा चिंता जताए जाने पर संस्थागत हित में विचार करेंगे।”
  3. नियोक्ता-कर्मचारी संबंध पर जस्टिस बागची का दृष्टिकोण:न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने स्पष्ट किया कि यद्यपि प्रारंभिक भर्ती प्रक्रिया बाहरी एजेंसी को दी जा सकती है, लेकिन कर्मचारियों का वास्तविक नियंत्रण और नियोक्ता-कर्मचारी संबंध ट्रिब्यूनल का ही होना चाहिए। CJI ने सहमति जताते हुए कहा कि NCLT अध्यक्ष UPSC या SSC जैसी पारदर्शी सरकारी एजेंसियों के जरिए सीधी भर्ती कराने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं।

नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 323B (विशिष्ट विषयों हेतु अधिकरणों की स्थापना व न्यायिक स्वायत्तता), अनुच्छेद 14 व 16 (सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर एवं ‘पिछले दरवाजे से प्रवेश’ / Backdoor Entry पर रोक), कंपनी अधिनियम, 2013 (Companies Act, 2013) की धारा 408 व 418 (NCLT का गठन एवं अध्यक्ष के अधीन प्रशासनिक स्टाफ की नियुक्ति की शक्तियां), तथा ऐतिहासिक मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ श्रृंखला में स्थापित ‘अधिकरणों की स्वतंत्रता’ (Independence of Tribunals) के संवैधानिक सिद्धांतों पर सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत तल्ख और दूरगामी मौखिक आदेश पारित किया है।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ ने राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) के न्यायिक सदस्यों के साथ कार्यरत प्रशासनिक कर्मचारियों और सहायक स्टाफ की भर्ती को एक निजी एजेंसी को आउटसोर्स किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार (कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय – MCA) के रवैये की कड़ी निंदा की।

पीठ ने स्पष्ट कहा कि मंत्रालय अधिकरण पर अपनी पूरी पकड़ (Complete Grip) बनाए रखने की कोशिश कर रहा है, जो न्यायिक संस्था की स्वायत्तता को नष्ट करने जैसा है। अदालत ने व्यवस्था दी कि अधिकरण में न्यायिक सदस्यों से जुड़े कर्मचारियों की नियुक्ति की संपूर्ण शक्ति NCLT अध्यक्ष (President) के पास ही होनी चाहिए, जिसे UPSC या SSC जैसी पारदर्शी संवैधानिक एजेंसियों के माध्यम से पूरा किया जा सकता है। हालांकि, अदालत ने करीब आठ वर्षों से कार्यरत संविदा कर्मचारियों को सेवा सुरक्षा देने से साफ इनकार करते हुए उन्हें “पिछले दरवाजे से आए अभ्यर्थी” करार दिया और स्पष्ट किया कि वह इस मामले में कर्मचारियों के व्यक्तिगत हित के बजाय केवल ‘संस्थागत स्वायत्तता’ के व्यापक जनहित के दृष्टिकोण से विचार करेगी।

शीर्ष अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां

1. ‘मंत्रालय अधिकरण पर पूर्ण नियंत्रण चाहता है, यह सबसे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण है’: CJI सूर्यकांत

CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने अधिकरण के आंतरिक प्रशासनिक संचालन में कार्यपालिका के अतिक्रमण पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा: “कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) द्वारा NCLT के कर्मचारियों की नियुक्तियों को पूरी तरह हाइजैक कर लिया गया है। यही सबसे बड़ी समस्या है। मंत्रालय इस न्यायिक संस्था पर अपनी पूर्ण पकड़ (Complete Grip) बनाए रखना चाहता है, और यही सबसे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण है।”

2. ‘नियुक्ति की संपूर्ण शक्ति केवल NCLT अध्यक्ष के पास ही निहित होनी चाहिए’:

  • मुख्य न्यायाधीश ने दो-टूक व्यवस्था दी कि न्यायिक सदस्यों के साथ काम करने वाले कर्मचारियों पर किसी निजी ठेकेदार या मंत्रालय का नियंत्रण न्यायिक स्वतंत्रता के लिए घातक है:“नियुक्ति की संपूर्ण शक्ति केवल और केवल [NCLT] अध्यक्ष के पास ही होनी चाहिए (The entire power of appointment must be with President only)।अध्यक्ष को नियुक्तियों में पूर्ण स्वायत्तता मिलनी चाहिए। वे UPSC या SSC के माध्यम से नियमित भर्तियां कर सकते हैं। हम निजी संस्थाओं को न्यायिक सदस्यों से जुड़े कर्मचारियों पर नियंत्रण करने की अनुमति देकर अधिकरण की स्वायत्तता से समझौता नहीं होने देंगे।”

3. ‘संविदा कर्मचारियों को संरक्षण नहीं; आप भी पिछले दरवाजे से आए हैं’ (Backdoor Entrants):

  • जब वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने दलील दी कि लगभग आठ वर्षों से कार्यरत कर्मचारियों को 1 या 2 नवंबर को हटा दिया जाएगा और NCLT अध्यक्ष की पूर्व अनुमति के बिना किसी को न हटाया जाए, तो CJI ने राहत देने से इनकार करते हुए कहा:“हम अध्यक्ष के हाथ नहीं बांधेंगे। आप लोग भी पिछले दरवाजे से प्रवेश करने वाले (Backdoor Entrants) हैं।मैं भली-भांति जानता हूं कि ठेकेदार अपना खेल कैसे खेलते हैं। उन्हें न्यायिक या तकनीकी सदस्यों की गरिमा की कोई परवाह नहीं होती। हम उन कर्मचारियों की ओर से इस याचिका पर विचार नहीं करेंगे जिनका इसमें व्यक्तिगत स्वार्थ है। यदि NCLT अध्यक्ष इस संबंध में कोई मुद्दा उठाते हैं, तभी हम उस पर विचार करेंगे।”

4. ‘भर्ती आउटसोर्स हो सकती है, किंतु नियोक्ता-कर्मचारी संबंध अधिकरण के साथ होना चाहिए’: जस्टिस बागची

  • न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची ने आउटसोर्सिंग के कानूनी स्वरूप पर महत्वपूर्ण कानूनी अंतर स्पष्ट किया:“भर्ती की प्रक्रिया को भले ही किसी एजेंसी को आउटसोर्स किया जा सकता है, किंतु वास्तविक नियोक्ता-कर्मचारी संबंध (Employer-Employee Relationship) अधिकरण के साथ ही बना रहना चाहिए।”
  • पीठ ने माना कि न्यायिक संस्था में संवेदनशील फाइलों और गोपनीय आदेशों से जुड़े कर्मचारियों का एक निजी ठेकेदार के पे-रोल पर होना न्याय प्रशासन की शुचिता के प्रतिकूल है।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक विवरण

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
मामले की प्रकृतिविशेष याचिका — NCLT में न्यायिक सदस्यों से जुड़े कर्मचारियों की भर्ती के निजीकरण एवं संविदा कर्मियों की संभावित समाप्ति के संबंध में।
पीठमुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना।
याचिकाकर्ताओं (कर्मचारियों) की ओर से मुख्य दलीलें1. पूरी भर्ती प्रक्रिया को एक निजी कंपनी को आउटसोर्स कर दिया गया है, जिससे न्यायिक संस्था में कार्यरत कर्मचारी निजी कर्मचारियों में तब्दील हो जाएंगे।
2. इससे न्यायिक कार्यों के स्वतंत्र निर्वहन पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
3. लगभग 8 वर्षों से सेवारत कर्मचारियों को मनमाने ढंग से हटाया जाना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।
4. जब तक NCLT अध्यक्ष अनुमति न दें, तब तक किसी कर्मचारी को न हटाया जाए।
शीर्ष अदालत का कड़ा रुख1. संविदा कर्मचारियों को सेवा सुरक्षा या नियमितीकरण का कोई अंतरिम संरक्षण नहीं।
2. बिना प्रतियोगी परीक्षा के आए कर्मियों के व्यक्तिगत हित में याचिका सुनने से इनकार।
3. NCLT अध्यक्ष की रिपोर्ट के आधार पर ही संस्थागत सुरक्षा के व्यापक पहलू की पड़ताल होगी।
कार्रवाई का परिणामव्यापक संस्थागत हित (Larger Institutional Interest) में विचार करने हेतु नोटिस जारी; NCLT अध्यक्ष की स्वायत्तता बहाल करने पर विस्तृत रूपरेखा तय होगी।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘उमादेवी नज़ीर बनाम अधिकरणों की स्वायत्तता’

  • संविदा कर्मियों के दावे पर ‘उमादेवी’ सिद्धांत का अनुप्रयोग:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने कर्नाटक राज्य बनाम उमादेवी [(2006) 4 SCC 1] के ऐतिहासिक सिद्धांत को दोहराया कि सार्वजनिक रोजगार में खुली, पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी चयन प्रक्रिया के बिना रखे गए संविदा या दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी केवल अपनी सेवा अवधि के आधार पर नियमितीकरण या स्थायी संरक्षण के हकदार नहीं हो सकते।
    • CJI सूर्यकांत का यह कथन कि “आप भी पिछले दरवाजे से आए हैं”, इसी स्थापित विधिक स्थिति को पुष्ट करता है कि न्यायालय कार्यपालिका की वैधानिक भर्ती प्रक्रिया में बाधा डालकर संविदा कर्मियों के लिए अनुचित साम्या (Undue Equity) नहीं रच सकता।
  • अधिकरणों की स्वतंत्रता और शक्तियों का पृथक्करण (Separation of Powers):
    • अधिकरण (Tribunals) केवल मंत्रालयों के प्रशासनिक विभाग नहीं हैं, बल्कि वे उच्च न्यायालयों के वाणिज्यिक क्षेत्राधिकार का निर्वहन करने वाले न्यायिक निकाय हैं।
    • यदि कॉर्पोरेट मामलों का मंत्रालय (MCA), जो स्वयं NCLT के समक्ष कई मामलों में कंपनी मामलों का नियामक या पक्षकार होता है, अधिकरण के स्टेनोग्राफरों, सहायकों और रजिस्ट्रारों की भर्ती पर एकाधिकार कर लेगा, तो संस्थागत निष्पक्षता पूरी तरह समाप्त हो जाएगी।
    • NCLT अध्यक्ष को UPSC/SSC के माध्यम से स्थायी और नियमित कैडर तैयार करने की पूर्ण स्वतंत्रता देना ही संस्था को कार्यपालिका के चंगुल से मुक्त करने का एकमात्र संवैधानिक उपाय है।

विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (संवैधानिक जनहित/अपीलीय क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: NCLT न्यायिक सदस्यों के सहायक कर्मचारियों की भर्ती व संस्थागत स्वायत्तता वाद [Supreme Court of India]
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
  • आदेश की तिथि: 29 अक्टूबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: संविदा कर्मचारियों की अंतरिम संरक्षण की अर्जी खारिज; अधिकरण की संस्थागत स्वायत्तता सुनिश्चित करने के व्यापक जनहित के मुद्दे पर नोटिस जारी।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • संविदा कर्मचारियों की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा (Senior Advocate Meenakshi Arora)।
  • संबंधित पक्षों की ओर से: केंद्र सरकार व NCLT बार के अधिवक्ता।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 323B (अधिकरणों का गठन व कार्यप्रणाली), अनुच्छेद 50 (कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण), एवं अनुच्छेद 14 व 16 (सार्वजनिक रोजगार में समानता)
    • कंपनी अधिनियम, 2013 (Companies Act, 2013) — धारा 408 (NCLT की स्थापना) एवं धारा 418 (अधिकरण के अधिकारी व कर्मचारी—अध्यक्ष का प्रशासनिक नियंत्रण)
    • दिवाला एवं दिवालियापन संहिता, 2016 (IBC, 2016) — न्यायिक कार्यप्रणाली की शुचिता
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • अधिकरणों की प्रशासनिक स्वायत्तता और स्टाफ भर्ती का विधिक मानक: ‘न्यायिक अधिकरणों के सहायक कर्मचारियों की नियुक्ति पर प्रशासनिक मंत्रालयों का एकाधिकार संस्थागत स्वायत्तता पर आघात है; भर्ती की संपूर्ण शक्ति अधिकरण के अध्यक्ष के पास होनी चाहिए जिसे UPSC/SSC जैसी निष्पक्ष संस्थाओं द्वारा संचालित किया जाए; निजी ठेकेदारों के अधीन न्यायिक कर्मचारियों को आउटसोर्स करना न्याय की शुचिता के प्रतिकूल है; इसके साथ ही, पिछले दरवाजे से नियुक्त संविदा कर्मचारी नियमितीकरण या सेवा संरक्षण का कोई मौलिक या विधिक अधिकार नहीं रखते।’
  • वर्तमान स्थिति व विधिक प्रभाव: सुप्रीम कोर्ट द्वारा संविदा कर्मचारियों को अंतरिम संरक्षण देने से इनकार किए जाने के बाद NCLT प्रशासन आवश्यक प्रशासनिक फेरबदल करने के लिए स्वतंत्र है; वहीं शीर्ष अदालत अब इस व्यापक कानूनी पहलू की समीक्षा करेगी कि NCLT के स्वतंत्र व स्थायी प्रशासनिक कैडर का गठन कार्यपालिका के हस्तक्षेप के बिना कैसे सुनिश्चित किया जाए।

Staff Appointment:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठमुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
मामला/विषयNCLT कर्मचारियों की नियुक्ति में निजी ठेकेदारों (Outsourcing) के बढ़ते हस्तक्षेप और MCA के नियंत्रण के खिलाफ याचिका
कर्मचारियों की ओर से पेश counselवरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा (Senior Advocate Meenakshi Arora)
अदालत की मुख्य टिप्पणियां1. प्रेसिडेंट को पूर्ण स्वायत्तता: नियुक्तियों की अंतिम शक्ति NCLT प्रेसिडेंट के पास हो, MCA या निजी ठेकेदारों के पास नहीं।
2. आउटसोर्सिंग पर नजर: भर्ती प्रक्रिया की आउटसोर्सिंग हो सकती है, लेकिन नियोक्ता-कर्मचारी (Employer-Employee) संबंध ट्रिब्यूनल के पास ही रहना चाहिए।
3. बैकडोर एंट्री पर फटकार: संविदा कर्मचारियों के व्यक्तिगत हितों के बजाय व्यापक संस्थागत हित (Larger Institutional Interest) में नोटिस जारी किया गया।
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