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मामले की पृष्ठभूमि: 12वीं शताब्दी की परंपरा और 2018 से खाली पद
- रामानुजाचार्य द्वारा स्थापित व्यवस्था:अदालत ने उल्लेख किया कि श्रीरंगम मंदिर के जीयरों की परंपरा 12वीं शताब्दी में संत श्री रामानुजाचार्य द्वारा शुरू की गई थी। रामानुजाचार्य ने मंदिर प्रशासन और आगम नियमों (Agamas) के अनुपालन के लिए एक विस्तृत व्यवस्था बनाई थी, जिसमें ‘जीयर’ सर्वोच्च स्थान पर होते हैं। जीयर न केवल आध्यात्मिक कार्य करते हैं, बल्कि निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में आगमों का पालन सुनिश्चित कराते हैं।
- 2018 से पद खाली रहने का कारण:50वें जीयर (जिन्होंने 1989 में पद संभाला था) का निधन 2018 में हो गया। मठ की परंपरा के अनुसार, वे अपना उत्तराधिकारी नामित किए बिना ही ब्रह्मलीन हो गए थे। मठ के रीति-रिवाजों के तहत उत्तराधिकारी का चयन ‘स्थलाथार’ (मठ के पारंपरिक हितधारकों) द्वारा सर्वसम्मति या बहुमत से किया जाना होता है।
- अदालत का तीखा प्रहार:हाईकोर्ट ने पाया कि जीयर का पद खाली रहने से स्थलाथारों और भट्टारों (पुजारियों) का फायदा हो रहा था, क्योंकि जीयर की अनुपस्थिति में उनकी शक्तियों का आपस में बंटवारा हो गया था। कोर्ट ने कहा: “चूंकि कोई जीयर नहीं है, इसलिए उनसे सवाल पूछने वाला भी कोई नहीं है। स्टेटस को (यथास्थिति) उनके अनुकूल है, लेकिन यह निश्चित रूप से श्रद्धालुओं के मौलिक अधिकारों का हनन करता है।”
हाईकोर्ट के मुख्य विधिक निष्कर्ष और कड़े निर्देश
1. HR&CE विभाग को सख्त चेतावनी (“Sorry! We won’t permit you”):
हाईकोर्ट यह जानकर हैरान रह गया कि पिछले जीयर को मंदिर के एक प्रशासनिक अधिकारी द्वारा ‘तमिलनाडु HR&CE अधिनियम, 1959’ की धारा 55(1) के तहत जारी कार्यवाही के जरिए नियुक्त किया गया था। विभाग द्वारा फिर से ऐसा करने की आशंका पर कोर्ट ने कहा: “माफ कीजिए! हम आपको इसकी अनुमति नहीं देंगे। धार्मिक पीठाधीश का चयन पूरी तरह से एक आध्यात्मिक/धार्मिक कार्य है और इसे कभी भी धर्मनिरपेक्ष या प्रशासनिक कार्य नहीं माना जा सकता। जीयर मंदिर का कोई सामान्य कर्मचारी नहीं है और न ही वह ट्रस्टियों के अनुशासनात्मक नियंत्रण के अधीन हो सकता है।”
2. अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन:
अदालत ने माना कि 2018 से जीयर का पद खाली रखना संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मठ के अनुयायियों और श्रद्धालुओं के मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
3. ‘पेरेंस पेट्रिए’ (Parens Patriae) क्षेत्राधिकार की चेतावनी:
पीठ ने संबंधित क्षेत्र के संयुक्त आयुक्त (Joint Commissioner) को निर्देश दिया कि वे स्थलाथारों की बैठक बुलाएं और 6 महीने के भीतर चयन प्रक्रिया पूरी करना सुनिश्चित करें। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि इस अवधि में नियुक्ति नहीं हुई, तो अदालत अपने ‘पेरेंस पेट्रिए’ (संरक्षक) क्षेत्राधिकार का उपयोग करते हुए वैष्णव संतों या किसी अन्य संस्था की मदद से खुद जीयर की नियुक्ति कराएगी।
मदुरै/चेन्नई: भारत का संविधान के अनुच्छेद 25 व 26 (धार्मिक स्वतंत्रता एवं धार्मिक मामलों के प्रबंधन का मूल अधिकार), तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 (TN HR&CE Act, 1959) की धारा 55 (मंदिर कर्मचारियों की नियुक्ति बनाम विशुद्ध धार्मिक मठाधीश/जीयर का चयन), आगम शास्त्र (Agama Shastras) एवं श्री वैष्णव संप्रदाय की सदियों पुरानी प्रथागत परंपराएं, तथा उच्च न्यायालय का ‘पेरेंट्स पैट्रिया’ क्षेत्राधिकार (Parens Patriae Jurisdiction) के विधिक मानकों पर मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै खंडपीठ ने एक अत्यंत युगांतरकारी और रोचक फैसला सुनाया है।
मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन (Justice GR Swaminathan) और न्यायमूर्ति पी. मुरुगन (Justice P Murugan) की खंडपीठ ने श्री वैष्णव तेनकलई संप्रदाय के भक्त एस. वीरा राघवन द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) का निस्तारण करते हुए ऐतिहासिक श्रीरंगम रंगनाथस्वामी मंदिर के ‘श्रीरंगनारायण जीयर’ (Sriranganarayana Jeeyar) के रिक्त पद को भरने के लिए 6 महीने की सख्त समयसीमा तय की है। यह पद 50वें जीयर के निधन के बाद वर्ष 2018 से (पिछले 8 वर्षों से) रिक्त पड़ा हुआ था।
पीठ ने वेटिकन में कैथोलिक चर्च द्वारा पोप के चुनाव (Papal Conclave) की ऐतिहासिक परंपरा से तुलना करते हुए कहा कि जिस प्रकार जब तक चिमनी से सफेद धुआं नहीं निकलता तब तक कार्डिनल्स को सिस्टिन चैपल के भीतर बंद रखा जाता है, ठीक उसी तरह श्रीरंगम मंदिर के स्थलत्तारों (Sthalattars) को मठ परिसर के भीतर तब तक बंद रखा जाना चाहिए जब तक वे आम सहमति या बहुमत से 51वें जीयर का चयन न कर लें। साथ ही अदालत ने तमिलनाडु के HR&CE विभाग को जीयर नियुक्त करने की किसी भी प्रशासनिक कोशिश पर सख्त चेतावनी देते हुए कहा—“सॉरी! हम आपको इसकी अनुमति कतई नहीं देंगे।”
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. पोप के चुनाव (Papal Conclave) से सीधी तुलना:
न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति पी. मुरुगन की खंडपीठ ने जीयर चयन में स्थलत्तारों की वर्षों की देरी और आंतरिक खींचतान पर कटाक्ष करते हुए दर्ज किया:
“जिस प्रकार वेटिकन में कार्डिनल्स को सिस्टिन चैपल (Sistine Chapel) के भीतर बंद कर दिया जाता है और दरवाजे केवल तभी खोले जाते हैं जब चिमनी से सफेद धुआं (White Smoke) निकलता है—जो नए पोप के चयन का संकेत होता है—ठीक उसी प्रकार स्थलत्तारों (Sthalattars) को भी मठ परिसर के भीतर बंद कर दिया जाना चाहिए और इस विवाद को सुलझाने के बाद ही उन्हें बाहर आने की अनुमति दी जानी चाहिए।”
2. ‘जीयर न होने से सवाल पूछने वाला कोई नहीं; यथास्थिति ने भक्तों के अधिकार छीने’:
- अदालत ने रेखांकित किया कि 50वें जीयर (जिन्होंने 1989 में पद संभाला था) का 2018 में बिना किसी उत्तराधिकारी को नामित किए निधन हो गया था। इसके बाद जीयर की प्रशासनिक व धार्मिक शक्तियां स्थलत्तारों और भट्टारों (Bhattars) में बंट गईं:“चूंकि कोई जीयर नहीं है, इसलिए उनसे सवाल पूछने वाला भी कोई नहीं है। उनके पास अगला जीयर चुनने का कोई प्रोत्साहन ही नहीं बचा है, क्योंकि मौजूदा यथास्थिति (Status Quo) उनके स्वार्थों के पूरी तरह अनुकूल बैठती है। किंतु यह स्थिति निश्चित रूप से संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत भक्तों के मौलिक अधिकारों का हनन करती है।”
3. ‘जीयर की नियुक्ति कोई धर्मनिरपेक्ष प्रशासनिक कृत्य नहीं; HR&CE विभाग दूर रहे’:
- अदालत यह जानकर स्तब्ध रह गई कि पूर्ववर्ती जीयर को मंदिर के एक प्रशासनिक अधिकारी ने HR&CE अधिनियम की धारा 55(1) के तहत कार्यवाही जारी करके नियुक्त किया था। विभाग द्वारा दोबारा ऐसा करने की आशंका पर पीठ ने दो-टूक कहा:“सॉरी! हम आपको इसकी अनुमति नहीं देंगे (Sorry! We won’t permit you)।किसी धार्मिक मठाधीश/पोंटिफ (Pontiff) का चयन पूर्णतः एक धार्मिक कार्य (Purely Religious Function) है और इसे कभी भी धर्मनिरपेक्ष या प्रशासनिक कृत्य नहीं माना जा सकता। HR&CE विभाग न तो किसी उत्तराधिकारी का चयन कर सकता है और न ही उसे अनुमोदित करने का अधिकार रखता है। जीयर कोई मंदिर का कर्मचारी नहीं है और न ही वह न्यासियों (Trustees) के अनुशासनात्मक नियंत्रण के अधीन आ सकता है।”
4. पेरेन्ट्स पैट्रिया क्षेत्राधिकार की चेतावनी:
- अदालत ने अधिकार क्षेत्र वाले संयुक्त आयुक्त (Joint Commissioner) को निर्देश दिया कि वह स्थलत्तारों की औपचारिक बैठक बुलाएं और सुनिश्चित करें कि 6 महीने के भीतर चयन प्रक्रिया संपन्न हो।
- पीठ ने चेतावनी दी कि यदि स्थलत्तार विफल रहे, तो अदालत अपने ‘पेरेंट्स पैट्रिया’ (संस्थागत संरक्षक) क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए प्रख्यात वैष्णव संतों या संबंधित धार्मिक पीठों के सहयोग से स्वयं न्यायिक हस्तक्षेप करेगी।
मामले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (12वीं सदी से 2026 तक)
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं धार्मिक परंपरा |
| याचिकाकर्ता | एस. वीरा राघवन (S Veeraraghavan) — श्री वैष्णव तेनकलई संप्रदाय के श्रद्धालु/भक्त। |
| प्रतिवादी पक्ष | तमिलनाडु सरकार (HR&CE विभाग), संयुक्त आयुक्त, एवं श्रीरंगम रंगनाथस्वामी मंदिर प्रशासन। |
| जीयर पद का ऐतिहासिक महत्व | 12वीं शताब्दी में जगद्गुरु श्री रामानुजाचार्य ने श्रीरंगम रंगनाथस्वामी मंदिर के संचालन की जटिल व्यवस्था स्थापित की थी। जीयर मंदिर के आध्यात्मिक गुरु होने के साथ-साथ आगम नियमों के अनुपालन के सर्वोच्च नियामक (Neutral Arbiter) होते हैं। |
| परंपरागत चयन प्रक्रिया | मठ की प्रथागत परंपराओं के अनुसार, जीयर का चयन मंदिर के स्थलत्तारों (Sthalattars) द्वारा सर्वसम्मति से अथवा बहुमत के आधार पर किया जाना अनिवार्य है। |
| 2018 से बना गतिरोध | 50वें जीयर के निधन के बाद स्थलत्तारों ने आंतरिक विवादों के चलते उत्तराधिकारी का चयन नहीं किया। जीयर की अनुपस्थिति में मंदिर की प्रशासनिक और अनुष्ठानिक शक्तियां स्थलत्तारों और पुजारियों (भट्टारों) के पास ही केंद्रित रह गईं। |
| HR&CE विभाग का अनुचित कदम | विभाग ने 2021 में पद के लिए सार्वजनिक आवेदन आमंत्रित किए थे, किंतु कोई तार्किक परिणाम नहीं निकला। पूर्व में विभाग ने जीयर को धारा 55(1) के तहत एक सामान्य मंदिर कर्मचारी मानते हुए नियुक्ति आदेश जारी किया था, जिसे हाईकोर्ट ने असंवैधानिक माना। |
| हाईकोर्ट का अंतिम निर्देश | 1. संयुक्त आयुक्त स्थलत्तारों की बैठक बुलाएं; 6 महीने के भीतर 51वें जीयर का चयन संपन्न कराया जाए। 2. नव-नियुक्त जीयर मंदिर परिसर स्थित ‘चेरन मठ’ (Cheran Mutt) में निवास करेंगे और मठ की आय से उनका भरण-पोषण होगा। 3. विभाग का कोई सीधा हस्तक्षेप नहीं होगा। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘अनुच्छेद 25-26 और धार्मिक पदों में कार्यपालिका नियंत्रण की सीमा’
- धार्मिक पदानुक्रम बनाम धर्मनिरपेक्ष प्रशासन (Spiritual Head vs Secular Employee):
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक कमिश्नर, हिंदू रिलिजियस एंडोमेंट्स बनाम श्री लक्ष्मिंद्र तीर्थ स्वामीयर (शिरूर मठ केस – 1954) में यह सुस्थापित सिद्धांत प्रतिपादित किया था कि किसी मठ या धार्मिक पीठ के मठाधीश (जीयर) की स्थिति किसी न्यासी या वेतनभोगी कर्मचारी जैसी नहीं होती। वह एक जीवंत आध्यात्मिक संस्था होता है जिसका चयन विशुद्ध धार्मिक अनुष्ठान और परंपरा का विषय है।
- मद्रास हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि HR&CE अधिनियम की धारा 55(1), जो ट्रस्टियों को मंदिर के दैनिक कर्मचारियों की नियुक्ति का अधिकार देती है, उसका प्रयोग 12वीं सदी के श्रीरंगम जीयर की पीठ भरने के लिए नहीं किया जा सकता। राज्य सरकार किसी आईएएस या मंदिर कार्यकारी अधिकारी के आदेश से जीयर नियुक्त नहीं कर सकती।
- भक्तों का अनुच्छेद 25 के तहत अधिकार:
- पीठ ने माना कि धर्म केवल व्यक्तिगत आस्था नहीं, बल्कि संप्रदाय के स्थापित रीति-रिवाजों के अनुसार अनुष्ठान कराने का अधिकार भी है।
- जीयर का पद रिक्त रहने से श्रीरंगम मंदिर के आगम अनुष्ठानों की शुचिता प्रभावित हो रही थी। स्थलत्तारों का व्यक्तिगत लाभ के लिए पद को खाली रखना भक्तों के धार्मिक अधिकारों के विरुद्ध है, जिसके चलते अदालत को अपने ‘पेरेंट्स पैट्रिया’ अधिकार के तहत हस्तक्षेप करना पड़ा।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- न्यायालय: मद्रास उच्च न्यायालय (मदुरै न्यायपीठ – मूल जनहित रिट क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: एस. वीरा राघवन बनाम तमिलनाडु राज्य व अन्य [W.P.(MD) No. … / 2026]
- पीठ: न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन एवं न्यायमूर्ति पी. मुरुगन (खंडपीठ)
- निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
- अनुपालन की समयसीमा: छह महीने (Six Months)
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (एस. वीरा राघवन) की ओर से: अधिवक्ता रघुवरन गोपालन (Advocate Raguvaran Gopalan)।
- प्रतिवादी राज्य सरकार (HR&CE विभाग) की ओर से: अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) पी.वी. बालसुब्रमण्यन (Additional Advocate General PV Balasubramanian), जिन्हें सरकारी वकील एम.पी. सेंथिल ने सहयोग दिया।
- श्रीरंगम मंदिर प्रशासन की ओर से: अधिवक्ता एम. सरवनन (Advocate M Saravanan)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 25 (धर्म के आचरण व प्रचार की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 26 (धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता) एवं अनुच्छेद 226 (रिट क्षेत्राधिकार)
- तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 (TN HR&CE Act, 1959) — धारा 55 (कार्यालय धारकों व नौकरों की नियुक्ति—जीयर पर लागू नहीं)
- आगम शास्त्र एवं श्री वैष्णव संप्रदाय कस्टमरी लॉ — श्रीरंगम मंदिर प्रशासन व जीयर चयन परंपरा
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- धार्मिक मठाधीशों के चयन और राज्य हस्तक्षेप की सीमा का विधिक मानक: ‘किसी ऐतिहासिक पीठ के धार्मिक पोंटिफ या जीयर का चयन एक विशुद्ध धार्मिक कार्य है और यह किसी भी स्थिति में धर्मनिरपेक्ष या प्रशासनिक कृत्य नहीं हो सकता; राज्य का धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग (HR&CE) जीयर का चयन करने या उस पर अनुशासनात्मक अधिकार रखने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं रखता; यदि प्रथागत चयनकर्ता (स्थलत्तार) अपने संकीर्ण हितों के चलते वर्षों तक उत्तराधिकारी का चयन न कर भक्तों के अनुच्छेद 25 के अधिकारों को बाधित करते हैं, तो उच्च न्यायालय अपने पेरेंट्स पैट्रिया क्षेत्राधिकार के तहत समयबद्ध चयन कराने हेतु हस्तक्षेप करने के लिए पूर्णतः सशक्त है।’
- वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: मद्रास उच्च न्यायालय के इस आदेश के बाद संयुक्त आयुक्त को तुरंत स्थलत्तारों की औपचारिक बैठक बुलाकर चयन प्रक्रिया शुरू करनी होगी; 6 महीने के भीतर 51वें श्रीरंगनारायण जीयर का चयन कर उन्हें चेरन मठ में स्थापित करना अनिवार्य होगा; यदि स्थलत्तार तय समय में विफल रहते हैं, तो हाईकोर्ट स्वयं वैष्णव संतों की समिति बनाकर उत्तराधिकारी नियुक्त करेगा।
Election of Pope:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court), मदुरै पीठ |
| पीठ | न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन एवं न्यायमूर्ति पी. मुरूगन |
| मामला/साइटेशन | वीरा राघवन बनाम तमिलनाडु राज्य व अन्य (Veera Raghavan Vs State of TN) |
| याचिकाकर्ता | एस. वीरा राघवन (श्री वैष्णव थेंकलाई संप्रदाय के श्रद्धालु) | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता रघुवरन गोपालन |
| प्रतिवादी पक्ष | तमिलनाडु सरकार/HR&CE विभाग और मंदिर प्रबंधन | प्रतिनिधित्व: अतिरिक्त महाधिवक्ता पी.वी. बालासुब्रमण्यम व अन्य |
| मूल विवाद | श्रीरंगम मंदिर के सर्वोच्च धार्मिक पीठाधीश (50वें जीयर) के 2018 में निधन के बाद से पद खाली रहना और HR&CE विभाग द्वारा प्रशासनिक हस्तक्षेप। |
| अदालत का फैसला | 1. 6 महीने में नियुक्ति अनिवार्य: स्थलाथार (Sthalattars) 6 महीने में चयन पूरा करें। 2. HR&CE विभाग का हस्तक्षेप अवैध: मठपति/जीयर का चयन पूरी तरह से धार्मिक कार्य है, कोई प्रशासनिक/सरकारी कार्य नहीं। |

